जब शिक्षक की विदाई के अवसर पर विद्यार्थी फूट -फूटकर रोये…

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को मिलने वाला सम्मान   राष्ट्रपति पुरस्कार से भी बढ़ कर है



म.प्र के छतरपुर जिले में राजनगर तहसील की सरकारी माध्यमिक शाला में विगत 13 वर्षों से पदस्थ शिक्षक रामगोपाल बिरौना का स्थानान्तरण उसी तहसील के सरकारी आदर्श विद्यालय में कर दिया गया जो कि शासकीय सेवा में एक सामान्य प्रक्रिया है | लेकिन उक्त शिक्षक की विदाई के अवसर पर विद्यार्थी फूट – फूटकर रोये | श्री बिरौना गणित जैसे विषय का अध्यापन करते थे जिसे आम तौर पर कठिन कहा जाता है किन्तु जैसा क्षेत्र के अभिभावकों द्वारा बताया गया , उक्त शिक्षक अपने शासकीय दायित्व के अलावा भी विद्यार्थियों के प्रति जिस तरह संवेदनशील रहे उसकी वजह से उनके साथ उनका सम्बन्ध शिक्षक से बढ़कर परिवार के सदस्य जैसा बन गया था | किसी छात्र के विद्यालय न आने पर वे उसका कारण पता करने घर पहुंच जाते थे | यदि वह अस्वस्थ होता तो नित्यप्रति उसका हाल जानते रहते | कई बार तो जरूरत पड़ने पर विद्यार्थियों को अपने वाहन से घर तक पहुँचाने जैसी सौजन्यता भी वे निःसंकोच दिखाते थे | 

अनेक अभिभावकों ने बताया कि कोरोना काल में जब विद्यालय बंद थे तब श्री बिरौना अपने छात्रों की पढाई के प्रति पूरी तरह चिंता करते रहे ताकि वे पिछड़ न जाएँ | प्रारंभिक स्तर की शिक्षा में शिक्षक और छात्रों के बीच मधुर सम्बन्ध होना स्वाभाविक होता है | छोटे बच्चों को शिक्षा के प्रति आकर्षित करने के लिए शिक्षक उनके साथ स्नेहपूर्ण सम्बन्ध बनाते हैं | लेकिन माध्यमिक स्तर आते – आते तक अनुशासन के फेर में वह स्नेह धीरे – धीरे कम होता जाता है | और फिर सरकारी शालाओं में तो हालात बहुत ही खराब हैं जिनके शिक्षकों की छवि लगातार खराब होती जा रही है | बड़े शहरों में तो फिर भी उन पर निगाह रहती है लेकिन अपेक्षाकृत छोटे स्थानों में सरकारी शालाओं और शिक्षकों के प्रत्ति समाज में अच्छी धारणा नहीं है | इसके लिए सरकार की नीतियों के साथ ही नेताओं और सरकारी अधिकारियों के बच्चों का महंगे निजी विद्यालय में पढ़ना है | 

आज स्थिति ये है कि ज्यादातर शासकीय शिक्षक अच्छा ख़ासा वेतन लेने के बावजूद अपनी संतानों को निजी विद्यालय में दाखिल करवाते हैं जिससे ये निष्कर्ष निकालना आसान हो जाता है कि शासकीय विद्यालयों में अध्ययन और अध्यापन दोनों की गुणवत्ता खत्म हो चुकी है | ऐसे में राजनगर तहसील से आई उक्त खबर ताजी हवा के खुशनुमा झोके का एहसास करवाती है | दो दिन बाद देश के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जावेगा | उस दिन अपने कार्य के प्रति समर्पित योग्य शिक्षकों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित करने की परम्परा भी है | चंद अपवाद छोड़कर लगभग प्रत्येक शिक्षक की दिली तमन्ना होती है कि उसे ये सम्मान प्राप्त हो | हालाँकि चयनित सभी शिक्षक सम्मान के पात्र होते हैं इस पर विवाद किया जा सकता है परन्तु इस बहाने देश के भविष्य निर्माण में शिक्षकों के योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने की औपचारिकता तो पूरी हो ही जाती है | लेकिन इससे हटकर अपने देश में जो गुरु पूजन की परम्परा गुरु पूर्णिमा के रूप में सदियों से चली आ रही है उसकी पवित्रता असंदिग्ध है क्योंकि उस श्रद्धा और सम्मान में सरकारी तंत्र की भूमिका नहीं रहती और वह स्वप्रेरित है |

आज के दौर में जब सब कुछ व्यावसायिक और मशीनी हो गया है तब शिक्षा और शिक्षक के प्रति अवधारणा में भी बदलाव आया है जिसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता | इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि आजादी के 75 साल में शिक्षा को लेकर जितने प्रयोग हुए उतने शायद अन्य किसी क्षेत्र में नहीं हुए होंगे | जो सरकार या शिक्षा मंत्री आया उसने अपने मनमाफिक बदलाव किये जिनमें कुछ तो वाकई सुधार कहे जा सकते हैं लेकिन बाकी सब अक्ल का अजीर्ण साबित हुए | दूसरी सबसे बड़ी गलती ये हुई कि सरकारी शिक्षकों को आम सरकारी मुलाजिम मानकर वोटर लिस्ट , जनगणना , चुनाव ड्यूटी और ऐसे ही अन्य कार्यों में लगाये जाने की वजह से उनका मूल कार्य प्रभावित होने लगा | और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की ज्यादातर सरकारी शालाओं मंज अध्ययन और अध्यापन का स्तर औसत से भी नीचे चला गया | लेकिन आज भी अनेक शिक्षक हैं जो व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था से अछूते रहते हुए अपने कर्तव्य के निर्वहन के प्रति सहज भी हैं और समर्पित भी | 

संदर्भित प्रसंग में ऐसे ही शिक्षक के तौर पर श्री बिरौना चर्चा में आये हैं | इस बारे में ये कहना उचित होगा कि देश भर में सर्वे किया जावे तो उन जैसे हजारों न सही लेकिन सैकड़ों शिक्षक मिल जायंगे जो सरकारी भर्राशाही के बावजूद शिक्षक को गुरु के तौर पर प्रतिष्ठित करने प्रयासरत हैं | वैसे भी किसी गुरु की सबसे बड़ी उपलब्धि शिष्यों से मिलने वाला सम्मान है और उस दृष्टि से उक्त शिक्षक के स्थानांतरित होने पर छात्रों का रोना इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में केवल सरकार से मिलने वाला वेतन ही अर्जित नहीं किया अपितु उससे कहीं ज्यादा मूल्यवान विद्यार्थियों का स्नेह कमाया | आज जब सर्वत्र नकारात्मकता का बोलबाला है तब ऐसे लोगों के कृतित्व का ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया जाना समाज हित में होगा | 

रचनात्मक कार्यों में लगे लोगों को भी ऐसे शिक्षकों सहित उन व्यक्तित्वों का सम्मान करना चाहिए जिससे अच्छे कार्य करने के प्रति आकर्षण उत्पन्न किया जा सके | इस बारे में उल्लेखनीय है कि समाज द्वारा दिया गया सम्मान सरकारी पुरस्कार से कहीं ज्यादा प्रतिष्ठित होता है | श्री बिरौना को उनके छात्रों ने सजल नेत्रों से जो विदाई दी उसके सामने राष्ट्रपति भवन में बजने वाली तालियाँ भी फीकी नजर आती हैं l