G NEWS 24 : भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत हमेशा से स्पष्ट रहा है, राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा है !

राष्ट्रहित पहले या राजनीति, भारत की विदेश नीति पर अनावश्यक विवाद क्यों ?

भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत हमेशा से स्पष्ट रहा है, राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा है ! 

फिलिस्तीन प्रेमी गांधी परिवार के लोगों को भारत इजरायल की दोस्ती पर पत्ति और खुद फिलिस्तीन के तीन प्यार में देश हित भूल चुके हैं ! चाहे मित्रता अमेरिका से हो, रूस से, इज़राइल से या अरब देशों से, भारत ने हर संबंध को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाया है।

इज़राइल उन देशों में है जिसने रक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियानों, कृषि, सिंचाई, जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भारत का निरंतर सहयोग किया है। जब-जब भारत पर आतंकवादी हमले हुए, तब-तब इज़राइल ने भारत के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया। ऐसे में भारत और इज़राइल के मजबूत संबंध किसी एक दल की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित की आवश्यकता हैं।

हाल ही में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने एक लेख के माध्यम से भारत सरकार की पश्चिम एशिया नीति पर प्रश्न उठाते हुए फिलिस्तीन के प्रति अधिक स्पष्ट समर्थन की बात कही। लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषयों पर बयानबाजी करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है।

यह भी उतना ही सत्य है कि भारत ने कभी फिलिस्तीन के अस्तित्व या उसके वैध अधिकारों का विरोध नहीं किया। भारत आज भी दो-राष्ट्र समाधान का समर्थक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपने उन मित्र देशों से दूरी बना ले, जिन्होंने हर कठिन समय में उसका साथ दिया है।

विदेश नीति का उद्देश्य किसी एक पक्ष का अंध-समर्थन नहीं, बल्कि भारत के हितों की रक्षा करना है। यदि इज़राइल भारत को रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और आधुनिक कृषि में सहायता देता है, तो यह संबंध दोनों देशों के पारस्परिक विश्वास का परिणाम है। वहीं भारत मानवीय आधार पर फिलिस्तीनी नागरिकों की सहायता भी करता रहा है। यही संतुलित कूटनीति एक परिपक्व राष्ट्र की पहचान है।

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि विदेश नीति चुनावी मंच का मुद्दा नहीं बननी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर ऐसे बयान देश की वैश्विक छवि को प्रभावित कर सकते हैं। सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना तथ्यों और राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण पर।

भारत आज विश्व की उभरती हुई शक्ति है। इसलिए उसे किसी एक खेमे में खड़ा होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप सभी देशों से संबंध बनाए रखने होंगे। यही परिपक्व कूटनीति है और यही भारत की वास्तविक ताकत भी।

भारत की विदेश नीति का निर्णय संसद में होने वाली राजनीति से नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, आर्थिक हितों और वैश्विक रणनीति से होना चाहिए। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रहित की हो तो सभी दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर भारत की एकजुट और संतुलित विदेश नीति का सम्मान करना चाहिए।

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