G News 24 : 20 दिन में मात्र 51 घंटे की संसद और लगभग 133 करोड़ हुए स्वाहा !!!

 जनता के इस पैसे का हिसाब कौन देगा...

20 दिन में मात्र 51 घंटे की संसद और लगभग 133 करोड़ हुए स्वाहा !!!

भारत की संसद सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों, अधिकारों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सर्वोच्च मंच है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे संसद में जाएं, सवाल पूछें, सरकार को घेरें, नीतियों पर बहस करें और देश के भविष्य के लिए कानून बनाएं। लेकिन जब संसद ही लगातार हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ जाए, तो सवाल सिर्फ राजनीतिक टकराव का नहीं रहता, यह जनता के धन और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का सवाल बन जाता है।

मानसून सत्र के 20 दिनों में यदि संसद प्रभावी रूप से लगभग 51 घंटे ही काम कर सकी और करीब 133 करोड़ रुपये से अधिक का संसदीय खर्च हुआ, तो यह आंकड़ा हर उस नागरिक को परेशान करने के लिए पर्याप्त है जो अपनी मेहनत की कमाई से टैक्स चुकाता है। आखिर इस नुकसान की जवाबदेही किसकी है?

विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन संसद को ठप करना नहीं

विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना है,और मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की ताकत होता है। लेकिन विरोध का अर्थ यह कतई नहीं हो सकता कि सदन की कार्यवाही ही न चलने दी जाए।

किसी विधेयक से असहमति है?बहस कीजिए...

  • सरकार की नीति गलत लगती है?तथ्यों के साथ सरकार को घेरिए।
  • किसी मुद्दे पर गंभीर आपत्ति है?संशोधन दीजिए, मतदान कीजिए, संसदीय समितियों का सहारा लीजिए।

लेकिन यदि हर मुद्दे का जवाब नारे, हंगामा और कार्यवाही बाधित करना बन जाए, तो लोकतांत्रिक विरोध धीरे-धीरे संसदीय गतिरोध की संस्कृति में बदल जाता है,और इसका नुकसान सत्ता पक्ष या विपक्ष का नहीं, पूरे देश का होता है।

162 करोड़ रुपये,किसकी जेब से निकले?

यह पैसा किसी सांसद या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता के टैक्स का पैसा है। देश का वह किसान, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी और मध्यमवर्गीय परिवार जो अपनी आय से सरकार को टैक्स देता है, उसी के पैसे से संसद की व्यवस्था चलती है।

इसलिए जनता का सवाल सीधा है

जब संसद चले ही नहीं तो जनता के पैसे से चलने वाली इस पूरी व्यवस्था का हिसाब कौन देगा? और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस समय संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा हो सकती थी, उन पर संशोधन हो सकते थे और देशहित में कानून बनाए जा सकते थे, उस समय यदि सदन का बहुमूल्य समय राजनीतिक गतिरोध में चला गया, तो उसके लिए जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होनी चाहिए?

सांसद हैं तो जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी

जनता सांसदों को केवल वेतन लेने और सुविधाएं प्राप्त करने के लिए नहीं चुनती। सांसद का पद विशेषाधिकार से पहले जिम्मेदारी है। यदि कोई सांसद लगातार सदन में उपस्थित होकर भी कार्यवाही बाधित करता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसे उसी तरह वेतन और सभी संसदीय सुविधाएं मिलती रहनी चाहिए जैसे उसने पूरी जिम्मेदारी से संसदीय काम किया हो?

यहां एक बात स्पष्ट है, कि सभी विपक्षी सांसदों के द्वारा बिना नियम और निर्धारित संसदीय प्रक्रिया के प्रश्न उठाना और संसद न चलने देने पर की सामूहिक सैलरी रोक देना क्या उचित नहीं होगा! क्योंकि जिस समय में हंगामा और संसद सत्र चलने से रोका गया उसे समय में तमाम सकारात्मक चर्चा हो सकती थी नए बिल पास किया जा सकते थे और जनता का जो पैसा बर्बाद हुआ है उसे रोका जा सकता था। इसलिए ऐसा करने वालों के प्रति जवाब देवी तय होना जरूरी है।

क्यों न संसद की नियमावली के तहत ऐसा कठोर और पारदर्शी तंत्र बनाया जाए जिसमें जानबूझकर और लगातार कार्यवाही बाधित करने वाले सांसदों पर दिन के भत्ते में कटौती, निर्धारित सुविधाओं पर कार्रवाई या अन्य संसदीय दंड लगाया जा सके? जब कर्मचारी की अनुपस्थिति का हिसाब होता है, तो जनप्रतिनिधि की संसदीय जवाबदेही का हिसाब क्यों नहीं?

