आंदोलन के सहारे भी नहीं लगी नैया पार,अब विपक्ष का क्या होगा?
श्रेय की लड़ाई में उलझा विपक्ष,गठबंधन की नाव बीच मझधार !
लोकतंत्र में आंदोलन सत्ता से सवाल पूछने एवं अपनी बात रखने का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। लेकिन जब आंदोलन का केंद्र जनता के मुद्दों से हटकर राजनीतिक श्रेय बन जाए, तब आंदोलन कम और मंचन अधिक दिखाई देता है। दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच आंदोलन के बीच हाल के घटनाक्रम ने विपक्ष की राजनीति को कुछ इसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
जिस मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई गई थी, वह अंततः अपने राजनीतिक लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकी। इसके बाद विपक्ष के भीतर जो तस्वीर उभरकर सामने आई, वह किसी संयुक्त मोर्चे से अधिक "श्रेय युद्ध" जैसी दिखाई दी। मानो आंदोलन खत्म होते ही सबसे बड़ा प्रश्न यह बन गया कि कैमरे के सामने सबसे पहले कौन दिखाई देगा और जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा।
कहा जाता है कि राजनीति में एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। लेकिन यहाँ तो हाल यह है कि हर दल अपने आपको ग्यारह और बाकी सभी को एक साबित करने में लगा है। परिणाम यह हुआ कि सरकार से मुकाबले से पहले ही सहयोगी दल एक-दूसरे से मुकाबला करते नज़र आने लगे।
सबसे रोचक तस्वीर तब बनी जब राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के बीच आंदोलन का "मुख्य किरदार" बनने की होड़ की चर्चा होने लगी। उधर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बदले हुए राजनीतिक संकेत भी यह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की चुनावी ज़मीन की प्राथमिकताएँ अलग हैं। पंजाब की राजनीतिक मजबूरियाँ अलग हैं और कांग्रेस की राष्ट्रीय रणनीति अलग। ऐसे में साझा मंच पर खड़े दलों के कदम अलग-अलग दिशाओं में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
राजनीति का गणित भी बड़ा दिलचस्प होता है। चुनाव आते ही हर दल को गठबंधन याद आता है और चुनाव नज़दीक आते-आते हर दल को अपनी-अपनी ज़मीन की चिंता सताने लगती है। फिर गठबंधन की बैठकें कम और सीटों की गिनती ज़्यादा होने लगती है।
जनता शायद यह उम्मीद कर रही थी कि विपक्ष एक साझा रणनीति के साथ सरकार को चुनौती देगा। लेकिन यदि सहयोगियों के बीच ही नेतृत्व, श्रेय और राजनीतिक वर्चस्व की रस्साकशी चलती रहे, तो सबसे अधिक नुकसान उसी गठबंधन को होता है जो एकजुटता का संदेश देने निकला था।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इंडी गठबंधन साझा नेतृत्व और साझा एजेंडे पर आगे बढ़ पाएगा, या फिर उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों की चुनावी मजबूरियाँ उसे अलग-अलग रास्तों पर ले जाएँगी? राजनीति में गठबंधन केवल मंच साझा करने से नहीं चलता, बल्कि लक्ष्य, विश्वास और अनुशासन भी साझा करना पड़ता है।
इस घटनाक्रम को आंदोलन को कहना आंदोलन की तोहीन होगी, शुरुआत में तो यह आंदोलन ही था लेकिन समय के साथ जब इसमें अराजक और उत्पत्ति तत्व घुसकर उपद्रव मचाने लगे पुलिस वालों पर बोतल और पत्थर बरसाने लगे तब यह आंदोलन अराजकता में बदल गया और उसका हाल कुछ ऐसा हो गया ...
कि "नाव किनारे लगाने निकले थे, लेकिन चप्पू चलाने से पहले ही यह बहस शुरू हो गई कि कप्तान कौन बनेगा। नतीजा यह हुआ कि किनारा दूर रह गया और नाव अब भी मझधार में ही घूम रही है।



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