जब समाज टूटता है, तब सत्ता भी हारती है...
स्वयं को सर्वोपरि दिखाने की होड़ में,समाज को एक होने ही नहीं देना चाहते,कुछ समाज कंटक !
पैसा, पावर और जाति-वर्ग के दंभ में कुछ लोग स्वयं को दूसरों से सर्वोपरि/श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में समाज को एक सूत्र में बंधने ही नहीं देना चाहते। ये वही समाजकंटक हैं, जो अपने सीमित स्वार्थ के लिए सामाजिक एकता को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। उन्हें डर है—अगर समाज एक हो गया, तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी।
सरकारें नीतियाँ बनाती हैं, योजनाएँ लाती हैं, सामाजिक समरसता का संदेश देती हैं। लेकिन जब भीतर ही भीतर कुछ लोग जाति, वर्ग और प्रभाव के नाम पर दीवारें खड़ी करते रहें, तो प्रयासों की गति धीमी पड़ जाती है। दुर्भाग्य यह है कि ये तत्व खुलेआम समाज को बाँटने का काम करते हैं और खुद को उसका रहनुमा बताने से भी नहीं चूकते।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट संदेश—“एक रहोगे तो नेक रहोगे, बँटोगे तो कटोगे”—को हल्के में लेना आत्मघाती भूल होगी। यह नारा नहीं, इतिहास का निचोड़ है। जब-जब समाज विभाजित हुआ है, तब-तब बाहरी और भीतरी ताकतों ने उसका लाभ उठाया है। और जब समाज एकजुट हुआ है, तब उसने असंभव को भी संभव कर दिखाया है।
आज समस्या यह नहीं कि संदेश स्पष्ट नहीं है; समस्या यह है कि कुछ लोग उसे समझना ही नहीं चाहते। वे जानते हैं कि एकजुट समाज में न तो जातिगत ठेकेदारी चलेगी, न ही पैसे और पावर की अकड़। इसलिए वे हर उस प्रयास को कमजोर करते हैं जो समाज को जोड़ने की बात करता है।
यह समय चेतने का है। अगर अब भी हम नहीं समझे, तो आने वाला कल और अधिक कठोर होगा। समाज का भविष्य किसी एक सरकार, एक नेता या एक नीति से नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक समझ और एकता से तय होगा।
आज फैसला हमें करना है...
- या तो हम एक होकर मजबूत बनें,
- या फिर बँटकर अपनी ही कमजोरी का शिकार हों।
- इतिहास माफ नहीं करता, और आने वाली पीढ़ियाँ सवाल जरूर करेंगी।










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