G News 24 : केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में फिर बंद हो सकते हैं,महिलाओं के लिए मंदिर के द्वार !

  9 जजों की बेंच के सामने केरल सरकार का सबसे बड़ा 'यू-टर्न'

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में फिर बंद हो सकते हैं,महिलाओं के लिए मंदिर के द्वार !

केरल के पहाड़ों में स्थित भगवान अयप्पा का प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर एक बार फिर से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है. सबरीमाला मंदिर की सालों पुरानी परंपरा, जिसमें 10-50 वर्ष की महिलाओं के लिए मंदिर में प्रवेश पर रोक थी, उसी परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लगी पाबंदी को असंवैधानिक करार देते हुए सभी उम्र की महिलाओं के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए थे. उस समय केरल की पिनाराई विजयन सरकार ने इस फैसला का समर्थन सख्ती से किया था जिसके बाद पूरे प्रदेश में हिंसक विरोध प्रदर्शन और आस्था बनाम अधिकार की जंग छिड़ गई थी.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर कई सालों से देशभर में बहस चल रही है. यह विवाद खास तौर पर 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को लेकर है. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी. लेकिन इस फैसले के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और 2018 में कोर्ट के इस फैसले का सख्ती से लागू करने वाली सरकार ने अब यू-टर्न ले लिया है.

लेकिन अब एक बार फिर से 9 जजों की एक संविधान पीठ इस मामले की दोबारा समीक्षा करने जा रही है, तो इस बार केरल की पिनाराई विजयन सरकार ने एक ऐसा यू-टर्न लिया है जिसने सबको हैरान कर दिया है. प्रदेश सरकार जो कभी कोर्ट के फैसले को सख्ती से लागू करने पर अड़ी थी, वही सरकार अब कह रही है कि किसी भी बदलाव से पहले धार्मिक विद्वानों और समाज सुधारकों की राय लेना बहुत जरूरी है.

साल 2018 के सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर रोक को हटा दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था. उस समय पिनाराई विजयन सरकार ने इस फैसले को लागू करने के लिए सख्त रुख अपनाया था, हालांकि इस फैसले के लिए पूरे प्रदेश में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ था.

आस्था को तर्क की कसौटी पर न कसें-केरल सरकार

अब सरकार ने अपना रुख बदल लिया है, बीते शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में जमा किए अपने लिखित जवाब में केरल सरकार ने कहा है कि न्यायिक समीक्षा के दौरान यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा तर्क या भावनाओं पर खरी उतरती है या नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या वह विश्वास ईमानदारी से धर्म के पालन का हिस्सा माना जाता है. सरकार ने यह भी सुझाव दिया कि कई सालों से चली आ रही किसी धार्मिक परंपरा में बदलाव से पहले उस धर्म के प्रतिष्ठित विद्वानों और सम्मानित सामाजिक सुधारकों की राय लेना न्याय के हित में होगा. सरकार के अनुसार, सबरीमाला के पिछले अनुभवों और महिला भक्तों सहित अन्य श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया को देखते हुए यह परामर्श अनिवार्य है.

साल 2018 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, 5 जजों की पीठ ने नवंबर 2019 में 3:2 के बहुमत से कहा कि यह फैसला अन्य धर्मों के मामलों को भी प्रभावित कर सकता है और इसके लिए अधिक विस्तृत जांच की जरूरत होगी. पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं को तब तक लंबित रखने का फैसला लिया जब तक कि एक बड़ी पीठ इस मामले पर फैसला नहीं ले लेती.

 9 जजों की पीठ के पास भेजा है जहां 7 अहम सवालों पर फैसला होगा...

  • संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता और संविधान के भाग III के अंतर्गत दूसरे प्रावधानों के बीच क्या संबंध है?
  • संविधान के अनुच्छेद 25(1) के अंतर्गत 'सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य' की सीमा क्या है?
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत नैतिकता शब्द का दायरा और विस्तार क्या है और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता को शामिल किया जाना चाहिए?
  • आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की पहचान के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और सीमा क्या है?
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति हिंदुओं के वर्ग का क्या अर्थ है?
  • क्या अनुच्छेद 26 के तहत आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण प्राप्त है?
  • क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?

संवैधानिक नैतिकता पर रुख

केरल सरकार ने यह साफ किया है कि नैतिकता को व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर नहीं बदला जा सकता. इसे समानता, भेदभाव और छुआछूत के उन्मूलन जैसे संवैधानिक सिद्धांतों से जोड़ा जाना चाहिए. हालांकि केरल सरकार ने यह भी कहा कि अगर कोई प्रथा कानून के खिलाफ या सामाजिक शालीनता के विपरीत है तो उसे धर्म के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता.

सबरीमाला की परंपरा...

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी रूप में हैं. इसी परंपरा की वजह से 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश पर रोक रहती है. भक्तों की मान्यता है कि मंदिर के देवता की इस ब्रह्मचारी प्रकृति और उनकी तपस्या की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए मासिक धर्म वाली उम्र (10-50 वर्ष) की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है.  

2018 में कोर्ट ने इस रोक को हटाया था, लेकिन अब केरल सरकार का कहना है कि ऐसे संवेदनशील धार्मिक मामलों में बदलाव से पहले विद्वानों की राय लेना जरूरी है.

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