राष्ट्रहित बनाम स्वहित की राजनीति...
आज विपक्षी स्वहित राजनीति,केवल सत्ता,पद,पैसा और प्रतिष्ठा प्राप्ति का माध्यम बनकर रह गई है !
बीजेपी की बड़ी लीडरशिप (राष्ट्रीय) राष्ट्रीयहित को ध्यान में रखकर राजनीति करती है,जबकि वर्तमान की विपक्षी पार्टियां राष्ट्रीय हित तो छोड़ ही दीजिए राज्य की सोच लें वही काफी है! वे केवल स्वहित पूर्ति के लिए राजनीति करते हैं !ऐसा इनके नेताओं के हालिया व्यवहार से जाहिर हो रहा है
भारत की राजनीति में विचारधारा, राष्ट्रहित और जनसेवा को लोकतंत्र की आत्मा माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान समय में राजनीति का चरित्र तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय नेतृत्व वाली राजनीति है, जो दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टिकोण, वैश्विक प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर निर्णय लेने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर अधिकांश विपक्षी दलों की राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति, परिवारवाद, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित होती जा रही है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज देश की राजनीति दो धाराओं में बंट चुकी है....
- पहली, “राष्ट्र प्रथम” की राजनीति,
- और दूसरी, “स्वार्थ प्रथम” की राजनीति।
बीजेपी नेतृत्व ने पिछले एक दशक में कई ऐसे निर्णय लिए जिन्हें तत्काल राजनीतिक लाभ की बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित से जोड़कर देखा गया। उदाहरण के लिए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला केवल राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि दशकों से लंबित राष्ट्रीय एकीकरण का मुद्दा था। विपक्ष ने इसका विरोध किया, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि इससे अलगाववाद और आतंकवाद की गतिविधियों पर नियंत्रण मजबूत हुआ।
इसी प्रकार, राम मंदिर निर्माण का विषय केवल धार्मिक आस्था का नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक भावनाओं और ऐतिहासिक विवाद के समाधान का प्रतीक बना। विपक्ष वर्षों तक इस विषय को टालता रहा, जबकि बीजेपी ने संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से समाधान तक पहुंचाने का कार्य किया।
विदेश नीति में भी वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व ने भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान संतुलित कूटनीति हो, जी-20 सम्मेलन का सफल आयोजन हो या दुनिया के बड़े देशों के बीच भारत की निर्णायक भूमिका, इन सबने भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
इसके विपरीत विपक्षी राजनीति कई बार केवल विरोध के लिए विरोध करती दिखाई देती है। संसद से लेकर सड़क तक राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुट होने की बजाय राजनीतिक लाभ-हानि का गणित प्राथमिकता बन जाता है।
कई विपक्षी दलों पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप वर्षों से लगते रहे हैं। कुछ दलों की स्थिति ऐसी हो चुकी है कि उनका पूरा राजनीतिक ढांचा एक परिवार या सीमित समूह के इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में राष्ट्रहित स्वाभाविक रूप से पीछे छूट जाता है। हाल के वर्षों में कई ऐसे अवसर आए जब विपक्ष राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुटता दिखाने में असफल रहा।
चाहे सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के दौरान सेना के शौर्य पर प्रश्न उठाना हो, या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत सरकार के खिलाफ बयानबाजी करना—इन घटनाओं ने विपक्ष की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए हैं।
कुछ क्षेत्रीय दलों की राजनीति तो पूरी तरह राज्य-स्तरीय सत्ता समीकरणों तक सीमित हो चुकी है। उन्हें न राष्ट्रीय आर्थिक नीति से सरोकार दिखता है, न राष्ट्रीय सुरक्षा से। उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने राजनीतिक अस्तित्व और वोट बैंक को सुरक्षित रखना रह गया है।
हालांकि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष आवश्यक होता है। विपक्ष का काम सरकार की गलतियों को उजागर करना, जनहित के मुद्दे उठाना और संतुलन बनाए रखना है। लेकिन जब विपक्ष केवल सत्ता विरोध तक सीमित होकर राष्ट्रहित के प्रश्नों पर भी राजनीति करने लगे, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
आज देश को ऐसे विपक्ष की आवश्यकता है जो राष्ट्रहित के मुद्दों पर सरकार के साथ खड़ा हो सके और जनहित के मुद्दों पर मजबूती से सवाल भी पूछ सके। सिर्फ सरकार विरोध ही लोकतंत्र नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भागीदारी भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत अब केवल चुनावी राजनीति का देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि उनकी राजनीति राष्ट्र निर्माण की होगी या केवल सत्ता प्राप्ति की। क्योंकि अंततः इतिहास उसी राजनीति को याद रखता है जो राष्ट्र के लिए खड़ी होती है, न कि केवल स्वयं के लिए।


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