देश की जनता ने सरकार चुनी थी, कोई प्रयोगशाला नहीं बनाई थी ...
देश जनता और उसके संशाधन कोई प्रयोगशाला नहीं है,केन्द्रीय मंत्री गडकरी जी !
आजकल के नेता अपने व अपने परिवार के फायदे के लिए जहां हर कुछ महीनों में नई-नई नीतियों के द्वारा देश की जनता पर कर रहे हैं। उनका यह प्रयोग परीक्षण आम आदमी की जेब और उसके संसाधनों पर भी पड़ता है। वर्तमान में देश के केंद्रीय परिवहन मंत्री ने देश के 140 करोड लोगों को बड़ी परेशानी में डाल दिया है उनके इस नीति के कारण न सिर्फ लोग परेशान हैं बल्कि उनकी वाहनों पर भी पड़ रहा है। आज E20 पेट्रोल का सवाल केवल ईंधन का नहीं, बल्कि जनता के अधिकार, उसकी पसंद और उसकी मेहनत की कमाई का सवाल बन चुका है।
सरकार उपभोक्ता से उसकी पसंद का अधिकार क्यों छीन रही है ...?
मंत्री जी, जब हाई-स्पीड पेट्रोल आया था तब विकल्प था। जिसे सामान्य पेट्रोल डलवाना था, वह सामान्य पेट्रोल डलवाता था। जिसे प्रीमियम चाहिए था, वह अतिरिक्त कीमत देकर हाई-स्पीड पेट्रोल खरीदता था। जब वाहन कंपनियां पेट्रोल, सीएनजी और अन्य विकल्प देती हैं, तब सरकार उपभोक्ता से उसकी पसंद का अधिकार क्यों छीन रही है? आखिर E20 को ही अंतिम सत्य मान लेने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
सरकार कहती है कि यह पर्यावरण बचाने का अभियान है। लेकिन क्या पर्यावरण बचाने का पूरा ठेका केवल आम नागरिक ने ही ले रखा है? क्या पहले देश के पुराने सरकारी वाहन, सरकारी विभाग और सरकारी बेड़े पूरी तरह E20 के अनुरूप बनाए गए? या फिर हमेशा की तरह बोझ पहले जनता पर ही डाल दिया गया?
जनता इतनी बड़ी संख्या में अपनी परेशानी बता रही है, तो नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है...
देशभर में अनेक वाहन मालिक माइलेज, इंजन की कार्यक्षमता और रखरखाव की बढ़ती लागत को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यदि जनता इतनी बड़ी संख्या में अपनी परेशानी बता रही है, तो उसका समाधान देने के बजाय उसे नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है? लोकतंत्र में जनता की आवाज सुनी जाती है, उसे दबाया नहीं जाता।
सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि सरकार हर मंच से "ईज़ ऑफ़ लिविंग" की बात करती है, लेकिन आम आदमी के लिए "ईज़ ऑफ़ स्पेंडिंग" की नई व्यवस्था बना देती है। कभी नया टैक्स, कभी नया नियम, कभी नया प्रयोग। आखिर आम नागरिक कमाए कब और प्रयोग झेले कब?
यदि यह बात सच है कि E20 ईंधन का वास्तविक प्रभाव व्यापक स्तर पर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि इस प्रयोग की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? देश का आम वाहन चालक या नीति बनाने वाले?
बंद कमरों में बनाई हर योजना सफलता की गारंटी की नहीं होती,यह भी मानकर चलना चाहिए ...
मंत्री जी, नीति बनाना आसान है, लेकिन उसकी कीमत तब समझ आती है जब उसका बोझ करोड़ों परिवारों की जेब पर पड़ता है। दिल्ली की वातानुकूलित बैठकों में बनाई गई हर योजना ज़मीन पर भी उतनी ही सफल होगी, यह मान लेना सबसे बड़ी प्रशासनिक भूल है। सरकार को यह समझना होगा कि जनता वोट इसलिए नहीं देती कि उसकी पसंद खत्म कर दी जाए। यदि E20 वास्तव में श्रेष्ठ ईंधन है, तो उसे अपनी गुणवत्ता के बल पर स्वीकार कराया जाए, न कि विकल्प समाप्त करके। विश्वास तर्क से जीता जाता है, मजबूरी से नहीं।
सरकार लगातार E20 पेट्रोल को पर्यावरण संरक्षण, विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बता रही है। उद्देश्य निश्चित रूप से सकारात्मक हो सकते हैं। लेकिन जब किसी नई नीति का असर करोड़ों लोगों के वाहनों पर पड़ना हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है।
सरकारी परिवहन बेड़े और आधिकारिक गाड़ियों पर व्यापक परीक्षण नहीं होना चाहिए था...
