श्रद्धा,दान और जवाबदेही,आखिर कब सीखेंगे हम !
दान की चोरी श्रद्धा पर चोट,जब रखवाले ही करने लगें चोरी,'तो चर्चा तो होगी'
"आस्था का सम्मान या धर्म का व्यवसाय,मंदिरों का चढ़ावा और जनता का विश्वास"
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं तथा चोरी की खबरों ने करोड़ों श्रद्धालुओं को झकझोर कर रख दिया है। यदि मंदिरों में श्रद्धापूर्वक अर्पित धन, आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले लोग ही उन पर हाथ साफ करने लगें, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं रह जाता, बल्कि यह लोगों की आस्था और विश्वास पर सीधा प्रहार बन जाता है।
मंदिरों में दान देने वाला व्यक्ति यह सोचकर अपना धन, गहने या अन्य वस्तुएं अर्पित करता है कि उसका योगदान किसी पुण्य कार्य, धार्मिक व्यवस्था या जनकल्याण में लगेगा। लेकिन जब ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार, चोरी या अनियमितताओं की खबरें सामने आती हैं, तो सबसे बड़ी चोट उस श्रद्धालु के विश्वास को पहुंचती है, जिसने अपनी मेहनत की कमाई श्रद्धा के साथ दान की थी।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है। जो भगवान सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता माने जाते हैं, जिन्हें जगत का स्वामी कहा जाता है, उन्हें आखिर मनुष्य क्या दान दे सकता है? क्या भगवान को वास्तव में सोने-चांदी, धन-दौलत और बहुमूल्य वस्तुओं की आवश्यकता है? या फिर यह सब मनुष्य की अपनी श्रद्धा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है?
समस्या श्रद्धा में नहीं है, समस्या तब उत्पन्न होती है जब कुछ लोग श्रद्धा को साधन बनाकर उसे व्यापार में बदल देते हैं। इतिहास गवाह है कि धर्म और आस्था के नाम पर लोगों की भावनाओं का दोहन करने वाले तत्व हमेशा मौजूद रहे हैं। ऐसे लोगों का उद्देश्य समाज सेवा या आध्यात्मिक उत्थान नहीं, बल्कि धन संग्रह और निजी लाभ होता है।
इसी कारण दान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार और कर्तव्य दोनों है कि वह यह जानने का प्रयास करे कि उसका दिया गया धन कहां और किस कार्य में उपयोग हो रहा है। धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी सरकारी या सामाजिक संस्था में।
दान का वास्तविक उद्देश्य जरूरतमंदों, गरीबों, असहायों और समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करना है। यदि किसी धार्मिक संस्था को उसके रखरखाव, पूजा-पाठ और वहां कार्यरत कर्मचारियों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं, तो अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग जनकल्याण के कार्यों में होना चाहिए। यही दान की सच्ची भावना भी है।
समाज को यह भी समझना होगा कि आवश्यकता से अधिक धन और संसाधनों का अनियंत्रित संचय कई बार लालच, स्वार्थ और भ्रष्टाचार को जन्म देता है। जहां अत्यधिक संपत्ति होगी, वहां उस पर गलत नजर रखने वाले लोग भी पैदा होंगे। यही कारण है कि दान और संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता और संतुलन अत्यंत आवश्यक है।
श्रद्धा किसी भी समाज की अमूल्य पूंजी होती है। इसे बनाए रखना धार्मिक संस्थाओं, उनके प्रबंधकों और समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब श्रद्धालु यह महसूस करता है कि उसका दान सही उद्देश्य के लिए उपयोग हो रहा है, तब उसका विश्वास और मजबूत होता है। लेकिन जब चोरी, घोटाले और भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं, तब केवल धन की हानि नहीं होती, बल्कि आस्था भी घायल होती है।
इसलिए समय की मांग है कि धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनविश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। श्रद्धा का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब दान को सेवा का माध्यम माना जाएगा, न कि संपत्ति संग्रह का साधन।


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