G News 24 : केरल में कांग्रेस ने 10 साल बाद सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट सरकार को दी पटखनी !

 कांग्रेस ने अपनी खासमखास सहयोगी पार्टी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर...

केरल में कांग्रेस ने 10 साल बाद सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट सरकार को दी पटखनी !

केरल में कांग्रेस ने दस साल के सत्ता के सूखे को खत्म करते हुए बम बम जीत की शानदार फसल काटी है. कांग्रेस ने अपनी खासमखास सहयोगी पार्टी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर 10 साल से 'भगवान के अपने देश' के नाम से मशहूर केरल की सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट सरकार को पटखनी देते हुए देश से लेफ्ट पार्टियों का आखिरी खूंटा कैसे उखाड़ फेका? आइए जानते हैं.

पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे आ गए हैं. बीजेपी ने असम का किला बरकरार रखा. बीजेपी ने बंगाल में ममता बनर्जी की 15 साल पुरानी टीएमसी सरकार को उखाड़ फेंका. बीजेपी ने तमिलनाडु में अपनी सहयोगी एआईएडीएमके के साथ बढ़िया प्रदर्शन किया. पुडुचेरी में भी एनडीए का मामला ठीक रहा. 2026 में हुए चुनावों में कांग्रेस के टेक अवे की बात करें तो उसने 10 साल से सत्ता में काबिज वामदलों के गठबंधन एलडीएफ को कैसे उखाड़ फेंका? आइए बताते हैं.

जब कांग्रेस को मिली बूस्टर डोज

केरल ने धीरे धीरे खरगोश की तरह लगातर मेहनत की और देश से वामपंथ का आखिरी किला भी उखाड़ फेंका. पिछले साल केरल राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ को बड़ी जीत मिली थी. इससे कांग्रेस को केरल में बूस्टर डोज मिली. इस खास संकेत को कांग्रेस ने सधे अंदाज में समझते हुए अपनी जीत का रोड मैप बिछाया कि वो एक दशक लंबे अंतराल के बाद सत्ता में वापसी कर सकती है. हालांकि केरल कांग्रेस की आपसी उठापठक के चलते ऐसे चमत्कारी नतीजों की उम्मीद नहीं थी लेकिन केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्य में वर्मतान समय में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने भीतरी कलह को थामते हुए इतिहास रच दिया.

एकजुट होकर मिली जीत

इस बार कांग्रेस हाई कमांड यानी आलाकमान बेहद सतर्क था. पार्टी की सबसे बड़ी जरूरत और उसकी सबसे बड़ी चुनौती टीम की एकजुटता बनाए रखना था. इसे सही से हैंडल किया गया. आपसी सिरफुटव्वल दूर करने की शुरुआत तिरुवनंतपुरम सांसद शशि थरूर की नाराजगी दूर करने से हुई. इसी साल 2026 की शुरुआत में शशि थरूर को लेकर तरह-तरह की अटकलें चल रही थीं. इससे पार्टी को जरा सा भी नुकसान होता उससे पहले जनवरी के आखिरी हफ्ते में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनसे लगभग दो घंटे बंद कमरे में चर्चा की जिसमें पार्टी के अंदर नाराजगी की अटकलों को दूर किया गया. इसके बाद थरूर को केरल में चुनाव कैंपेन कमेटी का सह-संयोजक बनाया गया. उन्होंने पूरे राज्य में पार्टी के लिए व्यापक प्रचार किया. जिसका फायदा कांग्रेस को मिला.

टिकटों का सही बंटवारा

आपसी तनातनी दूर करने के बाद अगला अहम कदम था जिताऊ उम्मीदवारों को टिकटों का बंटवारा. इसके लिए कांग्रेस हाईकमान ने भरोसेमंद मधुसूदन मिस्त्री को केरल भेजा. गुजरात से आने वाले मिस्त्री ने टिकट वितरण प्रक्रिया में अपने सारे अनुभव का इस्तेमाल किया. मिस्त्री ने केरल में कांग्रेस नेतृत्व को मिले फीडबैक के आधार पर ऐसी मरम्मत की जिसका नतीजा 4 मई को कांग्रेस की प्रचंड जीत के रूप में देखने को मिला. मिस्त्री ने महसूस किया कि जनता सरकार बदलना चाहती है, लेकिन वाम मोर्चा के बैठे हुए विधायकों के खिलाफ कोई खास नाराजगी नहीं है. इस इनपुट के बाद उन्होंने यूथ कांग्रेस के युवा नेताओं पर दांव लगाने की रणनीतिक चाल चली. मिस्त्री की कमेटी ने यह फैसला किया कि कोई भी मौजूदा सांसद (MP) चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा. हालांकि इस फैसले का अंदरूनी विरोध हुआ, उसे सख्ती से निपटा गया.

