सर्विस पर आंच आने का डर या प्रभावशाली का असर...
जब ‘अज्ञात’ बन जाता है पहचाना हुआ आरोपी, तो न्याय व्यवस्था पर उठते हैं गंभीर सवाल !
कानून का मूल उद्देश्य समाज में न्याय और व्यवस्था स्थापित करना है। लेकिन जब यही कानून लागू कराने वाली व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में आ जाए, तो आम नागरिक के मन में विश्वास की जगह भय और निराशा घर करने लगती है। हालिया घटनाक्रम ने इसी कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।
सड़क पर चल रहे निर्दोष लोगों को टक्कर मारने वाला आरोपी खुद इस बात को स्वीकार कर रहा है कि दुर्घटना उसी से हुई है। यह कोई अनुमान या शक नहीं, बल्कि स्वयं आरोपी का कथन है। इसके बावजूद, जब पुलिस की ओर से मामला “अज्ञात” के नाम दर्ज किया जाता है, तो यह केवल एक प्रक्रिया की त्रुटि नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमजोरी का संकेत है।
और भी चिंताजनक बात यह है कि आरोपी का परिवार सार्वजनिक मंचों पर पीड़ितों को न्याय दिलाने की बात करता नजर आता है। यह एक ऐसा नैतिक विरोधाभास है, जो समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है, क्या ये बयान वास्तविक संवेदना हैं या केवल जनभावना को शांत करने का एक दिखावटी प्रयास? क्योंकि यदि नीयत वास्तव में न्याय दिलाने की होती, तो प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती स्वतः दिखाई देती।
पीड़ित पक्ष द्वारा लिखित आवेदन देने के बावजूद पुलिस का अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज करना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं प्रभाव और दबाव कानून की निष्पक्षता पर भारी पड़ रहे हैं। यह स्थिति केवल एक केस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे सिस्टम में एक खतरनाक संदेश देती है, कि यदि आपके पास शक्ति और प्रभाव है, तो आप कानून की पकड़ से बच सकते हैं।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून केवल कमजोरों के लिए ही सख्त है? क्या आम नागरिक को न्याय पाने के लिए पहले अपनी पहचान और हैसियत साबित करनी होगी? यदि ऐसा है, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
समाज और शासन दोनों के लिए यह एक चेतावनी है। अगर आज इस तरह के मामलों में ढील दी जाती है, तो कल यह प्रवृत्ति और अधिक मजबूत होगी। कानून का डर समाप्त होना किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे खतरनाक संकेत होता है।
जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी निष्पक्षता के साथ कार्य करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार का दबाव न्याय प्रक्रिया को प्रभावित न कर सके। दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में लाना ही न्याय का वास्तविक अर्थ है।
अंततः, न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। वरना “अज्ञात” के पीछे छिपे “ज्ञात” अपराधी कानून और समाज-दोनों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं... @ रामवीर सिंह यादव


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