आम नागरिक पूछ रहा है, यदि यह केवल एक "प्रयोग" है, तो क्या इस प्रयोग के लिए पहले सरकारी विभागों के वाहनों, सरकारी परिवहन बेड़े और आधिकारिक गाड़ियों पर व्यापक परीक्षण नहीं होना चाहिए था? क्या करोड़ों निजी वाहन मालिकों को अनिश्चितता के साथ इस परिवर्तन का हिस्सा बनाना उचित है?
नुकसान होने परआर्थिक जिम्मेदारी कौन लेगा...
यदि अगले एक-दो वर्षों में यह सामने आता है कि किसी वर्ग के वाहनों में इंजन, फ्यूल सिस्टम या रखरखाव पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ा, तो उसकी आर्थिक जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या वाहन मालिकों को मुआवजा मिलेगा? क्या तेल कंपनियां या वाहन निर्माता इसकी भरपाई करेंगे? या फिर पूरा बोझ हमेशा की तरह आम नागरिक की जेब पर ही पड़ेगा?
सार्वजनिक नीति पर तथ्य आधारित चर्चा और उसकी जवाबदेही मांगना नागरिकों का अधिकार है...
यदि सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा आपूर्ति नीति जारी रखने का निर्देश दिया है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि नीति पर सवाल उठाना अनुचित है। लोकतंत्र में किसी भी सार्वजनिक नीति पर तथ्य आधारित चर्चा और उसकी जवाबदेही मांगना नागरिकों का अधिकार है। आज आवश्यकता केवल E20 के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि पारदर्शिता की है। देश की जनता यह जानना चाहती है...
- क्या सभी प्रकार के वाहनों पर पर्याप्त और दीर्घकालिक परीक्षण किए गए हैं?
- यदि भविष्य में नुकसान सामने आता है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
- क्या उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था है?
- किसी भी बड़े सार्वजनिक प्रयोग में नागरिकों को पूरी जानकारी और विकल्प मिलना चाहिए?
सरकार की हर नीति का अंतिम उद्देश्य जनता का हित होना चाहिए। इसलिए यदि किसी नीति से जुड़े प्रश्न उठ रहे हैं, तो उनका उत्तर तथ्यों, वैज्ञानिक प्रमाणों और स्पष्ट जवाबदेही के साथ दिया जाना चाहिए। एक मजबूत लोकतंत्र वही है, जहां सरकार, न्यायपालिका और सभी संबंधित संस्थाएं जनता के उचित प्रश्नों का पारदर्शी उत्तर दें।
गडकरी का पेट्रोल में एथेनॉल का धंधा, पेट्रोलियम मंत्री पुरी की चुप्पी...
देश के करोड़ों वाहन चालकों से बिना राय लिए उनके वाहनों को एक ऐसे प्रयोगशाला का हिस्सा बना दिया गया, जिसका नाम है E20 एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल। सरकार इसे हरित क्रांति बताती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह हरित क्रांति है या आम आदमी की जेब पर नई चोट?
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी एथेनॉल के सबसे बड़े पैरोकार बनकर सामने आते हैं। उनके हर भाषण में एथेनॉल के फायदे गिनाए जाते हैं, किसान समृद्ध होंगे, तेल आयात घटेगा, प्रदूषण कम होगा। सुनने में सब कुछ सुनहरा लगता है। लेकिन दूसरी तरफ लाखों वाहन मालिक पूछ रहे हैं, यदि सब कुछ इतना शानदार है, तो फिर इंजन, माइलेज और रखरखाव को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस पूरे विवाद में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की आवाज़ बहुत कम सुनाई देती है। आखिर क्यों? जब पेट्रोल बेचा जा रहा है, तो पेट्रोलियम मंत्रालय ही जनता को यह भरोसा क्यों नहीं दिलाता कि हर श्रेणी के वाहन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या सरकार के पास ऐसे स्वतंत्र और सार्वजनिक अध्ययन हैं जिन्हें हर नागरिक देख सके?
