जनता का पैसा है,हिसाब भी जनता के सामने साफ होना चाहिए...
बिजली जरूरी है,लेकिन बिजली के बिल का गणित रहस्य नहीं होना चाहिए !
ग्वालियर।एक उपभोक्ता जब गैस सिलेंडर खरीदता है तो उसे पता होता है कि निर्धारित कीमत क्या है। पेट्रोल-डीजल भरवाते समय भी पंप पर प्रति लीटर कीमत दिखाई देती है। लेकिन बिजली के बिल की कहानी कुछ अलग है। यहां उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि उसने जितनी बिजली खर्च की, उसके बदले आखिर कितने रुपये प्रति यूनिट चुकाए? ग्वालियर के एक घरेलू कनेक्शन के पिछले तीन महीनों के बिल इस सवाल को और गंभीर बना देता हैं।
- बिजली का बिल या गणित की पहेली?
- यूनिट बढ़ीं तो बिल बढ़ा, लेकिन यूनिट लगभग बराबर होने पर राशि में इतना बड़ा अंतर क्यों?
- तीन महीने के एक ही उपभोक्ता के बिल ने खड़े किए सवाल,
- विद्युत विभाग बताए, आखिर उपभोक्ता से प्रति यूनिट वास्तविक वसूली कितनी?
तीन महीने का हिसाब देखिए...
माह खपत/यूनिट बिल राशि प्रति यूनिट
जुलाई 2026, 156 यूनिट ₹1,290 ₹8.27/यूनिट
अगस्त 2026 132 यूनिट ₹296 ₹2.24/यूनिट
सितंबर 2026 180 यूनिट ₹1,600 ₹8.89/यूनिट
चलो एक बार यह भी मान लिया जाये कि यह बिल केवल कुल राशि ÷ कुल यूनिट का गणित है। इसे आधिकारिक ऊर्जा-शुल्क दर नहीं माना जा सकता, क्योंकि बिजली बिल में अन्य शुल्क/समायोजन और संभावित सब्सिडी शामिल हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल अगस्त के बिल पर...
जुलाई में 156 यूनिट की खपत पर ₹1,290 और सितंबर में 180 यूनिट पर ₹1,600 का बिल आया। वहीं अगस्त में 132 यूनिट की खपत के बावजूद बिल मात्र ₹296 है।
यानी अगस्त में 24 यूनिट कम खपत होने के साथ बिल में लगभग ₹1,000 से ज्यादा का अंतर दिखाई देता है।
यही वह जगह है जहां आम उपभोक्ता के सामने सवाल खड़ा होता है, अगर बिजली की कीमत केवल यूनिट के आधार पर तय होती है तो 132 यूनिट का बिल ₹296 और 156 यूनिट का बिल ₹1,290 कैसे?
और यदि इसका कारण सरकारी सब्सिडी, स्लैब, फिक्स्ड चार्ज, बिजली शुल्क, FPPAS अथवा किसी अन्य समायोजन में छिपा है, तो वह पूरा हिसाब उपभोक्ता को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता?
सरकार से सीधा सवाल: ₹1 की बिजली कितने में पड़ रही है?
मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग यानी MPERC ने FY 2026-27 के लिए घरेलू उपभोक्ताओं के लिए दरें निर्धारित की हैं। वर्तमान टैरिफ में 50 यूनिट तक की मासिक खपत के लिए 680 पैसे यानी ₹6.80 प्रति यूनिट, जबकि 50 यूनिट से अधिक खपत की स्थिति में संबंधित घरेलू श्रेणी के लिए ₹8.30 प्रति यूनिट ऊर्जा शुल्क निर्धारित है। इसके अलावा मासिक फिक्स्ड चार्ज भी है, शहरी क्षेत्र में 50 यूनिट से अधिक खपत वाली श्रेणी के लिए ₹154 प्रति किलोवाट और ग्रामीण क्षेत्र में ₹133 प्रति किलोवाट।
इसका अर्थ साफ है कि बिजली का बिल सिर्फ यूनिट × एक दर का साधारण गणित नहीं है। लेकिन यही बात आम उपभोक्ता के लिए परेशानी बनती है। उपभोक्ता को बिल देखकर यह समझ में आना चाहिए कि—
- ऊर्जा शुल्क = कितने रुपये
- फिक्स्ड चार्ज = कितने रुपये
- बिजली शुल्क = कितने रुपये
- FPPAS = कितने रुपये
- सब्सिडी = कितनी
- अन्य समायोजन = कितना
- अंतिम देय राशि = कितनी
MPERC के आदेश में FPPAS को मासिक आधार पर लागू करने और उसे उपभोक्ता के बिल में अलग से दिखाने का निर्देश भी है। सवाल बिजली विभाग की नीयत पर नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता पर है। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि बिजली विभाग मनमाने ढंग से प्रति यूनिट कोई भी रकम वसूल सकता है। टैरिफ नियामक आयोग द्वारा निर्धारित होता है।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि एक सामान्य उपभोक्ता अपने बिल को देखकर उस राशि तक पहुंचने का पूरा गणित आसानी से क्यों नहीं समझ पाता?
