48 वर्षो के बाद खुला सोने-चांदी का खजाना, 3डी मैपिंग से गणना जारी...
ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के रत्नभंडार की गणना शुरू हुई !
नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के रत्नभंडार की गणना शुरू हो चुकी है। पहले चरण में बाहरी खजाने की गिनती की गयी। अब मंदिर के आंतरिक खजाने की गिनती की जायेगी। चलित खजाने में भगवान के दैनिक श्रृंगार के आभूषण रख जाते है। बाहरी खजाने में भगवानके उत्सव श्रृंगार से जुड़े आभूषण रखे जाते हैं। जबकि भीतरी खजाने में बेशकीमती आभूषण संरक्षित होते हैं खजाने की गिनती के लिय अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। खजाने की इस गणना पर पूरी दुनिया नजर टिकाये बैठी है।
इस बीच सिर्फ गणना से जुड़ी समिति के सदस्यों का ही रत्न भंडार में जाने की अनुमति है। अब भक्तों को उस पल का इंतजार है। जब रत्न भंडार के रहस्य दुनिया के सामने आयेंगे। इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिये हाईटैक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। गणना के लिये 3डी मेपिंग, वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की जा रही है।
13 अप्रैल से आतंकिर रत्न भंडार की गणना शुरू हो चुकी है। इसके बाद 16-18 अप्रैल केक बीच गणना का काम जारी रहेगा। आंतरिक र्भंडार की गणना कैसे होगी। इससे जुड़े नियम तय करने के लिये रविवार को महत्वपूर्ण बैठक भी हुई है। दरअसल, भीतर का रत्न भंडार काफी सेंसिटिव इलाका है। मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के बहुमूल्य रत्न और दुर्लभ आभूषण मौजूद है। सदियों से पुरी जगन्नाथ धाम भक्तों की अटूट आस्था का केन्द्र रहा है।
48 साल बाद खुला भीतरी रत्न भंडार
आज जिस भीतरी भंडार की गिनती का काम हो रहा है, ये सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। सूत्रों के अनुसार, जगन्नाथ के भीतरी रत्न भंडार को पूरे 48 साल बाद खोला गया है। इससे पहले इसे साल 1978 में खोला गया था। ऐसे में भक्त इसे लेकर काफी उत्साहित हैं कि 48 साल बाद इसके अंदर से क्या निकलेगा ऐसा बताया जाता है कि मंदिर के प्रांगण में आज भी ऐसे कितने ही खुफिया चेम्बर मौजूद हैं, जहां खजाना होने का दावा किया जाता है । मंदिर में मौजूद एक खुफिया सुरंग का जिक्र भी पुजारियों के वंशज करते हैं.
इतिहास में जिक्र मिलता है कि जिस तरह सोमनाथ मंदिर को विदेशी आक्रमणकारियों ने 17 बार लूटा था, ठीक उसी तरह जगन्नाथ मंदिर को लूटने का प्रयास भी 18 बार किया गया था। हर बार मंदिर के सेवकों ने ठाकुर जी की प्रतिमा को उन आक्रमणकारियों से बचाया था. जब-जब आक्रमण होता था तब-तब सेवक प्रतिमा को लेकर किसी अज्ञात स्थान पर छिप जाते थे।

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