G News 24 : लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है,लेकिन देश को अस्थिर करने का अधिकार किसी को नहीं है !

 आंदोलनों की आड़ लेकर अराजकता का खेल कब तक  ...?

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है,लेकिन देश को अस्थिर करने का अधिकार किसी को नहीं है !

 इसकी शुरुआत सरकार से नहीं,हर नागरिक की जागरूकता से होनी चाहिए...

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सरकार के फैसलों से असहमति जताना, अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करना और शांतिपूर्ण आंदोलन करना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि जब आंदोलन लोकतांत्रिक विरोध की सीमा लांघकर सार्वजनिक व्यवस्था, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करने लगे, तब उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा सीमा के आसपास समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं और विभिन्न स्थानों पर एक साथ उभरते आंदोलन अब एक और गंभीर सवाल खड़ा करते हैं, क्या ये घटनाएं केवल अलग-अलग स्थानीय असंतोष का परिणाम हैं, या इनके पीछे किसी स्तर पर सुनियोजित समन्वय, राजनीतिक हित या बाहरी उकसावे की भूमिका भी हो सकती है? यह सवाल किसी निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच की मांग के रूप में पूछा जाना चाहिए।

अगर अलग-अलग राज्यों में समान समय पर समान प्रकृति के आंदोलन, समान नारों और समान रणनीतियों के साथ गतिविधियां दिखाई दें, तो सुरक्षा और जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना जरूरी है कि इनके पीछे वास्तविक जन असंतोष है या किसी संगठित नेटवर्क द्वारा लोगों की भावनाओं को प्रभावित किया जा रहा है।

आंदोलन जनता का अधिकार है,अराजकता किसी का अधिकार नहीं...

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछे जाने चाहिए। नीतियों की आलोचना होनी चाहिए। गलत फैसलों का विरोध भी होना चाहिए। लेकिन विरोध का अर्थ यह नहीं हो सकता कि सड़कें बंद हों, आम नागरिक परेशान हों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे, पुलिस और प्रशासन से टकराव हो या बच्चों को राजनीतिक संघर्ष में आगे कर दिया जाए।

आंदोलनों में की नैतिक ताकत शांति, तथ्य और जनहित में होती है,भीड़,उत्तेजना और टकराव में नहीं...

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों दोनों को आत्ममंथन करना होगा। यदि किसी आंदोलन में वास्तविक जनसमस्या है तो सरकार को उसे सुनना चाहिए। और यदि आंदोलन के नाम पर कानून हाथ में लेने की कोशिश हो रही है तो प्रशासन को बिना राजनीतिक पक्षपात के कानून लागू करना चाहिए।

दिल्ली,पंजाब-हरियाणा,झारखंड और राजस्थान के प्रदर्शनों में क्या कोई बड़ा सवाल छिपा है?

एक ही समयावधि में अलग-अलग राज्यों और संवेदनशील क्षेत्रों में आंदोलनकारी गतिविधियों का तेज होना अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है। लेकिन क्या इनके बीच किसी प्रकार का समन्वय है? क्या सोशल मीडिया के माध्यम से एक ही तरह के संदेश अलग-अलग स्थानों पर प्रसारित किए जा रहे हैं? क्या कुछ संगठन या राजनीतिक समूह पर्दे के पीछे से इन गतिविधियों को दिशा दे रहे हैं? क्या किसी बाहरी नेटवर्क द्वारा लोगों की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक अस्थिरता के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?

सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, निष्पक्ष जांच और प्रमाण से मिलना चाहिए।

यदि जांच में ऐसा कुछ नहीं मिलता तो संदेह स्वतः समाप्त हो जाएगा। लेकिन यदि कोई संगठित तंत्र सामने आता है, तो उसकी जानकारी जनता के सामने आनी चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में सुनियोजित अराजकता को भी लोकतंत्र का नाम देकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

‘भीड़’ लोकतंत्र का विकल्प नहीं बन सकती !

आज सोशल मीडिया के दौर में कुछ तस्वीरों, वीडियो और नारों के माध्यम से माहौल तेजी से बनाया जा सकता है। किसी भी मुद्दे को भावनात्मक रूप देकर हजारों लोगों को सड़क पर उतारना संभव है। लेकिन लोकतंत्र की असली शक्ति भीड़ की संख्या में नहीं, संवैधानिक संस्थाओं, कानून और संवाद की व्यवस्था में है। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता ने उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने के लिए चुना है, व्यवस्था को बाधित करने के लिए नहीं। और जनता को भी समझना होगा कि हर भीड़ जनमत नहीं होती और हर नारा सत्य नहीं होता।

बच्चों को राजनीति की सीढ़ी मत बनाइए...

