G NEWS 24 : टैक्स देने वाले सभी नागरिक लेकिन उस टैक्स के पैसे पर पलने वाले केवल कुछ VIP !

वीआईपी संस्कृति बनाम जनतंत्र ...

टैक्स देने वाले सभी नागरिक लेकिन उस टैक्स के पैसे पर पलने वाले केवल कुछ VIP !

भारत का संविधान समानता की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे ठीक उलट दिखाई देती है। सरकार द्वारा प्रदत्त वीआईपी कोटे की बदौलत इतराने वाले कुछ लोग यह तथ्य भूल जाते हैं कि उन्हें मिलने वाली हर विशेष सुविधा जनता से वसूले गए टैक्स के पैसे से ही आती है। सवाल यह नहीं है कि किसी को सुरक्षा क्यों दी जाए, सवाल यह है कि किसे, कितनी और किस कीमत पर?

इस देश का हर नागरिक—चाहे वह पैदल चलने वाला हो या लग्ज़री गाड़ी में सफ़र करने वाला, चाहे वह छप्पन भोग खाता हो या सूखी दाल-रोटी—किसी न किसी रूप में टैक्स देता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, टैक्स व्यवस्था से कोई भी अछूता नहीं है। जब टैक्स सभी भरते हैं, तो फिर टैक्स के पैसे से कुछ खास लोगों के लिए खास सुविधाएँ क्यों?

केंद्र सरकार के आँकड़े चौंकाने वाले हैं, करीब 19,467 लोगों को वीआईपी या विशेष सुरक्षा प्रदान की जा रही है और इस व्यवस्था में लगभग 66,000 सुरक्षा कर्मी विभिन्न एजेंसियों से तैनात हैं। इन सुरक्षाकर्मियों के वेतन, भत्ते, आवास, वाहन, ईंधन और अन्य सुविधाओं पर सालाना खर्च लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये में पहुँच चुका है। यह पैसा किसी निजी तिजोरी से नहीं, बल्कि आम जनता की जेब से निकलता है।

विडंबना यह है कि जिन लोगों को यह सुरक्षा दी जा रही है, उनमें से कई पहले से ही लाखों रुपये वेतन, भत्ते और सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या उनकी सुरक्षा का पूरा बोझ भी जनता ही उठाए?

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में गंभीर और ठोस खतरे में है, तो सुरक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन सुरक्षा को स्टेटस सिंबल बना देना, लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।

आज वीआईपी संस्कृति का दायरा इतना बढ़ गया है कि सरकारी सुरक्षा केवल जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि रुतबा दिखाने का माध्यम बन चुकी है। एस्कॉर्ट, सायरन, काफ़िले, सड़कें रोकना—इन सबका खामियाज़ा आम नागरिक भुगतता है, जो एंबुलेंस में फँसा रहता है, दफ्तर या अस्पताल देर से पहुँचता है और फिर भी टैक्स देता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार कुछ कठोर और न्यायसंगत फैसले ले -

  • अनावश्यक वीआईपी सुरक्षा की समीक्षा हो और केवल वास्तविक खतरे के आधार पर ही सुरक्षा दी जाए।
  • जिन वीआईपी को उच्च वेतन, सरकारी आवास और अन्य सुविधाएँ पहले से मिल रही हैं, उनसे सुरक्षा पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा वसूला जाए।
  • यदि पूरी सुरक्षा का खर्च उनसे लेना संभव नहीं है, तो कम से कम उनके और उनके परिजनों द्वारा उपयोग की जाने वाली अन्य सरकारी सुविधाओं पर होने वाले खर्च की भरपाई उनसे ही कराई जाए।
  • वीआईपी संस्कृति को बढ़ावा देने वाली मानसिकता पर रोक लगे और सुरक्षा को विशेषाधिकार नहीं, जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए।
यह सवाल तीखे हैं, और कुछ लोगों को ये सवाल निश्चित रूप से असहज करेंगे। लेकिन लोकतंत्र में असहज सवाल ही बदलाव की नींव रखते हैं। टैक्स देने वाली जनता यह जानने की हकदार है कि उसका पैसा किस पर, क्यों और कितनी ईमानदारी से खर्च हो रहा है। जब तक वीआईपी संस्कृति पर सवाल नहीं उठेंगे, तब तक ‘जनता का शासन’ सिर्फ़ एक नारा बना रहेगा। अब वक्त है यह तय करने का कि भारत में सबसे बड़ा वीआईपी कौन है, सत्ता में बैठा व्यक्ति या टैक्स देने वाला आम नागरिक !

- रवि यादव

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