राष्ट्रहित v/s राजनीति ना होकर ...
राजनीति का अंतिम उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रहित होना चाहिए !
जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव अपने चरम पर है, तब भारत जैसे जिम्मेदार और उभरती वैश्विक शक्ति वाले देश के लिए संतुलित और समझदारी भरी विदेश नीति बेहद आवश्यक है। ऐसे समय में देश के राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने बयानों और आचरण में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।
लेकिन दुर्भाग्य से हाल के दिनों में ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ विपक्षी दल, विशेषकर राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ऐसे बयान दे रहे हैं जिनसे देश के भीतर अनावश्यक भ्रम और बाहर अनचाहा संदेश जा सकता है। सवाल यह है कि क्या केवल विरोध के लिए विरोध करना ही अब राजनीति का नया मानदंड बन चुका है?
भारत की विदेश नीति हमेशा से संतुलन, रणनीति और राष्ट्रीय हित के सिद्धांत पर आधारित रही है। आज जब Israel, United States और Iran जैसे देशों के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति है, तब भारत को सोच-समझकर कदम उठाने की जरूरत है। ऐसे में देश के भीतर से ऐसे बयान देना जो भारत की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर करें, क्या वास्तव में देशहित में कहा जा सकता है?
देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि विपक्ष की स्पष्ट विदेश नीति क्या है। क्या वे चाहते हैं कि भारत बिना सोचे-समझे किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद में कूद पड़े? या फिर यह सब केवल घरेलू राजनीति की सुर्खियां बटोरने का प्रयास है?
लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है। जनता को चाहिए कि जहां भी जनप्रतिनिधि जनता के बीच आएं, उनसे सीधे पूछा जाए कि उनकी विदेश नीति क्या है और वे भारत को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। आखिरकार राजनीति का अंतिम उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रहित होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल यह समझें कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि केवल सरकार की नहीं, पूरे देश की होती है। यदि बयानबाजी में संयम नहीं रखा गया तो उसका असर केवल राजनीतिक दलों पर नहीं, बल्कि देश की प्रतिष्ठा पर भी पड़ेगा।
भारत की जनता सजग है, जागरूक है और वह यह भलीभांति समझती है कि राष्ट्रहित से ऊपर कोई राजनीति नहीं हो सकती। इतिहास गवाह है कि जब भी देशहित और राजनीति के बीच चुनाव का समय आया है, भारत की जनता ने हमेशा राष्ट्र को ही सर्वोपरि रखा है।










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