यहां आरोपों से दिक्कत नहीं है, लेकिन जिस तरह से उन पर आरोप लगाए गए, उस भाषा से दिक्कत है...
इंदौर में राहुल गांधी ने अजित डोभाल पर लगाए बहुत ही गंभीर बहुत आरोप !
राहुल गांधी क्या जानते हैं एनएसए अजित डोभाल के बारे में,आप अजित डोभाल को मुझसे ज्यादा जानते है? 81 साल के अजीत डोभाल आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। हमारे गाँव-घर में देख लीजिए किसी 81 साल के बुजुर्ग को। आपके बाबा या पिता की उम्र के होंगे। आप लोग उनकी सेवा करते होंगे। खाने-पीने से लेकर उनकी शौच करवाने तक से। सहारा लेकर चलते होंगे, आँखों से दिखाई नहीं देता होगा, डॉक्टर से कई-कई मर्ज बताए होंगे।
और दूसरी तरफ अजीत डोभाल हैं, जो आज भी देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद कोई छोटा-मोटा पद नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आज भी प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूची में अजीत डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर हैं। लेकिन यह आदमी यहाँ तक पहुँचा कैसे?
यह कहानी सिर्फ कुर्सी की नहीं है।
अजीत डोभाल 1968 बैच के IPS अधिकारी रहे। भारतीय पुलिस सेवा में आने के बाद उन्होंने तीन दशक से अधिक समय खुफिया सेवा में बिताया। उत्तर-पूर्व, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान और ब्रिटेन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम किया और बाद में Intelligence Bureau के निदेशक बने।
मिजोरम में उग्रवाद के दौर में उन्होंने भूमिगत मिजो नेशनल फ्रंट के बीच जाकर काम किया। ललडेंगा से संपर्क और बातचीत की प्रक्रिया में उनकी भूमिका बताई जाती है, जो आगे चलकर 1986 के मिजोरम समझौते तक पहुँची।
पंजाब में आतंकवाद के दौर में भी उन्होंने जोखिम भरा खुफिया काम किया। गोल्डन टेंपल में एक पाकिस्तानी एजेंट के रूप में अंदर जाकर आतंकियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने की उनकी भूमिका Operation Black Thunder से पहले की घटनाओं के संदर्भ में दर्ज है। इसी तरह उन्हें 1988 में कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।
1999 में IC-814 विमान अपहरण के दौरान वे भारत की ओर से बातचीत करने वाली टीम का हिस्सा रहे। संसद पर 2001 के आतंकी हमले के बाद भी वे IB की आतंकवाद-रोधी जिम्मेदारियों से जुड़े रहे।
यानी जिस आदमी के बारे में आज राजनीतिक मंचों से बातें कही जा रही हैं, उसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा ऐसे काम में बिताया है, जहाँ सफलता की खबर अक्सर अखबार में नहीं आती और असफलता की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।
हाँ, इस हिस्से को ज्यादा गहराई देकर आम आदमी को खुफिया अधिकारी की असली भूमिका और उसके काम की प्रकृति समझाई जा सकती है। आपके मूल भाव को रखते हुए यह हिस्सा ऐसे बेहतर बैठेगा:
खुफिया अधिकारी का काम ही ऐसा होता है। वह सामने दिखाई नहीं देता। वह सीमा पर वर्दी पहनकर खड़ा दिखाई नहीं देता। वह हाथ में बंदूक लेकर किसी चौकी पर खड़ा नजर नहीं आता। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह नहीं बताता कि उसने रात कहाँ बिताई, किससे मिला, किससे बात की और किस खतरे के बीच काम करके वापस आया। क्योंकि उसका सबसे बड़ा हथियार कई बार उसकी बंदूक नहीं, उसकी पहचान छिपी रहना होता है। एक सैनिक सीमा पर दुश्मन को दिखाई देता है, लेकिन एक खुफिया अधिकारी का काम अक्सर यह होता है कि दुश्मन को पता ही न चले कि उसकी गतिविधियों पर नजर कौन रख रहा है। वह दुश्मन के बीच रहकर जानकारी जुटा सकता है। किसी आतंकवादी संगठन की योजना का पता लगा सकता है। किसी संभावित हमले की सूचना समय रहते देश की सुरक्षा एजेंसियों तक पहुँचा सकता है।
किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँच बना सकता है, जहाँ सामान्य आदमी का पहुँचना संभव नहीं होता। और सबसे बड़ी बात, वह जो जानता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा वह अपने परिवार को भी नहीं बता सकता। सोचिए, एक आम आदमी रात को घर लौटकर अपनी पत्नी से कह सकता है कि आज ऑफिस में क्या हुआ। अपने दोस्तों से कह सकता है कि आज कहाँ गया था। सोशल मीडिया पर फोटो डाल सकता है कि कहाँ घूमने गया।
लेकिन एक खुफिया अधिकारी? वह अपने काम की सफलता का श्रेय भी सार्वजनिक रूप से नहीं ले सकता। कई बार जिस खतरे को उसने टाल दिया, देश को कभी पता ही नहीं चलता कि खतरा था क्या।
जिस हमले को होने से पहले रोक दिया गया, उसकी खबर शायद कभी अखबार में नहीं आती। जिस सूचना ने किसी जवान की जान बचाई, उसका नाम शायद कभी सामने नहीं आता। और जिस ऑपरेशन में उसने अपनी जान जोखिम में डाली, उसकी पूरी कहानी शायद उसकी जिंदगी में भी कभी सार्वजनिक न हो।
यही खुफिया दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना है -आपने देश के लिए क्या किया, यह साबित करने के लिए आपके पास हमेशा सबूत दिखाने की आजादी भी नहीं होती।
क्योंकि अगर आप सब कुछ बता देंगे, तो अगली बार आपकी जानकारी, आपके संपर्क और आपके तरीके ही खतरे में पड़ सकते हैं। इसलिए खुफिया अधिकारी की सफलता कई बार उसकी प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि उसकी गुमनामी में छिपी होती है। देश सुरक्षित है और किसी को पता भी नहीं कि खतरा कितना बड़ा था, कई बार यही उसकी सबसे बड़ी सफलता होती है।
और शायद इसी वजह से किसी खुफिया अधिकारी के पूरे जीवन को केवल उन चीजों से नहीं नापा जा सकता जो अखबारों की सुर्खियों में आईं। जो दिखाई देता है, वह कहानी का सिर्फ एक छोटा हिस्सा हो सकता है। बाकी कहानी अक्सर उन फाइलों में बंद रहती है, जिन्हें देश की सुरक्षा के कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।और आज वही आदमी 81 साल की उम्र में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी संभाल रहा है।
अब राहुल गांधी से एक सवाल है। आप नेता हैं। देश के बड़े राजनीतिक दल के प्रमुख नेताओं में हैं। सवाल पूछना आपका अधिकार है। अजीत डोभाल पर सवाल उठाइए, उनके काम की आलोचना कीजिए, उनके फैसलों पर बहस कीजिए। लेकिन क्या आपने कभी उनके पूरे सार्वजनिक जीवन को भी देखा है?
कभी उनके उस दौर को देखा है जब वे ऐसे इलाकों में काम कर रहे थे जहाँ सामान्य आदमी जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता? कभी यह देखा है कि 1968 में IPS की सेवा शुरू करने वाला एक अधिकारी तीन दशक से ज्यादा समय तक देश की खुफिया व्यवस्था में काम करते हुए किस तरह की जिम्मेदारियों से गुजरा? और फिर 81 साल की उम्र में भी उसी देश की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी संभाल रहा है?
मेरा सवाल सिर्फ राहुल गांधी से नहीं है।मेरा सवाल हम सब से है...
हम अपने घर के 81 साल के बुजुर्ग को देखकर कहते हैं,“अब इनकी उम्र आराम करने की है।” लेकिन देश में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो 81 साल की उम्र में भी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटते।
अजीत डोभाल उन लोगों में से एक हैं।
राहुल गांधी जी, आप राजनीति में हैं। आपका सार्वजनिक जीवन भी देश के सामने है। इसलिए एक दिन अपने आपको और अजीत डोभाल को एक ही तराजू पर रखकर देखने की जरूरत नहीं है,बल्कि दोनों के सार्वजनिक जीवन को सामने रखकर देश की जनता को यह देखने दीजिए कि किस व्यक्ति ने अपने जीवन में कौन-कौन सी जिम्मेदारियाँ निभाईं और देश के लिए क्या योगदान दिया।
क्योंकि सवाल पूछना लोकतंत्र है...
लेकिन किसी व्यक्ति के पूरे जीवन को जाने बिना उसके बारे में बोल देना, यह बात सोचने की जरूरत जरूर पैदा करती है। और आखिर में अजीत डोभाल जी से देश को एक प्रेरणा मिलती है...उम्र शरीर की होती है, जिम्मेदारी की नहीं। 81 साल की उम्र में भी अगर आदमी देश के लिए खड़ा है, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं,एक संकल्प है।




0 Comments