पेशा, पैसा, पावर और पॉलिटिक्स का ऐसा घातक मिश्रण तैयार होता है,तब ...
कानून का मखौल उड़ाना और अपने 'स्टेटस सिंबल' दिखाकर पॉलिटिक्स में उतरने का प्रयास !
पेशा, पैसा, पावर और पॉलिटिक्स के गठजोड़ ने कानून को तमाशा बना दिया है-और उसकी कीमत हर बार आम आदमी चुका रहा है। लेकिन ऐसे लोग भूल जाते हैं कि कानून बौना नहीं, सत्ताधारी सोच बौनी होती है,और कानून जब अपनी पर आ जाता है तो बड़े-बड़ों को उनकी औकात याद दिला देता है। कहते फिर कोई नेता,व्यापारी,जज या फिर वकील या पुलिस वाला ही क्यों न हो।
लोकतंत्र में कानून सर्वोपरि होता है - कम से कम किताबों और भाषणों में यही देखने व् सुनने को मिलता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। आज सबसे ज़्यादा कानून का मज़ाक वही लोग उड़ाते नज़र आते हैं, जिनका पेशा ही व्यवस्था, अनुशासन और सार्वजनिक जिम्मेदारी से जुड़ा है। पेशा, पैसा, पावर और पॉलिटिक्स का ऐसा घातक मिश्रण तैयार हो चुका है, जिसमें कानून को बौना दिखाना बहादुरी नहीं, बल्कि “स्टेटस सिंबल” बन गया है।
निषेधाज्ञा लागू हो, धारा 144 लगी हो या किसी प्रकार की कानूनी पाबंदी - इन सबके बावजूद धरना, प्रदर्शन, नारेबाज़ी और शक्ति प्रदर्शन खुलेआम होता है। सवाल यह नहीं कि कानून तोड़ा गया, सवाल यह है कि किसने तोड़ा। क्योंकि अगर तोड़ने वाला “प्रभावशाली” है, तो कानून खुद कटघरे में खड़ा नज़र आता है और दोषी मंच पर।
इस तमाशे की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसकी सज़ा कभी दोषी को नहीं मिलती। ट्रैफिक जाम में फंसा आम नागरिक, एंबुलेंस में तड़पता मरीज़, दुकान बंद करने को मजबूर छोटा व्यापारी,सब इसकी कीमत चुकाते हैं। जिनके लिए कानून बना है, वही सबसे ज़्यादा उससे कुचले जा रहे हैं।
और इससे भी ज़्यादा खतरनाक वह संदेश है जो समाज के मन में जाता है। जहाँ आम आदमी ऊँची आवाज़ में बोलने से पहले दस बार सोचता है, वहीं कुछ खास लोग सड़कों और कोर्ट परिसर तक में भी नारेबाज़ी करने से नहीं चूकते हैं, व्यवस्था को चुनौती देते हैं और बेखौफ घूमते हैं। ऐसे में जनता के मन में कानून के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि डर और अविश्वास जन्म लेता है। कानून के रखवालों के प्रति भरोसा टूटता है और यह टूटन लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
कानून तभी मज़बूत होता है जब वह समान रूप से लागू हो। अगर नियम सिर्फ कमजोर के लिए हैं और ताकतवर के लिए अपवाद, तो यह कानून नहीं-एक दिखावा है। आज ज़रूरत इस बात की है कि सत्ता, संगठन और प्रभाव से ऊपर उठकर कानून को उसकी असली हैसियत लौटाई जाए।
वरना याद रखना होगा—जब कानून बौना बनता है, तो अराजकता विशालकाय हो जाती है। और अराजकता में सबसे पहले वही कुचला जाता है, जिसे हम “आम आदमी” कहते हैं -रामवीर यादव









0 Comments