पंजाब-बंगाल का बटवारां कर जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की रेखा खींची थी...
8 जुलाई 1947 को लंदन से आये, एक वकील और 5 हफ्तों में, नक्शे पर दो हिस्सों में बांट दिया भारत !
नई दिल्ली। 1947 की 4 जून को तय हो गया था कि आने वाली 15 अगस्त को भारत आजाद होने वाला है. ये भी तय हो गया था कि भारत का बंटवारा होगा और मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनेगा. भारत के तत्कालीन वायसराय माउंटबेटन ने ये भी तय कर लिया था कि पंजाब और बंगाल को टुकड़ों में तोड़ा जाएगा और पाकिस्तान बनाया जाएगा.
लेकिन जो तय नहीं हुआ था, वो ये कि नया भारत और नया पाकिस्तान कैसा होगा? दोनों की सीमाएं क्या होंगी? इन सीमाओं को कौन तय करेगा? पंडित जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना को इस बात का आभास था कि अगर इस मसले को उन्होंने खुद हल करना चाहा तो कभी एकमत नहीं होंगे. ऐसे में तय हुआ कि ये जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति को सौंपी जाए जिसे न तो भारत की संस्कृति के बारे में पता हो और न ही भारत की जमीन के बारे में.
आखिर में ये जिम्मेदारी मिली सर सिरिल रैडक्लिफ को, जो उस समय इंग्लैंड के बड़े वकीलों में से एक थे. उनका ज्यादातर समय लंदन के न्यू स्क्वायर स्थित अपने लॉ चैंबर में ही बीतता था. डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस अपनी किताब 'फ्रीडम एट द मिडनाइट' में लिखते हैं कि '27 जून 1947 को सिरिल रैडक्लिफ से कहा गया कि भारत जाइए और पंजाब और बंगाल का बंटवारा कीजिए. रैडक्लिफ हैरान हो गए लेकिन चाहते हुए भी इस काम के लिए मना नहीं कर सके.'
रैडक्लिफ पहली और आखिरी बार भारत आए थे
लगभग 10 दिन में रैडक्लिफ ने अपना सारा काम समझ लिया और भारत के लिए निकल पड़े. 8 जुलाई 1947 को रैडक्लिफ पहली और आखिरी बार भारत आए थे.
'फ्रीडम एट मिडनाइट' के मुताबिक, 'दिल्ली उतरने के कुछ घंटों के भीतर रैडक्लिफ ने लुई माउंटबेटन से मुलाकात की. माउंटबेटन ने साफ किया कि उनकी मदद के लिए हर प्रांत से 4-4 जज उनके साथ होंगे, जो सुझाव देंगे कि बंटवारे की रेखा कहां-कहां खींचनी है, लेकिन फैसला रैडक्लिफ को अकेले ही लेना होगा.4-4 जजों की इस टीम में आधे हिंदू और आधे मुस्लिम थे. इसलिए इस बात की संभावना ज्यादा थी कि जज आपस में ही लड़ते रह जाएंगे. लेकिन समस्या थी कि समय बहुत कम था.
किताब में लिखा है, 'माउंटबेटन ने साफ कर दिया था कि 15 अगस्त तक विभाजन रेखा किसी भी हाल में तय हो जानी चाहिए. रैडक्लिफ ने माउंटबेटन से कहा कि हड़बड़ी मचाने पर गलतियां होने का खतरा है. इस पर माउंटबेटन का जवाब था कि दोनों देशों को 15 अगस्त तक विभाग रेखा की इतनी सख्त जरूरत है कि वह रेखा जहां से भी गुजरेगी, दोनों उसे मान लेंगे.
इसके बाद रैडक्लिफ ने नेहरू और जिन्ना दोनों से मुलाकात की और उनसे पूछा कि क्या सचमुच 15 अगस्त तक विभाजन रेखा तय हो जानी चाहिए? चाहे उसमें कितनी ही गलतियां ही क्यों न हों? इस पर दोनों ने कहा कि- गलतियां हम मान लेंगे लेकिन देरी नहीं होनी चाहिए.
रैडक्लिफ को रोज औसतन 30 मील लंबी रेखा जरूर खींचनी थी
'फ्रीडम एट मिडनाइट' में डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस लिखते हैं, 'दिल्ली के वायसरीगल एस्टेट में एक बंगला दिया गया. यहां रैडक्लिफ ने आबादी, सिफारिशों और अलग-अलग नक्शों की मदद से पंजाब और बंगाल को बांटने वालीं रेखाएं खींचने का काम शुरू कर दिया. रैडक्लिफ को रोज औसतन 30 मील लंबी रेखा जरूर खींचनी थी, नहीं तो उतनी तेजी के साथ ये काम नहीं हो सकता था जो भारत और पाकिस्तान के नेताओं ने रैडक्लिफ पर थोप दिया था.'
बंटवारे की रेखा खींचने से पहले रैडक्लिफ ने पंजाब का दौरा भी किया था, लेकिन उसे वहां लोगों से बात करने का मौका तो दूर, लोगों ने उसकी मेहमाननवाजी तक नहीं की. रैडक्लिफ जब वायसरीगल बंगले में नक्शे पर रेखा खींच रहे थे, तब पंजाब और बंगाल सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहे थे.