सबसे बड़ा प्रश्न उन लोगों से है जो अपने राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष में नाबालिगों को आगे करते हैं।जिस उम्र में बच्चे नागरिक शास्त्र की किताबों में लोकतंत्र पढ़ रहे हैं, उस उम्र में उन्हें राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा बनाना उनके भविष्य के साथ अन्याय है। किशोर मन को राजनीतिक उत्तेजना का माध्यम बनाना किसी भी विचारधारा की जीत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी से बचना है। राजनीति करनी है तो स्वयं सामने आइए। अपने तर्क रखिए। सरकार से सवाल पूछिए। अदालत जाइए। संसद और विधानसभाओं में आवाज उठाइए। लोकतांत्रिक संस्थाओं का इस्तेमाल कीजिए।

राजनीतिक स्वार्थ और वास्तविक जनसमस्या के बीच फर्क जरूरी है...

किसी किसान की समस्या वास्तविक हो सकती है। किसी छात्र की मांग जायज हो सकती है। किसी कर्मचारी की शिकायत गंभीर हो सकती है। किसी समुदाय को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार हो सकता है। लेकिन इन वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अलग बात है। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब वास्तविक जनसमस्या को भावनात्मक नारों, सोशल मीडिया प्रचार और भीड़ की राजनीति में बदल दिया जाता है। तब समस्या का समाधान पीछे छूट जाता है और राजनीतिक टकराव आगे आ जाता है।

‘राजनीतिक गिद्धों’ से देश को बचाने की जिम्मेदारी किसकी?

देश को अस्थिर करने की किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि बिना प्रमाण किसी पूरे समुदाय, किसान, छात्र, धार्मिक समूह या आंदोलनकारी वर्ग को देशविरोधी घोषित न किया जाए। 

देशभक्ति का प्रमाण केवल नारे लगाने से नहीं, संविधान और कानून के सम्मान से मिलता है। उसी तरह देशविरोध का आरोप भी भावनाओं के आधार पर नहीं, प्रमाण और कानून के आधार पर तय होना चाहिए। राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक विभाजन पैदा करना, जनता की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक हथियार बनाना और हर असहमति को संघर्ष में बदल देना, इन प्रवृत्तियों से लोकतंत्र कमजोर होता है।

पूछता है भारत...

  • क्या आंदोलन का मतलब सड़क रोकना है?
  • क्या बच्चों को राजनीतिक संघर्ष में उतारना लोकतंत्र है?
  • क्या भीड़ की ताकत संवैधानिक संस्थाओं से बड़ी हो सकती है?
  • क्या सरकार का विरोध करने के लिए कानून की सीमाएं तोड़ी जा सकती हैं?
  • क्या अलग-अलग राज्यों में एक ही समय पर उभरती आंदोलनकारी गतिविधियों के बीच किसी समन्वय की जांच नहीं होनी चाहिए?
  • क्या सोशल मीडिया के जरिए किसी आंदोलन को संगठित या उग्र बनाने वाले नेटवर्क की पहचान नहीं होनी चाहिए?
  • और क्या राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल सत्ता पाने तक है, या लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत रखना भी उनकी जिम्मेदारी है?

  1. भारत को आंदोलन चाहिए,लेकिन जिम्मेदार आंदोलन।
  2. भारत को विरोध चाहिए,लेकिन शांतिपूर्ण विरोध।
  3. भारत को सवाल चाहिए,लेकिन तथ्यों के साथ सवाल।
  4. भारत को राजनीति चाहिए,लेकिन राष्ट्रहित और संविधान की मर्यादा के भीतर।
  5. देश किसी एक दल, संगठन, विचारधारा या आंदोलन का नहीं है। देश हर भारतीय का है।

इसलिए अब समय आ गया है कि राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर एक स्पष्ट संदेश दिया जाए...—

सरकार से सवाल कीजिए लेकिन देश की शांति, कानून और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कीमत पर नहीं। और यदि पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा सीमा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ घटनाक्रम उभरते हैं, तो न तो हर आंदोलन को साजिश मान लेना उचित है और न ही किसी संभावित समन्वित प्रयास की आशंका को बिना जांच के खारिज करना। सवाल उठना चाहिए। निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। तथ्य सामने आने चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं जब जनता सवाल पूछती है, बल्कि वह है जब जनता के सवालों के पीछे छिपकर कोई और एजेंडा चलाया जाए। भारत को आंदोलनकारियों से नहीं, अराजकता और उसके पीछे छिपे संभावित स्वार्थों से सावधान रहना होगा।

और इस सावधानी की शुरुआत सरकार से नहीं,हर नागरिक की जागरूकता से होनी चाहिए।

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