सरकार कहती है, "देशहित में थोड़ा त्याग करना होगा।" लेकिन सवाल यह है कि यह त्याग हमेशा आम आदमी ही क्यों करे? नेट क्यों नहीं करते कोई त्याग, आम आदमी ही कभी महंगा पेट्रोल, कभी महंगी सर्विस, कभी बढ़ते स्पेयर पार्ट्स के दाम और अब ईंधन नीति का काम में आज क्यों भुगते ! आखिर हर बार परीक्षा सिर्फ वाहन मालिकों की ही क्यों?
यदि किसी नई तकनीक पर सरकार को इतना ही भरोसा था, तो शुरुआत सरकारी वाहनों से क्यों नहीं की गई? एक वर्ष तक सभी केंद्रीय मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी बेड़ों में व्यापक परीक्षण कर उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाते। उसके बाद जनता से कहा जाता कि यह तकनीक सुरक्षित और लाभकारी है। इससे भरोसा भी बढ़ता और विवाद भी कम होता।
लोकतंत्र में जनता केवल टैक्स देने की मशीन नहीं होती। वह सवाल भी पूछती है। और आज सवाल यह है कि क्या देश की ईंधन नीति वैज्ञानिक पारदर्शिता पर चल रही है या केवल सरकारी दावों पर?
राजनीति में जनता की नाराज़गी धीरे-धीरे जमा होती है और फिर चुनाव में परिणाम बनकर सामने आती है। यदि वाहन मालिकों का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगे कि उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है और उनकी आशंकाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो विपक्ष को किसी बड़े मुद्दे की तलाश नहीं करनी पड़ेगी। यह विषय अपने आप चुनावी बहस का केंद्र बन सकता है।
सरकार को समझना होगा कि विश्वास भाषणों से नहीं, पारदर्शिता से बनता है। यदि एथेनॉल नीति वास्तव में देशहित में है, तो उसके समर्थन में सभी तकनीकी परीक्षण, स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्टें और उपभोक्ताओं के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश सार्वजनिक किए जाने चाहिए। यदि कहीं सीमाएँ हैं, तो उन्हें भी ईमानदारी से स्वीकार किया जाना चाहिए।
आख़िर में सवाल सिर्फ एथेनॉल का नहीं है, बल्कि शासन की जवाबदेही का है। जनता जानना चाहती है कि क्या वह नीति की साझेदार है या केवल उसका उपभोक्ता? क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें नारे से नहीं, जनता के भरोसे से चलती हैं। और जब भरोसे की टंकी खाली होने लगती है, तो सत्ता का सबसे ताकतवर इंजन भी लड़खड़ाने लगता है।
प्रधानमंत्री जी से भी अपेक्षा है कि वे ऐसी नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा कराएं...
प्रधानमंत्री जी से भी अपेक्षा है कि वे ऐसी नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा कराएं जिनका सीधा असर करोड़ों वाहन मालिकों पर पड़ रहा है। जनहित के नाम पर यदि जनता स्वयं को असहज महसूस करने लगे, तो यह किसी भी सरकार के लिए चेतावनी का संकेत होता है।
सेवक यदि मालिक की आवाज़ सुनना बंद कर दे, तो लोकतंत्र उसे सुनना सिखा देता है...
याद रखिए, लोकतंत्र में जनता की सहनशीलता को उसकी सहमति समझने की भूल कई सरकारों को भारी पड़ी है। जनता कर देती है, नियम मानती है, देशहित में त्याग भी करती है, लेकिन जब उसे यह महसूस होने लगे कि उसकी राय का कोई मूल्य नहीं रहा, तब वही जनता सत्ता के सबसे बड़े अहंकार को भी लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देना जानती है।
पेट्रोल में एथेनॉल मोदी सरकार के लिए यही बनेगा सबसे बड़ा 'फ्यूल बम'?
जनता प्रयोग की वस्तु नहीं है। जनता मालिक है। सरकार सेवक है। सेवक यदि मालिक की आवाज़ सुनना बंद कर दे, तो लोकतंत्र उसे सुनना सिखा देता है।


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