अफवाहों से सावधान : संकट के समय घबराहट नहीं, समझदारी ही सबसे बड़ा समाधान होती है !
एलपीजी और पेट्रोल को लेकर विपक्ष द्वारा अफवाह फैलाकर राजनीति करने का प्रयास !
देश की व्यवस्था बचाना जनता की भी जिम्मेदारी होती है। देश में समय–समय पर संकट की घड़ियां आती रही हैं। कभी प्राकृतिक आपदा, कभी वैश्विक आर्थिक संकट और कभी अंतरराष्ट्रीय युद्ध। लेकिन हर संकट के साथ एक और चुनौती भी सामने आती है ।
अफवाहों की राजनीति और पैनिक का माहौल- आजकल पेट्रोलियम पदार्थों, विशेषकर रसोई गैस को लेकर जो वातावरण बनाया जा रहा है, वह इसी प्रवृत्ति का एक खतरनाक उदाहरण बनता जा रहा है। दरअसल कुछ विपक्षी नेता और राजनीतिक समूह यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी गैस की भारी किल्लत होने वाली है। प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाजी और सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसी बातें फैलाई जा रही हैं जिनका वास्तविकता से कोई ठोस संबंध नहीं है। नतीजा यह हो रहा है कि आम जनता के बीच अनावश्यक डर और भ्रम का वातावरण पैदा किया जा रहा है।
जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की आपूर्ति सामान्य है और किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसके बावजूद अफवाहों का असर यह हो रहा है कि लोग जरूरत से ज्यादा गैस सिलेंडर लेने की होड़ में लग गए हैं।
पैनिक से पैदा हो रही है कृत्रिम किल्लत-
अफवाहों का सबसे खतरनाक परिणाम यह होता है कि वे कृत्रिम संकट पैदा कर देती हैं। जब लोग यह मान लेते हैं कि आने वाले समय में गैस नहीं मिलेगी, तब वे आवश्यकता से अधिक सिलेंडर जमा करने लगते हैं। यही जमाखोरी आगे चलकर कालाबाजारी और ब्लैक मार्केटिंग को जन्म देती है।
आज कई गैस एजेंसियों पर लंबी-लंबी लाइनें लगने का कारण वास्तविक कमी नहीं, बल्कि पैनिक के कारण बढ़ी हुई अचानक मांग है। जो व्यवस्था पहले सामान्य रूप से चल रही थी । उसी तरह नंबर के अनुसार ही सिलेंडर मिलना है। लेकिन अचानक एकदम से जिनको जरूरत है उनके द्वारा और जिनको जरूरत नहीं भी है फिर भी नंबर लगा दिए गए तो स्वाभाविक है व्यवस्था पर अचानक अतिरिक्त दबाव पड़ गया है। इस स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान किसका होता है? उस आम नागरिक का, जिसे वास्तव में गैस की जरूरत होती है लेकिन जमाखोरी और अफरातफरी के कारण उसे समय पर सिलेंडर नहीं मिल पाता।
वैश्विक परिस्थितियां भी समझनी होंगी-
- आज दुनिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि पश्चिम एशिया में इजरायल, अमेरिका और ईरान से जुड़ा तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे वैश्विक संघर्षों का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ता है।
- लेकिन यह समझना जरूरी है कि ऐसे वैश्विक कारणों के लिए किसी स्थानीय सरकार को सीधे दोषी ठहराना उचित नहीं होता। भारत सरकार लगातार ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर काम कर रही है।
व्यवस्था बिगाड़ने में जनता की भी भूमिका-
- यह भी उतना ही सच है कि किसी भी व्यवस्था को बनाए रखने या बिगाड़ने में जनता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि हर व्यक्ति एक साथ सड़क पर उतरकर सिलेंडर लेने की कोशिश करेगा, तो अव्यवस्था होना स्वाभाविक है।
- अब सवाल उठता है कि जब गैस वितरण की एक स्पष्ट व्यवस्था पहले से मौजूद है, नंबर आएगा और सिलेंडर घर पहुंच जाएगा, तो फिर सड़कों पर लाइन लगाने की जरूरत क्या है? थोड़ा धैर्य और समझदारी दिखाकर इस स्थिति से आसानी से निपटा जा सकता है।
वैकल्पिक संसाधनों का भी उपयोग संभव-
- भारत जैसे देश में ऊर्जा के कई विकल्प उपलब्ध हैं। आज गांव से लेकर शहर तक बिजली उपलब्ध है। ऐसे में आवश्यकता पड़ने पर इंडक्शन, इलेक्ट्रिक हीटर, लकड़ी-कंडे या कोयले जैसे पारंपरिक साधनों का अस्थायी उपयोग किया जा सकता है।
- यह वही देश है जहां दशकों तक इन साधनों से ही खाना पकाया जाता रहा है। इसलिए थोड़े समय के लिए इन विकल्पों का इस्तेमाल करना कोई असंभव बात नहीं है।
- राजनीतिक लाभ के लिए अफवाहें खतरनाक-
- किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन यदि विपक्ष का एजेंडा केवल डर और भ्रम फैलाकर राजनीतिक लाभ उठाना बन जाए, तो वह लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह हो जाता है।
- जब संकट की स्थिति होती है, तब पूरे देश को एकजुट होकर समाधान ढूंढने की आवश्यकता होती है। लेकिन यदि कुछ लोग उसी संकट को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश करें, तो यह देश और समाज दोनों के लिए हानिकारक है।
जनता से अपील: अफवाहों से बचें, संयम रखें
आज जरूरत इस बात की है कि आम नागरिक अफवाहों से दूर रहें। सोशल मीडिया या किसी राजनीतिक बयान के आधार पर पैनिक में आने के बजाय सरकारी और आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें।
अनावश्यक रूप से सिलेंडर जमा करना न केवल गलत है बल्कि इससे दूसरों के अधिकारों का भी हनन होता है। यदि हर व्यक्ति केवल अपनी जरूरत के अनुसार ही संसाधनों का उपयोग करे, तो किसी भी प्रकार की कमी का संकट पैदा ही नहीं होगा।
संकट में जिम्मेदारी ही असली देशभक्ति है-
किसी भी देश की असली ताकत उसकी जनता होती है। जब जनता संयम और जिम्मेदारी का परिचय देती है, तब सबसे बड़ा संकट भी आसानी से पार किया जा सकता है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम सभी मिलकर अफवाहों की राजनीति को नकारें, जमाखोरी और कालाबाजारी को हतोत्साहित करें और व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग करें।
विशेष -केंद्र सरकार राज्य सरकार और स्थानीय शासन-प्रशासन के द्वारा अफवाहें फैलाने वाले, जमाखोरी एवं कालाबाजारी ठोस और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। कार्रवाई करते वक्त कानून को यह बिल्कुल नहीं देखना चाहिए कि यह व्यक्ति किस दल का है या किसी नेता का व्यक्ति है अगर वह गलत है तो उसे पर दंडात्मक कठोर कार्रवाई होना चाहिए। इस प्रकार की घटनाओं पर अंकुश लगेगा-दिव्या सिंह










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