अगर किसी महीने 132 यूनिट पर ₹296 और दूसरे महीने 156 यूनिट पर ₹1,290 का बिल है, तो बिल में ऐसी स्पष्ट गणना होनी चाहिए जिससे उपभोक्ता को एक नजर में पता चल जाए कि ₹296 और ₹1,290 तक पहुंचने का गणित क्या है ?
हर उपभोक्ता को अपने बिल में कम से कम ये चीजें जरूर देखनी चाहिए...
- 1. पिछली और वर्तमान मीटर रीडिंग
- 2. कुल यूनिट खपत
- 3. ऊर्जा शुल्क
- 4. फिक्स्ड चार्ज
- 5. बिजली शुल्क/ड्यूटी
- 6. FPPAS अथवा अन्य समायोजन
- 7. सरकारी सब्सिडी
- 8. पिछले बकाया या समायोजन
- 9. अंतिम देय राशि
MP Madhya Kshetra Vidyut Vitaran Company की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026-27 का टैरिफ और FPPAS संबंधी आदेश उपलब्ध हैं।
‘पूछता है भारत’
जब गैस सिलेंडर पर कीमत लिखी होती है, पेट्रोल पंप पर प्रति लीटर कीमत दिखाई जाती है, तो बिजली उपभोक्ता को भी यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके बिल में एक यूनिट बिजली की वास्तविक लागत और उस पर लगाए गए प्रत्येक शुल्क का हिसाब क्या है?
विद्युत विभाग बताए...
- 156 यूनिट = ₹1,290 क्यों?
- 132 यूनिट = ₹296 क्यों?
- 180 यूनिट = ₹1,600 क्यों?
और सबसे महत्वपूर्ण...
उपभोक्ता के घर पहुंचने वाले बिल पर साफ-साफ क्यों न लिखा जाए कि कुल राशि में ऊर्जा शुल्क, फिक्स्ड चार्ज, टैक्स/ड्यूटी, FPPAS, सब्सिडी और अन्य शुल्क का कितना-कितना हिस्सा है?
विशेष - यह बिल 100 यूनिट तक बिजली जलाने (खर्च ) पर बिजली का बिल भी 100 रूपये तक ही आना है। यह मध्यप्रदेश शासन की एक योजना का हिस्सा है ! इसके बाद भी उपभोक्ता के इतने भारी भरकम बिल आना शासन की योजना पर ही संशय पैदा करते हैं ! क्या शासन लोक हितैसी योजनाएं संचालित करने का दिखावा भर कर रहा है ? क्योंकि 100 यूनिट से 1 यूनिट भी ज्यादा हो जाने पर विद्युत वितरण कंपनी लोगों से इसी प्रकार से अनाप-सनाप बिल वसूल रही है।
नोट: ऊपर की तीनों “प्रति यूनिट” दरें केवल बिल की कुल राशि को यूनिट से भाग देकर निकाली गई प्रभावी लागत हैं; इन्हें आधिकारिक टैरिफ दर बताना सही नहीं होगा। आधिकारिक टैरिफ में ऊर्जा शुल्क के साथ अन्य घटक भी होते हैं। इस अंतर को रिपोर्ट में स्पष्ट रखना इसे तथ्यात्मक रूप से मजबूत बनाता है।
उपभोक्ताओं को भी खबरदार रहने की जरूरत,सिर्फ कुल बिल देखकर भुगतान कर देना पर्याप्त नहीं है।




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