राहुल गांधी पॉलिटिकल एक्सिस्टेंस के लिए कंटेंट क्रिएटर के रूप में भी सक्सेसफुल नहीं हैं...
बहन का क्रिएशन था“लड़की हूं लड़ सकती हूं”,अब भाई का“लड़का हूं लड़की के लिए लड़ सकता हूं”अभियान!
पितृसत्ता के खिलाफ उसी के प्रतीक राहुल गांधी स्त्री शक्ति को मनुस्मृति का शर्मनाक पाठ पढ़ा रहे थे. छात्रों की गूंज महिला स्पेशल में अगर कोई महिला ही लीड करती महिला सत्ता की बात शोभा देती. प्रियंका गांधी हो सकती थीं. “लड़की हूं लड़ सकती हूं”, यह अभियान प्रियंका गांधी ने ही लीड किया था. अब राहुल गांधी इसको बदलकर “लड़का हूं लड़की के लिए लड़ सकता हूं”, अभियान चला रहे हैं.
राहुल गांधी पॉलिटिकल एक्सिस्टेंस के लिए कंटेंट क्रिएटर के रूप में सक्सेसफुल नहीं हैं. मैंडेट में उनकी कोई भी बात अब तक तो प्रभाव स्थापित नहीं कर पाई है. इसका कारण शायद यह है कि उनके सारे विचार पाखंड और विरोधाभासी होते हैं. जिस गूंज में हजारों लड़कियां उपस्थित हों, उसमें मनुस्मृति के अलावा दूसरे धर्मों की लड़कियां जरूर होंगी. फिर राहुल गांधी लड़कियों को लेकर किसी एक धर्म के ग्रंथ का संदर्भ क्यों दे रहे हैं. उनका लक्ष्य उस धर्म को बदनाम करने के अलावा क्या हो सकता है. क्या दूसरे धर्म में स्त्रियों के लिए कुरीतियां नहीं हैं. मनुस्मृति में तो यह भी लिखा है, कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता.
उनके विचार पर देश का भरोसा तब बढ़ता जब वह निष्पक्षता के साथ सभी धर्म की कुरीतियों पर प्रकाश डालते. हिंदू धर्म की जो भी लड़कियां उस कार्यक्रम में होंगी उनके साथ ना तो कोई पिता दिखाई पड़ रहे थे ना ही कोई दूसरा पुरुष. इसका मतलब है कि सभी लड़कियां स्वेच्छा से स्वतंत्रता पूर्वक इस इवेंट में आई होंगी. जहां इतनी राजनीतिक स्वतंत्रता है, वहां लड़कियों को सामाजिक कंट्रोल की बात करना अपने आप में बेमानी है.
पितृसत्ता की बात करने वाले यह तो जानते ही होंगे, कि कोई भी पिता बिना माता के नहीं बन सकता. दोनों के संतुलन, सामंजस्य और संस्कृति की परंपराओं को अपनाने के बाद ही पिता बना जा सकता है. पितृसत्ता में ही मातृसत्ता समाहित है. इसे स्त्री शक्ति से अलग देखना ही बुद्धहीनता के अलावा कुछ नहीं है.
मनुस्मृति को कोई भी धर्म अपने ऑफिशियल ग्रंथ के रूप में नहीं स्वीकारता. खास करके राजनीतिक और सरकारी सिस्टम तो संविधान के अंतर्गत चलता है. संविधान के शासन में मनुस्मृति का सहारा लेकर हिंदुओं को विभाजित करने की कोशिश नई नहीं है. मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस का पुराना टेस्टेड फॉर्मूला है. मनुस्मृति इसी के लिए उपयोग की जा रही है. इसके सहारे हिंदुओं को जातियों में स्त्री-पुरुष में बांटना वास्तविक लक्ष्य है.
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को रिजर्वेशन का मामला चार दशक से कांग्रेस की सरकारों में लटका हुआ था. वर्तमान सरकार ने नारीवंदन विधेयक पारित किया. अब उसे लागू करनेके लिए संविधान संशोधन का कांग्रेस ही विरोध कर रही है. राहुल गांधी का महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण इसी से समझा जा सकता है. वंदे मातरम के दो और पूर्ण छंदों पर कांग्रेस संविधान के तहत संसद से पारित कानून को मानने से इनकार कर रही है. इसका कारण भी केवल वोट बैंक का तुष्टिकरण है.
