G News 24 : चांद के दक्षिणी ध्रुव में भारत से पिछड़ा चीन,अब कर रहा बराबरी की कोशिश !

 चीन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चांगई-7 मिशन लॉन्च करने की तैयारी में ...

चांद के दक्षिणी ध्रुव में भारत से पिछड़ा चीन,अब कर रहा बराबरी की कोशिश !

चीन जल्द ही चांद के लिए अपना नया चंद्र मिशन लॉन्च करने वाला है। जानकारी के मुताबिक, अपने चांगई-7 मिशन को चीन सोमवार सुबह से लेकर अगले कुछ दिनों में सही मौका देखकर लॉन्च कर सकता है। चीन का यह मिशन इस लिए भी अहम है, क्योंकि इसके जरिए वह चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपना रोवर उतारना चाहता है, जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। मजेदार बात यह है कि भारत करीब तीन साल पहले ही चांद के इस इलाके में अपने रोवर की सफल लैंडिंग कराने वाला पहला देश बन चुका है। यानी चीन जिस रेस में पहले ही पिछड़ चुका है, अब वहां बराबरी की कोशिश में जुटा है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि भारत से पिछड़ने के बावजूद चीन का यह मिशन क्यों अहम है? क्यों कई देशों की अपने मिशन को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर भेजने की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं? अब चीन इस मिशन के जरिए क्या हासिल करना चाहता है? भारत फिलहाल दक्षिणी ध्रुव पर रिसर्च के मामले में किस पड़ाव पर है? आइये जानते हैं...

चीन का चांद पर भेजा जाने वाला मिशन...

चांगई-7 चीन का चांद के लिए तय मानवरहित, रोबोटिक चंद्र मिशन है, जिसे अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी और जटिल रोबोटिक मिशन माना जा रहा है। इस मिशन का मुख्य  मकसद चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद स्थायी रूप से अंधेरे क्रेटरों (गड्ढों) में बर्फ (पानी) की खोज करना और जमीन पर इनकी मौजूदगी का नक्शा बनाना है।

इस मिशन को लॉन्ग मार्च-5 वाई14 रॉकेट के जरिए हेनान प्रांत के वेनचांग स्पेस लॉन्च साइट से प्रक्षेपित किया जाएगा। इसके प्रक्षेपण की संभावित समय-सीमा 24 अगस्त से 31 अगस्त 2026 के बीच की है। यह मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद शेकलटन क्रेटर के किनारे पर उतरेगा। यह सौर मंडल के सबसे ठंडे स्थानों में से एक है, जहां तापमान -203 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है।

चीन के इस मिशन की खास बात यही है कि मिशन को मुख्यतः चांद की सतह पर पानी की खोज के लिए लॉन्च किया जा रहा है, इसलिए इसमें एक हॉपर भी भेजा जाएगा, जो कि ऐसा समर्पित हॉपर उपयोग करने वाला यह दुनिया का पहला मिशन होगा।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग: मिशन में विभिन्न देशों और संगठनों के उपकरण भी शामिल हैं। जैसे इटली का लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर, रूस का धूल संसूचक यंत्र, स्विट्जरलैंड का रेडिएशन स्पेक्ट्रोमीटर और हांगकांग विश्वविद्यालय और आईएलओए हुआवे की ओर विकसित एक कॉम्पैक्ट कैमरा 'आईएलओ-सी' शामिल है, जो चंद्रमा की सतह से हमारी आकाशगंगा के गैलेक्टिक प्लेन की तस्वीरें लेगा।

भविष्य का रास्ता: यह मिशन चीन के चंद्र अन्वेषण के चौथे चरण का हिस्सा है। यह 2030 तक चंद्रमा पर पहले चीनी मानव लैंडिंग के लिए आधार तैयार कर रहा है और चांगई-8 (संभावित वर्ष 2028) के साथ मिलकर चीन के इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) के निर्माण में मदद करेगा।

कौन से देश अब तक कर चुके चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मिशन भेजने की कोशिश?