रूठों को मनाया

नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख से ठीक पहले, मौजूदा सांसद और पूर्व राज्य पार्टी अध्यक्ष सुधाकरन ने पार्टी के फरमान की अवहेलना करते हुए चुनाव लड़ने की मांग की. जल्दबाजी में एके एंटोनी को उन्हें मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे ने सुधाकरन से बात करके उन्हें मनाया उसके बाद राहुल गांधी ने उनके पूरे परिवार से मुलाकात की. इससे साफ संदेश गया कि कांग्रेस हाई कमांड सुधाकरन की मेहनत और योगदान को स्वीकार और सराहती है. टिकट वितरण के बाद केसी वेणुगोपाल ने विद्रोही नेताओं को मनाने की जिम्मेदारी संभाली.

वेणुगोपाल अच्छी तरह जानते थे कि केरल में उनकी अपनी प्रतिष्ठा सबसे ज्यादा दांव पर लगी हुई है. इसलिए उन्होंने खुद विद्रोहियों के घर जाकर उनसे बात की और असंतुष्टों की शिकायतों को सफलतापूर्वक दूर किया. चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी अचानक एक अनुशासित और एकजुट टीम का चेहरा दिखाने लगी. पार्टी प्रभारी दीपा दास मुंशी ने इस बदलाव को पर्दे के पीछे से अंजाम देने में अहम भूमिका निभाई. इस तरह चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक शाम 18.15 मिनट तक कांग्रेस 62 सीटें जीत चुकी थी और एक पर आगे थी. वहीं उसकी सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग  20 सीट जीत चुकी थी और दो पर आगे थी. 

सीपीएम को घेरने की रणनीति और चुनावी वादे

इसके बाद सीपीएम नेतृत्व वाली सरकार और मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन पर तीखे धारदार हमलों की शुरुआत हुई. राहुल गांधी ने खुद प्रचार की कमान संभाली और मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन पर सांठगांठ के आरोप लगाए. कांग्रेस ने 25 लाख रुपये तक के स्वास्थ्य बीमा कवरेज का वादा व्यापक रूप से प्रचारित किया. मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के कारण कांग्रेस मुस्लिम वोट हासिल करने को लेकर आश्वस्त थी. फिर भी कहीं  कोई चूक न हो, इसके लिए सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को मुसलमान मतदाताओं को साथ बनाए रखे के लिए अग्रिम मोर्चे पर तैनात किया.

पारंपरिक ईसाई वोटबैंक को संभाला

ईसाई समुदाय ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है. चुनाव के ऐलान से ठीक पहले पार्टी ने ईसाई समुदाय के सदस्य सुनी जोसेफ को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया. कांग्रेस को पता था कि विदेशों से चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं को फंड आता है. बीजेपी ने विदेश से आने वाले फंड पर कड़े नियम बनाकर उसे रोका इससे कांग्रेस आलाकमान को पता था कि मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक ईसाई मतदाताओं को मजबूती से कांग्रेस के साथ एकजुट करने में अहम भूमिका निभाएगा. कांग्रेस का ये अनुमान भी सही साबित हुआ.

कांग्रेस पार्टी के तीन संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार- केसी वेणुगोपाल, वीडी सथीसन और रमेश चेन्निथला तीनों केरल में व्यापाक प्रभाव रखने वाले नायर समुदाय से आते हैं. इसलिए माना जाता है कि कांग्रेस को इस जनसांख्यिकीय कारक से भी चुनावी फायदा मिला. बीजेपी भी नायर वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही थी, नाकाम रही और कुछ खास नहीं कर पाई.


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