जिन छंदों के गायन पर कांग्रेस को आपत्ति है, उसमें यही कहा जा रहा है कि उनमें हिंदू देवी देवताओं की वंदना है. उन छंदों में जिन देवियों की वंदना है वह सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी स्त्री शक्ति का ही प्रतीक हैं. गूंज में तो स्त्री शक्ति के समर्थन का दिखावा करते हैं लेकिन राष्ट्र वंदना में स्त्री शक्ति के उद्घोष को गाने से इनकार करते हैं.
समान नागरिक संहिता महिलाओं को समानता देने का बहुत बड़ा माध्यम है. इसका कांग्रेस विरोध करती है. इसके पीछे भी वोट बैंक के तुष्टिकरण की ही राजनीति है. महिलाओं के हक में लाए तीन तलाक के संशोधन का भी कांग्रेस ने विरोध किया. ऐतिहासिक फ़ैसले जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो को गुजारा भत्ता देने का निर्णय दिया था, कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने उस समाज की पितृसत्ता के सामने घुटने टेकते हुए संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया था.
अभी हाल ही में रचनात्मक कांग्रेस के एक इवेंट में राहुल गांधी ने कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के साथ मिलकर इटली की महिला प्रधानमंत्री के लिए जो नाटक किया था वह स्त्रियों के प्रति उनके नकारात्मक दृष्टिकोण को ही स्थापित करता है.
गांधी परिवार की पितृसत्ता के माइंडसेट ने प्रियंका गांधी को पीछे कर राहुल गांधी को राजनीति में उतारा. अभी भी कांग्रेस में प्रियंका गांधी की स्थिति निर्णायक नेताओं की नहीं है. सारे अधिकार पितृसत्ता राहुल गांधी के पास ही सीमित है. कांग्रेस पार्टी में भी राहुल गांधी का कब्जा है. नेता प्रतिपक्ष के रूप में भी उन्हीं का अधिकार है. इसे कौन सी सत्ता कहा जा सकता है.
अब कांग्रेस में महिलाओं की स्थिति देखकर ही महिलाओं के प्रति उनकी सही सोच उजागर हो जाएगी. देश के किसी भी राज्य में प्रदेश कांग्रेस कमेटी की प्रेसिडेंट कोई भी महिला नहीं है. हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में एक भी महिला मंत्री नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के भीतर महिलाओं की समुचित भागीदारी नहीं है.
पीआर एजेंसी हर इवेंट में राहुल गांधी का ड्रेस बदलवा देती है. इससे मैंडेट कैसे बदल सकता है. अगर राजनीति के वर्तमान नेताओं में देखा जाए तो राहुल गांधी सबसे सफल कंटेंट क्रिएटर माने जा सकते हैं. उनका हर इवेंट सोशल मीडिया पर अटेंशन खींच रहा है. जहां इवेंट है वहां पेड और अनपेड सब तरह की व्यवस्थाएं होती हैं. पीआर एजेंसी बिना पैसे के काम नहीं करती. इन्फ्लूएंसर पैसे के लिए ही वीडियो बनाते हैं.
देश में कोई भी मनुस्मृति की चर्चा नहीं करता.वही नेता इसकी चर्चा करते हैं जो इसके सहारे हिंदुओं को बांटना चाहते हैं. अब उसका नया बीड़ा राहुल गांधी ने उठाया है. तुष्टीकरण के लिए ममता बनर्जी से ज्यादा कट्टर बनने में राहुल गांधी को थोड़ा समय लगेगा. उन्हें ममता बनर्जी का हश्र जरूर याद रखना चाहिए. मनुस्मृति के नाम पर हिंदुओं की निंदा और मुस्लिम स्तुति सियासी राजा की राहुलस्मृति से कांग्रेस को क्या हासिल होगा, यह तो वक्त बताएगा.




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