पूरे देश में संत रविदास जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है ...
संत रविदास के जीवन की वो अद्भुत घटना,जब उनकी कठौती के जल से प्रकट हुई मां गंगा !
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को संत रविदास जयंती मनाई जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि संत रविदास ने क्यो कहा था- 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' और इससे जुड़ी पौराणिक कथा क्या है. अगर नहीं, तो आइए जानते हैं उस पौराणिक कथा के बारे में.
इस साल 1 फरवरी को पूरे देश में संत रविदास जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी. परंपरा के अनुसार, हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को इस महान संत का जन्मोत्सव मनाया जाता है. वाराणसी के नजदीक एक छोटे से गांव में जन्मे संत रविदास (जिन्हें 'रैदास' भी कहा जाता है) का कालखंड विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है. कुछ विद्वान इनका जन्म सन् 1377 बताते हैं, तो कुछ इसे 1450 के आसपास का मानते हैं. लेकिन, उनके जन्म के साल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उनका वह संदेश, जिसने समाज में व्याप्त कुरीतियों और भेदभाव की दीवारों को तोड़ दिया. ऐसे में आइए जानते हैं आखिर कठौती से मां गंगा कैसे प्रकट हुईं और संत रविदास से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है.
सेवा भाव से संत बनने तक का सफर...
15वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक संत रविदास का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो आजीविका के लिए जूते बनाने का काम करता था. रविदास जी ने भी पैतृक कार्य को अपनाया, लेकिन उनका हृदय भक्ति और करुणा से ओत-प्रोत था. वे अक्सर साधु-संतों और निर्धन फकीरों को बिना धन लिए ही जूते भेंट कर दिया करते थे. उनके इस निःस्वार्थ सेवा भाव से पिता रुष्ट रहने लगे और आखिरकार एक दिन उन्हें घर से बाहर निकाल दिया. घर से निकाले जाने के बाद उन्होंने एक छोटी सी कुटिया बनाई और वहीं जूते मरम्मत का कार्य जारी रखा. काम के साथ-साथ उनके मुख पर हमेशा प्रभु का नाम रहता था. उनके विनम्र स्वभाव और ज्ञानवर्धक दोहों ने लोगों को इतना प्रभावित किया कि उनके पास श्रद्धालुओं का तांता लगने लगा.
मन चंगा तो कठौती में गंगा...
आज हम जिस कहावत का प्रयोग बार-बार करते हैं, उसके पीछे एक अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद घटना छिपी है. कहते हैं एक बार एक पर्व के मौके पर रविदास के पड़ोसी गंगा स्नान के लिए जा रहे थे. उन्होंने रविदास जी से भी साथ चलने का आग्रह किया. संत रविदास ने विनम्रतापूर्वक मना करते हुए कहा, "मैंने किसी को समय पर जूते देने का वचन दिया है और वचन तोड़ना धर्म नहीं है." उन्होंने एक सिक्का अपने पड़ोसी को दिया और आग्रह किया कि इसे उनकी ओर से मां गंगा को अर्पित कर दें.
सोने के कंगन का रहस्य...
कथा के अनुसार, जब पड़ोसी ने वह मुद्रा गंगा में अर्पित की, तो मां गंगा ने साक्षात प्रकट होकर बदले में एक स्वर्ण कंगन भेंट किया. पड़ोसी के मन में लालच आ गया और उसने वह कंगन राजा को दे दिया. जब रानी ने वैसा ही दूसरा कंगन मांगा, तो राजा ने उस पड़ोसी को आदेश दिया कि वह दूसरा कंगन भी लाकर दे, नहीं तो सजा दी जाएगी.
कठौती से प्रकट हुई गंगा...
सहमे हुआ पड़ोसी संत रविदास के चरणों में गिर पड़ा और सारी सच्चाई बता दी. संत रविदास ने बड़ी सहजता से कहा, "घबराओ मत, यदि मन में सच्चाई है तो सब संभव है." उन्होंने अपनी कठौती (लकड़ी का वह बर्तन जिसमें वे चमड़ा भिगोते थे) में जल भरा और मां गंगा का ध्यान किया. देखते ही देखते उस साधारण जल से वैसा ही दूसरा सोने का कंगन प्रकट हो गया. तभी उन्होंने वह कालजयी शब्द कहे- "मन चंगा तो कठौती में गंगा". यानी, अगर मनुष्य का हृदय पवित्र है और वह अपने कर्म के प्रति निष्ठावान है, तो उसे ईश्वर को खोजने कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है. बल्कि, भगवान उसके कर्म और उसके हृदय में ही वास करते हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. G.NEWS 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.)










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