एप्सटीन फाइल के जिस वीडियो से एडिट करके निकाले गए PM के फोटो सहारे विपक्ष द्वारा ...
देश को भ्रमित कर,फर्जी फोटो के सहारे PM मोदी के चरित्र को धूमिल करने का प्रयास,भी हुआ विफल !
आज जब सोशल मीडिया अफ़वाहों का दरबार बन चुका है, तब कुछ लोग आधी -अधूरी तस्वीरों को ही पूरा सच घोषित करने की हड़बड़ी में दिखाई देते हैं। हालिया मामला भी कुछ ऐसा ही है, जहाँ एक वीडियो से निकाले गए एक साधारण स्क्रीनशॉट को लेकर ऊँची आवाज़ में बड़े-बड़े आरोप गढ़े जा रहे हैं।
सबसे पहले तथ्य की बात। जिस तस्वीर को लेकर शोर मचाया जा रहा है, वह किसी वीडियो का एक क्षणिक फ्रेम है। उस वीडियो में तीन वयस्क लोग एक सामान्य इनडोर वातावरण में खड़े दिखाई देते हैं। न दृश्य आपत्तिजनक है, न संदर्भ असामान्य। कैमरा चलता है, लोग खड़े हैं—बस यहीं तक दृश्य की सच्चाई सीमित है।
अब ज़रा ठहरकर सोचिए। क्या किसी वीडियो के एक फ्रेम से किसी व्यक्ति की नियत, चरित्र या आचरण तय किया जा सकता है? क्या कानून, समाज या विवेक तीनों में से कोई भी ऐसी जल्दबाज़ी की इजाज़त देता है? उत्तर साफ़ है नहीं।
विडंबना यह है कि जब तथ्य कमज़ोर पड़ते हैं, तब कल्पनाएँ ताज पहनकर सच बनने की कोशिश करती हैं। एक सामान्य मुलाक़ात को जबरन “सेक्स स्कैंडल”, “अनैतिक आचरण” और “चरित्र दोष” जैसे शब्दों से सजाया जा रहा है, जबकि इन दावों के समर्थन में न कोई प्राथमिकी है, न कोई जाँच रिपोर्ट, न कोई न्यायिक आदेश।
यह याद रखना ज़रूरी है कि वीडियो का स्क्रीनशॉट सबूत नहीं, केवल दृश्य होता है। सबूत वह होता है जो जाँच, प्रमाण और प्रक्रिया से गुज़रकर सामने आए। भावनात्मक कैप्शन, उत्तेजक शब्द और बार-बार दोहराई गई अफ़वाहें, इनसे सच का निर्माण नहीं होता।
दरअसल, यह तरीका नया नहीं है। जब मुद्दों पर बहस कठिन हो जाती है, तब व्यक्तित्व पर प्रहार आसान रास्ता लगता है। तर्क के अभाव में चरित्र हनन का सहारा लेना हमेशा से कमजोर दलीलों की पहचान रहा है।
सीधी-सी बात है...
- अगर कोई आरोप है, तो उसका आधार दिखाइए।
- अगर कोई अपराध है, तो उसका प्रमाण लाइए।
- और अगर कुछ भी नहीं है, तो वीडियो के एक फ्रेम को हथियार बनाकर भ्रम फैलाना बंद कीजिए।
निष्कर्ष उतना ही स्पष्ट है जितना दिन का उजाला...
- यह वीडियो का स्क्रीनशॉट सामान्य है,
- इससे जो कहानी गढ़ी जा रही है वह काल्पनिक है,
- और इसे सच की तरह पेश करना भ्रामक प्रचार के सिवा कुछ नहीं।
सच को न तो शोर की ज़रूरत होती है, न सनसनी की...
वह अपने तथ्यों के साथ खड़ा रहता है और अफ़वाहें, देर-सवेर, अपने ही बोझ से ढह जाती हैं।










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