लोकतंत्र की आड़ में झूठ-बोलो अफवाह फैलाओ देश की जनता को गुमराह करो और निकल लो !
नेता विपक्ष ने संसद को बना दिया है अफ़वाहों का अखाड़ा,आखिर झूठ बोलने की छूट कब तक !
देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद में यदि कोई व्यक्ति बार-बार बिना तथ्य, बिना प्रमाण और बिना ज़िम्मेदारी के बयानबाज़ी का मंच बना बनाकर देश की जनता को गुमराह करने का लगातार प्रयास कर रहा है, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं रह जाती, बल्कि लोकतंत्र के साथ धोखा बन जाती है।
दुर्भाग्यवश, विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हालिया संसदीय वक्तव्यों ने इसी गंभीर चिंता को जन्म दिया है। उन्हें यह भली भांति समझना चाहिए कि विपक्ष का दायित्व सत्ता से सवाल पूछना है झूठ फैलाना नहीं। लेकिन जब उनके द्वारा देश की सरकार के खिलाफ, सेना के खिलाफ और यहां तक की व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ संसद के भीतर अनर्गल तथ्य रहित झूठे आरोप लगाकर एक प्रोपेगेंडा फहराया जाता है तो यह देश एवं लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। उन्हें मंथन करना चाहिए कि जब भी वे ऐसे आरोप लगाएं तो उनका कोई कोई दस्तावेज़ी आधार हो ।
बिना किसी कोई ठोस प्रमाण सदन के अंदर आरोप लगाना यानी सीधे-सीधे देश की छवि और सरकार के अधीन संस्थाओं की साख को देश की जनता पूरी दुनिया के सामने धूमिल करना है। एल ओ पी द्वारा सवाल उठना लाज़िमी है लेकिन क्या एल ओ पी का इस प्रकार का व्यवहार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या जानबूझकर देश को गुमराह करने का प्रयास !
नेता प्रतिपक्ष-विशेषाधिकार या विशेष ज़िम्मेदारी !
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद कोई साधारण राजनीतिक कुर्सी नहीं है। यह पद संवैधानिक गरिमा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की मांग करता है। ऐसे में यदि इस पद पर बैठा व्यक्ति बार-बार देश, संसद और संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अप्रमाणित आरोप लगाता है, तो यह न केवल संसदीय परंपराओं का अपमान है, बल्कि देश के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने की कोशिश भी प्रतीत होती है।
सोशल मीडिया के दौर में झूठ को राजनीतिक हथियार बनाने की फ्रॉक में है नेता विपक्ष
आज का भारत सूचना युद्ध के दौर से गुजर रहा है। वैश्विक मंचों पर देश की साख दांव पर रहती है। ऐसे समय में संसद के भीतर से उठी झूठी या भ्रामक बातें देश विरोधी शक्तियों के लिए हथियार बन जाती हैं।
सवाल यह नहीं है कि सत्ता सही है या विपक्ष ! सवाल यह है कि क्या झूठ बोलकर जनता को भ्रमित करने वालों पर कोई जवाबदेही तय होगी या नहीं !
कानून सबके लिए समान क्यों नहीं...
यदि कोई आम नागरिक सार्वजनिक मंच से झूठ फैलाकर देश में भ्रम पैदा करे, तो उस पर कानूनी कार्रवाई होती है।
- तो फिर क्या सांसद होने से झूठ बोलने की छूट मिल जाती है !!!
- क्या नेता प्रतिपक्ष होना देश को गुमराह करने का लाइसेंस है !!!
- यह समय गंभीर आत्ममंथन का है। अब सदन को यह तय करना होगा कि
- देश के विरुद्ध, संसद के भीतर झूठ बोलकर जनता को भ्रमित करने वालों पर आरोप तय होंगे या नहीं !!!
चेतावनी स्पष्ट है...
लोकतंत्र बहस से चलता है,भ्रम से नहीं !
विपक्ष सवाल करे, आरोप लगाए लेकिन सबूत के साथ'अन्यथा इतिहास गवाह है,जो संसद को कमजोर करते हैं, वे अंततः खुद जनता की अदालत में कठघरे में खड़े होते हैं"
देश चुप नहीं है...
जनता सब देख रही है और सब कुछ जानती है, इसलिए जितना ज्यादा झूठ बोलोगे,जितना देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास करोगे उतनी ज्यादा उग्र तरीके से जनता समय आने पर अपना जवाब देगी।










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