G News 24 : उज्जैन में खड़े हनुमान को हटाने की कोशिश नाकाम,कभी ग्वालियर में अचलेश्वर महादेव ने नहीं दिया था रास्ता !

 भारी मशीनें भी नहीं हिला सकीं प्रतिमा, स्कैनिंग रिपोर्ट पर नजर...

उज्जैन में खड़े हनुमान को हटाने की कोशिश नाकाम,कभी ग्वालियर में अचलेश्वर महादेव ने नहीं दिया था रास्ता !

उज्जैन। उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण की जद में आए प्राचीन खड़े हनुमान की प्रतिमा हटाने के चार प्रयास नाकाम रहे। भारी मशीनों का इस्तेमाल रोककर अब विशेषज्ञों से स्कैनिंग कराई जाएगी। 50 से अधिक वानरों के पहुंचने का वीडियो भी वायरल हुआ। स्टेट के समय कभी ग्वालियर में भी यही समस्या उत्तपन्न हुई थी। वर्तमान अचलेश्वर महादेव मंदिर को भी रास्ता चौड़ा करने के लिए हटाने का प्रयास उस समय के सिंधिया शासकों द्वारा किया गया था,लेकिन वे अपने उन्होंने अपना स्थान नहीं छोड़ा और आज वर्तमान में भी वे उसी स्थान पर विराजमान हैं। उसी तरह वही सिचुएशन उज्जैन में प्राचीन खड़े हनुमान की प्रतिमा हटाने को लेकर उतपन्न हो गई है। 

कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक जारी सड़क चौड़ीकरण की जद में आए अति प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर को हटाना नगर निगम और जिला प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। बीते चार दिनों में प्रतिमा को हटाने के लिए चार बार प्रयास किए गए, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई। मंदिर भवन के गर्भगृह और मुख्य ढांचे को तोड़ा जा चुका है। फिलहाल प्रतिमा को कैनोपी टेंट लगाकर सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के बाहर स्थानीय श्रद्धालुओं ने चेतावनी भरा पोस्टर भी लगाया है। इसमें लिखा है कि प्रतिमा हटाने के दौरान यदि किसी भी तरह से प्रतिमा खंडित होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

वानरों की फौज पहुंची, वीडियो वायरल

कार्रवाई के बीच रविवार शाम मंदिर परिसर और आसपास के मकानों की छतों पर अचानक 50 से अधिक वानर पहुंच गए। कई घंटों तक एक साथ वानरों का वहां डटे रहना और शांत बैठना लोगों के बीच कौतूहल और धार्मिक चर्चा का विषय बन गया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसके बाद सोमवार सुबह मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी। कई श्रद्धालु भावुक नजर आए और प्रतिमा के स्थानांतरण से पहले इसे अंतिम दर्शन मानकर बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचे।

राजा भोज और परमार काल से जुड़ी होने का दावा

विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, प्रतिमा मालवा के विशेष बेसाल्ट पत्थर से निर्मित है। उनके मुताबिक परमार काल और राजा भोज के समय करीब 1,000 वर्ष पहले इस मजबूत बेसाल्ट पत्थर पर मूर्तियां तराशने की समृद्ध परंपरा थी। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन उज्जयिनी, सिंधिया राजवंश और चौबीस खंभा माता क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा है। प्रतिमा पर अत्यधिक सिंदूर होने के कारण उसका मूल स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इसकी सटीक आयु निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण की जरूरत है। डॉ. सोलंकी के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल कर प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा का सुरक्षित विस्थापन किया जाना चाहिए।

अब स्कैनिंग रिपोर्ट के बाद तय होगी आगे की कार्रवाई

प्रशासन की योजना प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से टंकी चौक पर स्थापित करने की है। प्रतिमा के आधार की स्थिति जानने के लिए नीचे करीब डेढ़ फीट गहरा गड्ढा खोदा गया है। अब नगर निगम और जिला प्रशासन ने बिना जल्दबाजी के विशेषज्ञों की मदद लेने का फैसला किया है। आर्कियोलॉजिस्ट की टीम अत्याधुनिक मशीनों से प्रतिमा के आधार, अंदरूनी संरचना और आसपास की मिट्टी की स्कैनिंग करेगी। रिपोर्ट आने के बाद ही प्रतिमा को हटाने की अगली तकनीक तय की जाएगी।

भारी मशीनों से हटाने के प्रयास रोके गए

प्रतिमा को हटाने के लिए नगर निगम की ओर से भारी क्रेन, जेसीबी और अन्य कंस्ट्रक्शन उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, सभी प्रयास असफल रहे। पुरातत्व विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि भारी मशीनरी या अधिक बल लगाने से प्रतिमा में गहरी दरार आ सकती है या वह खंडित हो सकती है। इसके बाद प्रतिमा को हटाने के लिए भारी मशीनरी का आगे इस्तेमाल फिलहाल रोक दिया गया है। सुरक्षित विस्थापन के लिए अब एएसआई की सलाह ली जा रही है। फिलहाल प्रतिमा टेंट के नीचे सुरक्षित और यथावत है।

आस्था बनाम विकास के बीच फंसा मामला

मंदिर के सेवादार और पुजारी महेश पंडित (बैरागी) का कहना है कि उन्हें लगातार महसूस हो रहा है कि बाबा संकेत दे रहे हैं कि उन्हें इसी स्थान पर रहना है। स्थानीय नागरिकों का तर्क है कि ऐतिहासिक मंदिर का जुड़ाव 1857 की क्रांति से भी पहले का है, इसलिए इसे हटाने के बजाय इसी स्थान पर भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क चौड़ीकरण का काम महत्वपूर्ण है, लेकिन आस्था, ऐतिहासिक विरासत और तकनीकी जटिलताओं के बीच अब सभी की निगाहें पुरातत्व विशेषज्ञों की जांच और स्कैनिंग रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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