G News 24 : अगेन आंदोलन की आड़ अराजकता का एजेंडा तलाशते कॉकरोच !

रोज एक नई मांग,ना माने सरकार,तो आंदोलन के नाम पर  देश को अस्थिर करने का प्रयास ...

 अगेन आंदोलन की आड़ अराजकता का एजेंडा तलाशते कॉकरोच !

देश में विरोध और प्रदर्शन लोकतंत्र का अधिकार है, और अभिव्यक्ति की भी आजादी है,लेकिन जब किसी आंदोलन की आड़ में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों,पुलिस एवं सुरक्षा बलों का अपमान करना, उन पर हमला करने,पत्थरबाजी, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा तोड़ने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तब सवाल केवल किसी एक मांग या संगठन का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि आखिर विरोध की आड़ में देश का माहौल बिगाड़ने की कोशिश किसके हित में हो रही है?

Gen-z के नाम पर हुए प्रदर्शन को लेकर जिस प्रकार हिंसा, पुलिस के साथ कथित मारपीट, पत्थरबाजी और संसद की ओर बढ़ने अथवा उसमें प्रवेश का प्रयास किए जाने की बातें सामने आईं, उसने अनेक गंभीर आशंकाओं को जन्म दिया है। क्या यह केवल एक सीमित मांग को लेकर किया गया आंदोलन था या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक रणनीति काम कर रही थी? क्या देश में अस्थिरता और अराजकता का वातावरण बनाकर सरकार पर दबाव डालने का कोई सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है?

इन सवालों को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि जब एक मांग पूरी होने के बाद दूसरी मांग सामने आने लगे और फिर मांगों का क्रम लगातार बढ़ता जाए, तब आंदोलन के वास्तविक उद्देश्य पर संदेह होना स्वाभाविक है। पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई। यदि किसी कारणवश वह मांग पूरी हो जाए और उसके बाद सीधे गृहमंत्री, फिर प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग उठने लगे, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर आंदोलन की अंतिम सीमा क्या है? क्या उद्देश्य किसी समस्या का समाधान है या फिर हर समाधान के बाद एक नया विवाद खड़ा कर राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखना?

देश में कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूहों पर लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि वे शिक्षा, धर्म, जाति, भाषा, आरक्षण और सामाजिक पहचान जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच टकराव की स्थिति पैदा करने का प्रयास करते हैं। यदि किसी भी मुद्दे पर असहमति को संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सुलझाने के बजाय लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाए, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान देश की सामाजिक एकता को होता है।

यही वह स्थिति है, जहां कथित विदेशी फंडिंग, बाहरी प्रभाव और तथाकथित “डीप स्टेट” जैसी आशंकाओं की निष्पक्ष और कानूनी जांच की मांग उठती है। किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल को बिना ठोस प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन यदि देश की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द या लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित करने के लिए अवैध फंडिंग अथवा किसी सुनियोजित नेटवर्क के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं, तो जांच एजेंसियों को बिना किसी राजनीतिक दबाव के कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।

कानून सबके लिए समान होना चाहिए...

चाहे वह व्यक्ति सड़क पर प्रदर्शन कर रहा हो, किसी सरकारी कार्यालय में बैठा हो या संसद का सदस्य हो। लोकतंत्र किसी को हिंसा का लाइसेंस नहीं देता। विरोध का अधिकार है, लेकिन पुलिसकर्मियों पर हमला करने, सार्वजनिक संपत्ति जलाने, आम नागरिकों को परेशान करने और संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा भंग करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।

जंतर-मंतर का कोई प्रदर्शन अपेक्षित जनसमर्थन न जुटा पाए और उसके बाद हिंसा या कानून तोड़ने के आरोपों में कार्रवाई शुरू हो, तो उस कार्रवाई को रोकने के लिए फिर से बड़े आंदोलन की धमकी देना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रश्न खड़े करता है। यदि किसी ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन जांच और न्यायिक प्रक्रिया को दबाव, धमकी या भीड़ के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।

काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। जनता अब केवल नारों से प्रभावित होने के बजाय यह जानना चाहती है कि आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, उसका नेतृत्व कौन कर रहा है, उसके लिए धन कहां से आ रहा है और हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों न हो? देश की जनता को भ्रमित करने के लिए बार-बार एक ही राजनीतिक पटकथा नहीं चलाई जा सकती।

