G NEWS 24 : शहर हुआ जलमग्न,बारिश ने दिखा दी व्यवस्था की असल तस्वीर !

24 घंटे की बारिश ने खोल दी “स्मार्ट सिटी” के विकास की पोल...

शहर हुआ जलमग्न,बारिश ने दिखा दी व्यवस्था की असल तस्वीर !

स्मार्ट सिटी की सड़कें इतनी ‘स्मार्ट’ निकलीं कि बारिश आते ही खुद समझ गईं-अब नीचे बैठने का समय आ गया है!

लगभग दो महीने तक बरसात की बाट जोह रहे ग्वालियर संभाग के लोगों के लिए सोमवार रात करीब 8 बजे शुरू हुई हल्की रिमझिम फुहारें किसी राहत और खुशी की सौगात बनकर आई थीं। लोगों को उम्मीद थी कि आसमान से बरसने वाली यह बारिश गर्मी और उमस से राहत देगी, खेतों में नई उम्मीद जगाएगी और शहर के वातावरण को खुशनुमा बनाएगी। लेकिन देखते ही देखते रिमझिम फुहारें झमाझम बारिश में बदल गईं और करीब 24 घंटे तक लगातार बरसते बादलों ने ग्वालियर शहर की व्यवस्थाओं की ऐसी परीक्षा ली कि “स्मार्ट सिटी” के विकास की चमक पानी में बहती दिखाई देने लगी।

महज 24 घंटे की बारिश में शहर की अनेक सड़कें जलमग्न हो गईं। कहीं मुख्य मार्ग तालाब जैसे नजर आए, तो कहीं गलियों और कॉलोनियों में पानी भरने से लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया। कई स्थानों पर सड़कें धंस गईं और कुछ जगह सड़कें इस तरह उखड़ गईं, मानो बारिश ने विकास कार्यों की गुणवत्ता की परतें भी अपने साथ बहा दी हों। वैसे ग्वालियर में सड़कों का धंसना कोई नई घटना नहीं है। शहर के नागरिक वर्षों से सड़क निर्माण, सीवर लाइन, ड्रेनेज व्यवस्था और बार-बार होने वाली खुदाई के बाद बनने वाली बदहाल सड़कों का दर्द झेलते आए हैं। 

लेकिन जब से ग्वालियर को “स्मार्ट सिटी” का दर्जा मिला है, तब से शहर में विकास कार्यों की संख्या तो बढ़ी है, मगर कई स्थानों पर सड़कों की गुणवत्ता और जल निकासी व्यवस्था पर सवाल भी उतने ही गंभीर होते गए हैं। विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि एक दिन की तेज बारिश शहर की सड़कों को जलमग्न कर दे, सड़कें धंसने लगें और नागरिकों को जलभराव के बीच आवागमन करना पड़े, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास की योजना बनाते समय बारिश और जल निकासी की व्यवस्था को किस प्राथमिकता के साथ देखा गया?

जब जलभराव और बदहाल सड़कों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए नगर निगम आयुक्त और शहर कलेक्टर अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ सड़कों पर निकले, तो शहर की स्थिति देखकर प्रशासनिक अमले को भी शायद पहली बार यह एहसास हुआ होगा कि कागजों और प्रस्तुतियों में दिखाई देने वाला विकास, जमीन पर कितना मजबूत है। कई स्थानों पर जलभराव, टूटी सड़कें, धंसे हुए हिस्से और अव्यवस्थित नालियों की तस्वीरें यह सवाल पूछ रही थीं कि आखिर करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है? 

क्या निर्माण कार्यों की समय-समय पर तकनीकी जांच हुई? क्या जल निकासी के लिए बनाई गई योजनाएं धरातल पर प्रभावी हैं? और यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है, तो फिर पहली बड़ी बारिश में शहर की सड़कें जवाब क्यों दे गईं? बारिश प्राकृतिक है, लेकिन हर वर्ष होने वाली बारिश से निपटने की तैयारी प्रशासन और नगर निगम की जिम्मेदारी है। नागरिकों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे हर मानसून में जलभराव, टूटी सड़कों, धंसे हुए मार्गों और यातायात अव्यवस्था को अपनी नियति मान लें।

ग्वालियर को केवल आधुनिक इमारतों, चमकदार चौराहों और आकर्षक परियोजनाओं से स्मार्ट नहीं बनाया जा सकता। शहर तब स्मार्ट कहलाएगा, जब उसकी सड़कें टिकाऊ होंगी, नालियां समय पर साफ होंगी, जल निकासी की व्यवस्था प्रभावी होगी और बारिश के बाद नागरिकों को सड़कों पर नाव चलाने जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा। 24 घंटे की बारिश ने शहर को केवल पानी-पानी नहीं किया, बल्कि विकास कार्यों की गुणवत्ता, योजनाओं की तैयारी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब जरूरत केवल निरीक्षण, फोटो खिंचवाने और अधिकारियों की बैठक करने की नहीं है। जरूरत है कि जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान किया जाए, धंसी हुई सड़कों की तकनीकी जांच हो, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जवाबदेही तय की जाए और लापरवाही पाए जाने पर संबंधित एजेंसियों व अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो। क्योंकि जनता को बारिश से कोई शिकायत नहीं है…शिकायत उस व्यवस्था से है, जो हर साल बारिश आने के बाद ही जागती है!

पूछता है ग्वालियर…

  • यदि केवल 24 घंटे की बारिश में सड़कें जलमग्न और धंस सकती हैं, तो करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की गुणवत्ता की जांच आखिर किसने की?
  • क्या स्मार्ट सिटी का विकास केवल कागजों, प्रस्तुतियों और उद्घाटनों तक सीमित है, या शहरवासियों को मजबूत सड़कें और बेहतर जल निकासी भी मिलेगी?

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