विपक्ष की भी तय हो जवाबदेही...
संसद में हर मुद्दे पर हंगामा करने वालों से सवाल,संसद में काम कब करेंगे !
जनहित पर बहस नहीं, राजनीति का आयोजन फिर जनता पूछेगी नहीं तो कौन पूछेगा?”
भारत युवाओं का देश है। यह देश केवल युवा आबादी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि युवाओं की प्रतिभा, मेहनत, जागरूकता और राष्ट्र निर्माण की क्षमता से मजबूत बनता है। आज का पढ़ा-लिखा और समझदार युवा किसी के बहकावे में आंख बंद करके आने वाला नहीं है। वह सोशल मीडिया पर चल रहे हर दावे को सच नहीं मानता, बल्कि सवाल करता है, तथ्यों को परखता है और अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेना चाहता है।
देश का जिम्मेदार युवा अपनी शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, परिवार और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करता है। वह अपने काम से मतलब रखता है और अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन युवाओं की इसी गंभीरता और राजनीतिक निष्पक्षता का फायदा उठाने की कोशिश कुछ स्वार्थी राजनीतिक दल और उनके नेता करते दिखाई देते हैं।
जब जनता के बीच अपनी बात और नीतियों के आधार पर विश्वास जीतना कठिन हो जाता है, तब कुछ लोग झूठे दावों, भ्रामक प्रचार, भावनात्मक नारों और सुनियोजित राजनीतिक एजेंडे के सहारे युवाओं को भड़काने का प्रयास करते हैं। युवाओं की वास्तविक समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने के बजाय उन्हें विरोध और राजनीतिक संघर्ष का चेहरा बनाने की कोशिश की जाती है।
समाधान खोजने के बजाय उन्हें विरोध और राजनीतिक संघर्ष
जो लोग युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित करते हैं, क्या वे स्वयं संसद में अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं? जो लोग हर मुद्दे पर आंदोलन का आह्वान करते हैं, क्या उनके पास उन समस्याओं का कोई ठोस और व्यावहारिक समाधान भी है? जो जनप्रतिनिधि जनता के वोट से संसद पहुंचते हैं, क्या उनका पहला कर्तव्य संसद में बैठकर जनहित के मुद्दों पर चर्चा करना नहीं है?
संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। वहां सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन विरोध के नाम पर बार-बार संसद की कार्यवाही बाधित करना, बहस से दूर रहना और फिर संसद परिसर को धरना-प्रदर्शन तथा राजनीतिक नाटक का मंच बना देना, क्या यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वहन है?
जनता के खून-पसीने की कमाई से वसूले गए टैक्स से सांसदों को वेतन, भत्ते और अनेक सुविधाएं मिलती हैं। यह सुविधा किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की मेहनत से प्राप्त संसाधन हैं। इसलिए जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि जिन प्रतिनिधियों को संसद में देश की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए चुना गया, वे संसद को सुचारु रूप से चलने देने में सहयोग क्यों नहीं करते?
पूछता है भारत…
जनता के टैक्स से वेतन और सुविधाएं लेने वाले जनप्रतिनिधि संसद में जनहित की बहस करने के बजाय केवल राजनीतिक प्रदर्शन क्यों करते हैं? यदि संसद में काम ही नहीं होगा, तो जनता के मुद्दों का समाधान कहां होगा? क्या संसद को बाधित करने वाले जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए? क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि संसद में कितने दिन उपस्थित रहे और उन्होंने जनहित के कितने मुद्दे उठाए?
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध और व्यवधान में अंतर होता है। विरोध का उद्देश्य सरकार को जवाबदेह बनाना और जनता की समस्याओं का समाधान कराना होना चाहिए। यदि विरोध केवल राजनीतिक लाभ, मीडिया की सुर्खियों और सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाए, तो जनता को उसकी मंशा पर सवाल उठाने का अधिकार है।
देश के युवाओं को भी अब यह समझना होगा कि हर आंदोलन जनहित का आंदोलन नहीं होता और हर नारा सच्चाई का प्रमाण नहीं होता। कई बार राजनीतिक दल अपनी कमजोर होती जमीन को बचाने और जनता का ध्यान भटकाने के लिए युवाओं की भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं।
युवाओं को किसी भी आंदोलन का हिस्सा बनने से पहले यह पूछना चाहिए...
- इस आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
- समस्या का समाधान क्या है?
- क्या मांगें वास्तव में युवाओं और देश के हित में हैं या किसी राजनीतिक दल के हित में?
- जो लोग युवाओं को संघर्ष के लिए प्रेरित कर रहे हैं, क्या वे स्वयं अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन कर रहे हैं?
- क्या युवाओं की ऊर्जा का उपयोग राष्ट्र निर्माण के लिए होगा या उन्हें राजनीतिक स्वार्थों का मोहरा बनाया जाता रहेगा?
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में आंदोलन करने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए जनजागरण की है। युवाओं को किसी पार्टी का मोहरा नहीं, बल्कि देश और लोकतंत्र का सजग प्रहरी बनना होगा। देश के युवाओं को यह मांग उठानी चाहिए कि संसद में जनहित की बहस हो, सरकार से गंभीर सवाल पूछे जाएं, विपक्ष ठोस सुझाव दे और जनता के प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें। जो सांसद केवल हंगामा, प्रदर्शन और राजनीतिक नाटक को प्राथमिकता देते हैं, उनसे जनता को लोकतांत्रिक तरीके से जवाब मांगना चाहिए।
भारत का युवा अब केवल नारे सुनने वाला नहीं है। वह यह भी जानना चाहता है कि उसके नाम पर कौन राजनीति कर रहा है और उसके भविष्य के लिए कौन वास्तविक काम कर रहा है। देश के युवाओं को किसी के बहकावे में आने के बजाय अपनी बुद्धि, विवेक और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा। उन्हें झूठे प्रचार, भ्रामक एजेंडे और भावनात्मक उकसावे से ऊपर उठकर यह तय करना होगा कि कौन देशहित की बात कर रहा है और कौन केवल सत्ता के लिए युवाओं की भावनाओं का उपयोग कर रहा है।
पूछता है भारत…
- क्या जनता के टैक्स से वेतन और सुविधाएं पाने वाले जनप्रतिनिधियों को संसद में काम करने के लिए जवाबदेह नहीं बनाया जाना चाहिए?
- क्या संसद की कार्यवाही बाधित करने वालों से जनता को हिसाब नहीं मांगना चाहिए?
- क्या युवाओं को भड़काने और गुमराह करने वाली राजनीति के खिलाफ भी एक जागरूक जनआंदोलन नहीं होना चाहिए?
- और क्या भारत का युवा अब यह तय नहीं करेगा कि वह किसी राजनीतिक दल का मोहरा नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है?
युवा जागरूक होगा, तो झूठ का एजेंडा कमजोर पड़ेगा, युवा सवाल करेगा, तो राजनीतिक जवाबदेही तय होगी ,और जब युवा राष्ट्रहित के साथ खड़ा होगा, तब देश को भ्रम और स्वार्थ की राजनीति से बचाना आसान होगा।क्योंकि अब सवाल केवल राजनीति का नहीं भारत के भविष्य का है!
और इसलिए… पूछता है भारत…
- युवाओं को भड़काने वालों से जवाब कौन मांगेगा?
- झूठ और भ्रम के सहारे राजनीतिक माहौल बनाने वालों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
- देश में अविश्वास और अराजकता का वातावरण बनाने की कोशिशों पर जनता कब सवाल उठाएगी?



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