आज जरूरत है कि देश के जागरूक नागरिक,विशेषकर युवा,भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अपनी राय बनाएं। 

सोशल मीडिया पर चलने वाले हर वीडियो, हर हैशटैग और हर भड़काऊ संदेश को सच मान लेना समझदारी नहीं है। युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं और उन्हें किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या कथित वैचारिक नेटवर्क का केवल भीड़ जुटाने वाला माध्यम नहीं बनना चाहिए।

युवाओं को सवाल जरूर पूछने चाहिए, सरकार से जवाब भी मांगने चाहिए, नीतियों की आलोचना भी करनी चाहिए; लेकिन हिंसा, नफरत और समाज को बांटने वाले अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। 

राष्ट्रहित का अर्थ सरकार की हर बात से सहमत होना नहीं है। राष्ट्रहित का अर्थ है. देश की एकता,संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक सद्भाव की रक्षा करते हुए जिम्मेदारी से अपनी बात रखना।

मीडिया के लिए भी आत्ममंथन का समय...

मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। हमारी जिम्मेदारी केवल टीआरपी बढ़ाना या सनसनीखेज दृश्य दिखाना नहीं है। जब कोई व्यक्ति या समूह जानबूझकर विवाद पैदा करता है, हिंसा भड़काता है अथवा केवल कैमरों के सामने आने के लिए प्रपंच रचता है, तब ऐसे लोगों को दिखाना बंद करें और ना ही उन्हें अपने स्टूडियो में किसी डिबेट का हिस्सा बनाना चाहिए । मीडिया को यह भी तय करना चाहिए कि उसे कितनी और किस प्रकार की कवरेज दी जाए।

किसी भी आरोपी को जांच पूरी होने से पहले दोषी घोषित करना गलत है, लेकिन कानून तोड़ने के आरोपों से जुड़े लोगों को बिना सवाल पूछे “हीरो” बनाकर प्रस्तुत करना भी पत्रकारिता की जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है। मीडिया को खबर दिखानी चाहिए, लेकिन खबर और महिमामंडन के बीच की सीमा भी समझनी चाहिए।

मेरे पत्रकार साथियों, हर चीज केवल टीआरपी और विज्ञापन की दौड़ नहीं है। पत्रकारिता का एक दायित्व समाज और राष्ट्र के प्रति भी है। कैमरे की ताकत का उपयोग सत्य सामने लाने, हिंसा के पीछे की साजिशों की पड़ताल करने और जनता को जागरूक बनाने के लिए होना चाहिए, न कि किसी भी समूह के एजेंडे को बिना जांच के आगे बढ़ाने के लिए।

पूछता है भारत...

  • क्या आंदोलन का उद्देश्य समस्या का समाधान है या हर समाधान के बाद नई मांग खड़ी कर देश में लगातार अस्थिरता बनाए रखना?
  • क्या लोकतंत्र के नाम पर हिंसा, आगजनी और पुलिस पर हमला स्वीकार किया जा सकता है?
  • क्या देश के युवा किसी भी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे की भीड़ बनेंगे, या तथ्य और राष्ट्रहित के आधार पर अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करेंगे?

युवाओं के नाम संदेश...

  • देश को तोड़ने वाली भाषा से नहीं, देश को जोड़ने वाले विचारों से अपनी पहचान बनाइए।
  • अफवाह का हिस्सा मत बनिए, सत्य की जांच कीजिए।
  • भीड़ के पीछे मत चलिए, विवेक के साथ निर्णय लीजिए।
  • विरोध कीजिए, लेकिन हिंसा नहीं।

सवाल पूछिए, लेकिन देश की एकता को कमजोर करने वालों का औजार मत बनिए...

भारत का भविष्य किसी नारे, किसी ट्रेंड या किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि जागरूक, शिक्षित, जिम्मेदार और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले युवाओं से सुरक्षित होगा।

  • देश पहले,दल बाद में।
  • राष्ट्रहित पहले,राजनीतिक हित बाद में।
  • संवाद पहले,हिंसा कभी नहीं।

“जो लोग हर समाधान के बाद नई मांग लेकर खड़े हो जाते हैं, जनता को यह समझना होगा कि कहीं उनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि लगातार विवाद और अस्थिरता बनाए रखना तो नहीं है।”

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