उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित "खरसाली प्राचीन शनि देव मंदिर"...
दुनिया का इकलौता मंदिर जहां अपनी बहन के साथ पूजे जाते शनि महाराज !
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में खरसाली गांव है। यहीं पर प्राचीन शनि मंदिर है। जिसमें उनकी पूजा के साथ यमुना की भी पूजा की जाती है। खरसाली गांव से लगभग 5 किमी दूर यमुनोत्री यानी यमुना का उद्गम स्थल है। यहां सर्दियों के मौसम में भारी बर्फबारी होती है। इसलिए शीतकालीन पूजा के लिए मां यमुना को खरसाली के शनि मंदिर में लाया जाता है और लगभग 6 महीने तक शनिदेव के साथ ही इनकी पूजा की जाती है। सर्दियों में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, जो हर वर्ष बैसाखी पर्व पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
ज्योतिष के अनुसार लकड़ियों का कारक ग्रह शनि है। वहीं संयोगवश 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थिति इस मंदिर को बनाने में लकड़ियों का उपयोग ज्यादा किया गया है। ये मंदिर 5 मंजिला घर की तरह दिखाई देता है। पत्थर और लकड़ियों से मिलकर बने इस मंदिर की खास बनावट इसे बाढ़ और भूकंप के खतरे से दूर रखती है। लकड़ी एवं पत्थर से बना पांच मंजिला मंदिर क्षेत्र की अनूठी वास्तुकला का नमूना भी है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि मंदिर परिसर में स्थित बेखिर के पेड़ के नीचे शनि देव की उत्पत्ति हुई थी। ये शनि मंदिर बहुत पुराना है। माना जाता है कि ये मंदिर महाभारत काल का है और पांडवों ने इसे बनवाया था। मंदिर के आखिरी यानी पांचवी मंजिल पर शनि देव की कांसे की मूर्ति है।
शनिदेव के साथ नाग देवता और देवी यमुना की मूर्तियां भी रखी जाती है। इस शनि मंदिर में एक अखंड ज्योति मौजूद है। कहा जाता है कि शनिवार को इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं। कहते हैं कि प्रतिवर्ष अक्षय तृतीय पर शनि देव अपनी बहिन यमुना से यमुनोत्री धाम में मुलाक़ात करके खरसाली लौट आते है और भाईदूज या यम द्वितिया के त्यौहार यमुना को खरसाली ले जा सकते हैं, ये पर्व दिवाली के दो बाद आता है। शनिदेव और देवी यमुना को पूजा-पाठ कर के एक धार्मिक यात्रा के साथ लाया ले जाया जाता है। मंदिर में शनि देव 12 महीने तक विराजमान रहते हैं और सावन की संक्रांति में खरसाली में तीन दिवसीय शनि देव मेला भी आयोजित किया जाता है।
साल में एक बार कार्तिक पूर्णिमा पर यहां चमत्कार देखने को मिलता है। मंदिर के पुरोहितों की मानें तो इस दिन शनि मंदिर के ऊपर रखे घड़े अपने आप बदल जाते हैं। साल में एक बार ऐसा होता है। ऐसी ही दूसरी कथा है कि मंदिर में दो बड़े फूलदान रखे हैं, जिनको रिखोला और पिखोला कहा जाता है। ये फूलदान ज़ंजीर से बांध कर रखे जाते हैं। इस बारे में एक कहानी प्रचलित है कि पूर्ण चन्द्रमा के दौरान ये फूलदान नदी की तरफ चलने लगते हैं और बांध के न रखने पर लुप्त हो जाएंगे।



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