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मिशन भेजने और वहां पानी की खोज करने की कोशिश में पहले भी कई देश कोशिश कर चुके हैं। हालांकि, इनमें अधिकतर देश अब तक सफल नहीं हुए हैं। सिर्फ भारत ही अब तक वह देश रहा है, जिसने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक अपना रोवर उतारा है और दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज को आगे बढ़ाया है। 

भारत: भारत का चंद्रयान-3 मिशन अगस्त 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का पहला मिशन बना। इसने वहां की मिट्टी के तापमान की रीडिंग के जरिए दक्षिणी ध्रुव की सतह पर पानी की मौजूदगी के बेहद अहम नए प्रमाण खोजे। इससे पहले, भारत के चंद्रयान-1 मिशन ने भी चंद्रमा के ध्रुवीय क्रेटरों (गड्ढों) में जल-बर्फ होने के सबूत दिए थे।

रूस: साल 2023 में ही रूस ने भी दक्षिणी ध्रुव पर जमी हुई बर्फ की खोज के लिए अपना लूना-25 मिशन भेजा था। हालांकि, यह यान नियंत्रण खो देने के कारण चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त  हो गया और कोई वैज्ञानिक डेटा एकत्र नहीं कर सका।

अमेरिका: नासा ने सीधे तौर पर सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग से इतर अलग-अलग ऑर्बिटर और इम्पैक्ट मिशन्स के जरिए इस क्षेत्र का अध्ययन किया है। नासा के क्लेमेंटाइन (1994) और लूनर प्रॉस्पेक्टर (1998) शुरुआती मिशनों में से थे जिन्होंने चंद्रमा पर जल-बर्फ होने के संकेत खोजे थे। इसके बाद 2009 में नासा ने चंद्रमा के एक अंधेरे क्रेटर में जानबूझकर एक रॉकेट सेगमेंट और प्रोब को टकराया था, जिससे उड़े धूल के गुबार के विश्लेषण से वहां भारी मात्रा में जल-बर्फ होने की सीधे तौर पर पुष्टि हुई थी।

चीन अपने नए मिशन के जरिए क्या हासिल करना चाहता है? 

1. जल-बर्फ की खोज और इसकी मौजूदगी का विश्लेषण

चूंकि कई अंतरिक्ष अभियानों ने चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी के संकेत दिए हैं, लेकिन अभी तक किसी ने भी इस संसाधन का पूरी तरह से विश्लेषण नहीं किया है। चीन इस मिशन के जरिए यह पता लगाना चाहता है कि पानी वास्तव में कहां मौजूद है, कितनी गहराई पर है, किस रूप में है और क्या वहां तक पहुंचना व्यावहारिक रूप से संभव है।

2. 2030 तक मानव लैंडिंग की तैयारी

चांगई-7 मिशन से मिलने वाला तकनीकी अनुभव चीन के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यह मिशन साल 2030 तक चंद्रमा की सतह पर पहले चीनी अंतरिक्ष यात्री को उतारने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए जमीन तैयार करेगा।

3. इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन की नींव

यह अभियान चीन के दीर्घकालिक वैज्ञानिक उद्देश्यों का हिस्सा है। चांगई-7 और इसके बाद 2028 में जाने वाला चांगई-8 मिशन मिलकर चंद्रमा पर चीन के प्रस्तावित इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन के निर्माण में अहम कदम साबित होंगे।

4. भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए अहम संसाधन

अगर वहां पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है, तो उसका इस्तेमाल न सिर्फ चालक दल के पीने के पानी के रूप में होगा, बल्कि उससे ऑक्सीजन (सांस लेने के लिए) और हाइड्रोजन (रॉकेट ईंधन के रूप में) भी तैयार की जा सकती है। इससे चंद्रमा से ही भविष्य में मंगल ग्रह या गहरे अंतरिक्ष के अभियानों को ईंधन देकर लॉन्च करने में मदद मिलेगी।

5. वैज्ञानिक और खगोलीय अध्ययन 

यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के भू-भाग, पर्यावरण, संरचना, वहां की मिट्टी व चट्टानों की बनावट और बाकी वाष्प में बदलने वाले पदार्थों का गहराई से अध्ययन करेगा। इसके अलावा लैंडर पर लगा विशेष कैमरा पहली बार चंद्रमा की सतह से हमारी आकाश गंगा के गैलेक्टिक प्लेन की अनोखी रंगीन तस्वीरें भी लेगा।इस तरह चीन का चांगई-7 मिशन केवल एक चंद्र यात्रा नहीं है, बल्कि यह भविष्य में मनुष्यों के चंद्रमा पर रहने और वहां से गहरे ब्रह्मांड की खोज करने की दिशा में एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक कोशिश साबित हो सकता है।

भारत की दक्षिणी ध्रुव पर खोज किस चरण में?