संसद में शोर से नहीं, सवालों से सरकार घेरिए

  • लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि विपक्ष सरकार को आईना दिखाता है। लेकिन आईना तोड़ देने से चेहरा नहीं बदलता।
  • सरकार गलत है तो उसके खिलाफ तथ्य रखिए।कानून गलत है तो उसकी खामियां बताइए।नीति गलत है तो उसका विकल्प दीजिए।
  • लेकिन संसद को ही काम न करने देना किस लोकतांत्रिक उद्देश्य की पूर्ति करता है?
  • जनता ने सांसदों को इसलिए नहीं भेजा कि वे संसद के दरवाजे पर राजनीति करें; उन्हें इसलिए भेजा है कि वे संसद के भीतर जनहित की लड़ाई लड़ें।

जनता की जेब से संसद तक...

“सांसदों को वेतन चाहिए, भत्ते चाहिए, सुरक्षा चाहिए, सुविधाएं चाहिए, इसलिए जनता का सवाल भी जायज है कि बदले में संसद में काम कब मिलेगा?”

पूछता है भारत...

  • अगर संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है, तो उसकी भरपाई कौन करेगा?
  • क्या संसद की कार्यवाही बाधित करने को राजनीतिक रणनीति मानकर हर बार जनता के सवाल को दबा दिया जाएगा?
  • क्या भविष्य में ऐसा नियम नहीं होना चाहिए कि जो सांसद जानबूझकर सदन का काम रोकता है, उसकी जवाबदेही भी उसी अनुपात में तय हो?

और सबसे महत्वपूर्ण...

क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि वह अपने प्रतिनिधियों से पूछे, आपने संसद में कितने घंटे काम किया और देश के लिए क्या किया?

सबक सिर्फ विपक्ष के लिए नहीं, सत्ता पक्ष के लिए भी...

  • संसद को बाधित करने की प्रवृत्ति चाहे सत्ता पक्ष से आए या विपक्ष से दोनों लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह हैं।
  • लेकिन यदि किसी सत्र में विपक्ष के लगातार विरोध और व्यवधान के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई है, तो उसके राजनीतिक औचित्य पर सवाल उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।
  • संसद किसी पार्टी का मंच नहीं है।संसद सांसदों की निजी संपत्ति नहीं है।संसद सरकार और विपक्ष की जागीर नहीं है।
  • संसद जनता की है,और जनता हिसाब मांगने का अधिकार रखती है।
  • इसलिए अब समय आ गया है कि संसदीय राजनीति में एक नई मर्यादा तय हो...

“विरोध करो, लेकिन संसद मत रोको।

सरकार को घेरो, लेकिन लोकतंत्र को मत घेरो। हंगामा नहीं, बहस करो।बहिष्कार नहीं, बिल पर वोट करो।राजनीतिक स्वार्थ नहीं, जनहित सर्वोपरि रखो।”

क्योंकि संसद के एक-एक मिनट की कीमत है, और उस कीमत का भुगतान भारत की जनता करती है।

51 घंटे की कार्यवाही और 116 करोड़ अधिक रुपये का सवाल सिर्फ बीते सत्र का हिसाब नहीं है—यह भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए चेतावनी है।

संसद को चलाने में प्रति मिनट आता है 2.5 लाख रुपये खर्च, एक दिन में लगते हैं 9 करोड़ रुपये

संसद की एक घंटे की कार्यवाही में 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। लंच का एक घंटा हटाकर संसद एक दिन में सिर्फ 6 घंटे चलती है, ऐसे में यदि इन 6 घंटों का हिसाब लगाया जाए, तो संसद को एक दिन में चलाने का खर्च 9 करोड़ रुपये आता है। वहीं, पूरे सत्र की बात करें, तो एक पूरे सत्र में 150 से 200 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। 

कहां-कहां खर्च होता है पैसा

संसद को चलाने में इन रुपयों को अलग-अलग मदों में खर्च किया जाता है, जो कि इस प्रकार हैंः

  • -पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों का खर्च
  • -संसद की सफाई, बिजली और पानी का खर्च
  • -संसद सचिवालय के कर्मचारियों का खर्च
  • -सांसदों के वेतन का खर्च
  • -सत्र की कार्यवाही के दौरान सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं का खर्च

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