कई हफ्तों तक उस बंगले में पंजाब और बंगाल के बंटवारे की रेखा खींचने का काम हुआ और आखिरकार 13 अगस्त को रैडक्लिफ के एक सहकर्मी ने दो लिफाफों में रिपोर्ट वायसराय भवन में पहुंचा दी. माउंटबेटन चाहते थे कि पहले दोनों देश आजादी का जश्न मना लें और फिर उन्हें ये रिपोर्ट दिखाई जाए. वह नहीं चाहते थे कि रिपोर्ट देखकर और विभाजन रेखा देखकर उनके आजादी के जश्न के रंग में भंग चढ़े. 15 अगस्त के बाद अगले ही दिन माउंटबेटन ने नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक-एक लिफाफा दिया और कहा कि दोनों अलग-अलग कमरों में बैठकर इन नक्शों को देख लीजिए.
बंटवारे की विभीषिका ...
1 6 अगस्त 1946... सड़कों पर कत्लेआम, नदी में बहती लाशें, बस इस दिन तय हुआ कि अब पाकिस्तान बनाना ही होगा16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान किया था. 'हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अगर आप युद्ध चाहते हैं तो हम बिना किसी हिचकिचाहट के आपका प्रस्ताव कबूल करते हैं.' ये बात मोहम्मद अली जिन्ना ने जुलाई 1946 में बॉम्बे में अपने घर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कही थीं. उनकी धमकी कांग्रेस को थी. धमकी थी कि अगर मुसलमानों को उनका अलग मुल्क नहीं मिला तो देश गृहयुद्ध की चपेट में आ जाएगा. उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिन्ना ने खसम खाते हुए कहा- 'हम भारत को बांट कर रहेंगे या फिर... हम इसे बर्बाद कर देंगे.'
मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए 'पाकिस्तान' की जिद पकड़ ली थी और उनके लिए पाकिस्तान से कम कुछ भी नहीं था. जिन्ना ने ऐलान किया कि 16 अगस्त को 'डायरेक्ट एक्शन डे' होगा. डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस अपनी किताब 'फ्रीडम एट द मिडनाइट' में लिखते हैं कि 'अगस्त 1946 में बंबई से बाहर लगे एक तंबू में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के समर्थकों के सामने स्पष्ट किया था कि 'डायरेक्ट एक्शन' का अर्थ क्या है. उसने ऐलान किया था कि अगर कांग्रेस भारत के मुसलमानों को युद्ध के लिए ललकार रही है तो इसका जवाब देने के लिए हम सामने आएंगे. आखिरकार अगस्त की 16 तारीख आ गई और देशभर के मुसलमानों ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' के तौर पर मनाया.
'फ्रीडम एट मिडनाइट' में डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस लिखते हैं, 'वह घटना जो हिंदू-मुसलमान दंगों की आग बनकर पूरे देश में फैल जाने की धमकी दे रही थी, वह 16 अगस्त 1946 के दिन घटी थी और इसकी जमीन थी वह शहर जिसे अंग्रेजी साम्राज्य का 'दूसरा शहर' कहा जाता था और जो हिंसा या क्रूरता के क्षेत्र में अपना सानी नहीं रखता था, वह था- कलकत्ता.'
किताब के मुताबिक, '16 अगस्त की सुबह धार्मिक नारे लगाते मुसलमानों की टोलियां, अचानक अपनी झोपड़ियों से निकलीं. छुरे, चाकू, तलवारें, लोहे की छड़ें, ऐसे कोई भी हथियार जो इंसान की खोपड़ी तोड़ सकते हों, उनके हाथों में चमक रहे थे. किताब के मुताबिक, 'ये मुसलमान मुस्लिम लीग की ललकार पर बाहर निकले थे. मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को 'डायरेक्ट एक्शन डे' का दिन मुकर्रर किया था, ताकि इंग्लैंड और कांग्रेस पार्टी के सामने साबित किया जा सके कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर रहेंगे. जरूर हुआ तो इसके लिए किसी बी सीमा तक 'डायरेक्ट एक्शन' करने से नहीं चूकेंगे.'
किताब में लिखा है, 'उन मुसलमान टोलियों ने जो भी हिंदू दिखाई दिया, उसे मार डाला गया और शव शहर के खुले गटरों में फेंक दिए गए. पुलिस के हाथ-पांव फूल गए. जल्द ही शहर के दर्जनों जगहों से काला धुंआं उठने लगा. हिंदुओं की बस्तियां खाक हो रही थीं, बाजार धू-धू कर जल रहे थे.'
मुस्लिम लीग ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' के लिए 16 तारीख ऐसे ही नहीं चुनी थी. उस वक्त मुस्लिम लीग का एक और बड़ा नेता था, जिसका नाम था- शहीद सुहरावर्दी, जो आगे चलकर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी बना. 16 अगस्त की तारीख सुहरावर्दी ने ही तय की थी. वह इसलिए क्योंकि इस दिन छुट्टी थी और पुलिस भी दूसरे कामों में लगी थी. उसका मानना था कि अगर अचानक हिंदुओं पर हमला किया जाएगा तो ज्यादा से ज्यादा हिंदू मौत के घाट उतर जाएंगे. हुआ भी ऐसा ही. कलकत्ता में हिंदुओं की इतनी लाशें बिछ गईं कि उठाई न उठें.



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