भारत की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर खोज काफी हद तक सफल रही है और इसके ऐतिहासिक वैज्ञानिक डेटा का विश्लेषण आज भी लगातार नए खुलासे कर रहा है। हाल ही में (मई 2026 में) चंद्रयान-3 मिशन को इसकी अभूतपूर्व सफलताओं के लिए अमेरिका के प्रतिष्ठित 2026 गॉडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

 1. विक्रम लैंडर के 'हॉप' प्रयोग से मिली नई जानकारियां

अपने मिशन के अंतिम चरण में चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर ने अपने इंजनों को दोबारा चालू करके चंद्रमा की सतह पर एक नियंत्रित हॉप (उछाल) प्रयोग किया था। वह अपनी शुरुआती जगह से लगभग 50 सेमी दूर जाकर उतरा। इस प्रयोग के बाद वहां लगाए गए उपकरण ChaSTE, जिसे चांद की सतह पर थर्मोफिजिकल (तापमान की पहचान के लिए एक्सपेरिमेंट) जांच के लिए लगाया गया था, के डेटा विश्लेषण से चंद्रमा की मिट्टी के बारे में काफी अनोखी वैज्ञानिक जानकारियां मिली हैं। इसे हाल ही में अमेरिकी एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की ओर से प्रकाशित किया गया है। 

परतदार मिट्टी की संरचना: विक्रम लैंडर के डेटा के विश्लेषण से यह भी सामने आया है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ऊपरी 6.5 सेमी सतह कोई समान धूल का ढेर नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग गुणों वाली परतों से बनी है।

 गहराई में सघन मिट्टी: सतह के नीचे जाने पर मिट्टी का खिंचाव और उसका घनत्व काफी बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि गहराई में मिट्टी ज्यादा पैक और चिपचिपी है।

तापमान में तेजी से गिरावट: स्थानीय गड्ढों और खाइयों के कारण वहां एक छाया प्रभाव काम करता है, जिसकी वजह से तापमान वैश्विक मॉडलों के अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से गिरता है।

इंजन के प्रभाव से बदलाव: विक्रम लैंडर के इंजन के दोबारा स्टार्ट होने से वहां की ऊपरी 3 सेमी मिट्टी उड़ गई और उसके नीचे का संकुचित हिस्सा बाहर आ गया।

यह चंद्रमा की मिट्टी की स्थानीय विविधता का सतह पर किया गया पहला सीधा विश्लेषण है, जो भविष्य में वहां इंसानी घर बनाने और सतह से पानी निकालने की तकनीक विकसित करने में बहुत काम आएगा।

2. जल-बर्फ और अहम रासायनिक तत्व

चंद्रयान-3 ने दक्षिणी ध्रुव पर मिट्टी के तापमान की रीडिंग के जरिए सतह पर जल-बर्फ की मौजूदगी के महत्वपूर्ण और नए प्रमाण जुटाए। मिशन ने दक्षिणी ध्रुव की मिट्टी में अहम रासायनिक तत्वों की उपस्थिति की पुष्टि की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में वहां स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन चलाए जा सकते हैं।

3. पृथ्वी के सूक्ष्मजीवों के जीवित रहने की खोज

चंद्रयान-1 के डेटा का इस्तेमाल: नासा के वैज्ञानिकों ने हाल ही में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पृथ्वी के बैक्टीरिया और फंगस के जीवित रहने की क्षमता पर एक रिसर्च की है। इस रिसर्च में चंद्रमा के रेडिएशन वातावरण का आकलन करने के लिए भारत के चंद्रयान-1 मिशन के रेडिएशन डोज मॉनिटर (RADOM) उपकरण के डेटा का उपयोग किया गया था।

इस अध्ययन से पता चला कि ध्रुवीय क्षेत्रों में रेडिएशन का स्तर इतना कम है कि इंसानों के साथ दुर्घटनावश चंद्रमा पर पहुंचने वाले कुछ रोगाणु वहां रोवर के पहियों या इंसानी जूतों के निशानों की छाया में निष्क्रिय अवस्था (क्रिप्टोबायोसिस) में जिंदा रह सकते हैं।

इस तरह भारत के चंद्र अभियानों ने न केवल चंद्रमा पर पानी की खोज की राह दिखाई है, बल्कि भविष्य की इंसानी बस्तियों के निर्माण और अंतरिक्ष अन्वेषण के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। माना जा रहा है कि यह डेटा भी चीन की काफी मदद कर सकता है। 

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