असली गोल्ड ज्वेलरी गायब होने पर एवं जानकारी छुपाने पर हाइ्रकोर्ट ने लगाई फटकार...
उप-कोषालय(कलेक्ट्रेट)से सरकारी अभिरक्षा में रखे गये सोने के आभूषण गायब !
मुरैना। जौरा उप-कोषालय और कलेक्टर ऑफिस में सरकारी अभिरक्षा में रखे गये सोने के आभूषण गायब होने के मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन के अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। हाईाकोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि सरकार सुरक्षा में रखे गये असली सोने के गहने गायब हो गये। जबकि उनकी जगह नकली गहने रख दिये गये। इस पूरे मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी वर्षो तक हाईकोर्ट से छिपाई जाती रहीं।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी या तो अत्याधिक लापरवाह रहें या फिर इस पूरे घटनाक्रम में शामिल लोगों के साथ उनकी मिली भगत रहीं। हाईकोर्ट ने अधिकारियों के आचरण को गंभीर और चिंताजनक बताया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने आवेदन पेश कर पहले दिये गये सीआईडी जांच के आदेश को वापिस लेने का अनुरोध किया है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि इस मामले में पहले ही एफआईआर दर्ज हो चुकी थी। वर्ष 2019 में निचली अदालत आरोपियों को बरी कर चुकी है। सरकारी पक्ष की दलील हाईकोर्ट ने सख्त रूख अपनाते हुए पूछा कि यदि एफआईआर दर्ज थीं ट्रायल चल रहा था। यह जानकारी पहले कभी न्यायालय के समक्ष क्यों नहीं रखी गयी। इस पर सरकारी पक्ष ने स्वीकार किया कि यह तथ्य न तो लिखित रूप में और न ही मौखिक रूप से अदालत का बताया गया था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा वरिष्ठ अधिकारी का शपथपत्र !
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कई अहम सवाल पूछे हैं। अदालत ने जानना चाहा कि जौरा उप-कोषालय अधिकारी और तत्कालीन मुरैना कलेक्टर ने एफआईआर और लंबित ट्रायल की जानकारी न्यायालय से क्यों छिपाई। साथ ही यह भी पूछा कि रिट अपील दायर करते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख क्यों नहीं किया गया और आरोपियों के बरी होने के बाद भी अदालत को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि मुरैना कलेक्टर से वरिष्ठ अधिकारी—संभागायुक्त या शासन के सचिव स्तर के अधिकारी व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर पूरे घटनाक्रम का जवाब दें। अदालत ने स्पष्ट किया कि इतने गंभीर मामले में केवल अधीनस्थ अधिकारियों का स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं होगा। रिकॉर्ड की जांच में सामने आया कि वर्ष 2017 से 2019 के बीच यह मामला कई बार हाईकोर्ट में सूचीबद्ध हुआ, लेकिन हर सुनवाई में संबंधित अधिकारियों ने लंबित आपराधिक प्रकरण की जानकारी अदालत से छिपाए रखी। यहां तक कि आरोपियों के बरी होने के बाद भी इस तथ्य की जानकारी न्यायालय को नहीं दी गई।
20 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को निर्धारित की है। तब तक राज्य सरकार को सभी बिंदुओं पर विस्तृत जवाब और संबंधित रिकॉर्ड न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।


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