48 दिवसीय भक्तामर विधान में पहुँचकर श्रध्दालु कर रहे प्रभु आराधना 

अच्छे संस्कार ही स्वर्ग और मोक्ष हैं तो बुरे संस्कार ही नर्क, निगोद हैं : मुनिश्री

ग्वालियर l  जिसका मन बच्चे की तरह पवित्र अौर स्वच्छ होगा उसे ही धर्म का फल मिलेगा। हमें धर्म, साधना, तपस्या, उपवास, स्त्रोतों अौर ईश्वर से बहुत उम्मीद होती है। पवित्र अौर स्वच्छ मन से किया गया धर्म हमेशा सुखद फल देता है। जिसके विचार बुरे हैं उसकी किस्मत हमेशा खराब रहती है। हमारे पास पर्याप्त धन है, आलीशान मकान है, हर जरूरी सामान है, लेकिन दान करने का मन नहीं है तो इन सबके होने का कोई अौचित्य नहीं। हमें विचारों की दरिद्रता को दूर करने के लिए ईश्वर की आराधना करना चाहिए। तभी जीवन का कल्याण संभव है। यह बात श्रमण मुनिश्री विनय सागर महाराज ने साधनमय बर्षयोग समिति एवं सहयोगी संस्था पुलक मंच परिवार ग्वालियर के तत्वावधान में आज सोमवार को माधवगंज स्थित चातुर्मास स्थल अशियाना भवन में आयोजित 48 दिवसीय श्री भक्तामर महामंडल विधान में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।

मुनिश्री ने कहा कि जिसके जीवन में नम्रता, कोमलता एवं गुणग्रहण की दृष्टि हुआ करती है वह अपने जीवन में बहुत आगे उन्नति कर लेता है। विनय के साथ विद्या प्राप्त होती है, धन प्राप्त होता है। वहीं जो व्यक्ति अहंकारी होता है वह भोजन में कंकड़ के समान होता है और जो व्यक्ति विनयवान होता है वह जीरा के समान होता है। कंकड़ से कुरकुरा भी किरकिरा हो जाता है और जीरा डालने से उसमें स्वाद और जायका बढ़ जाता है। इसलिए अपने जीवन में अहंकार को स्थान ना देते हुए विनय गुण ही स्थान दें, क्योंकि विनय के माध्यम से लोग आकर्षित होते हैं।

मुनिश्री विनय सागर महाराज ने विशेष मंत्रो का उच्चारण कर इंद्रो ने पीले वस्त्र धारण कर भक्तिभाव के साथ भगवान आदिनाथ जयकारों के साथ अभिषेक किया। मुनिश्री ने मंत्रो का उच्चारण कर शांतिधारा अजीत कुमार रूपचंद विनय जैन जैनम एवं हरीशचंद ऋषि जैन  परिवार ने की। मुनिश्री के पादप्रक्षालन एवं शास्त्रभेट विनय जैन पूर्व उपाध्यक्ष भाजपा युवा मोर्चा ने किए। विधानचार्य विजय कुमार व ज्योतिचार्य हुकुमचंद जैन ने भक्तामर के 48 मंत्रों के उच्चारण के साथ विधानकर्ता अजित कुमार रूपचंद विनय जैन, हरिशचंद्र ऋषि जैन परिवार सहित श्रद्धालुओं ने अष्ट्रद्रव्य से पूजन कर भजन सम्राट शुभम जैन सैमी के भक्तिमय स्वरों के साथ भगवान आदिनाथ के समक्ष भक्तामर मंडप पर श्राद्ध भक्ति से साथ समर्पित करें।

मुनिश्री ने आगे कहा कि जैसे हमारे संस्कार होंगे वैसा ही हमारा संसार होगा। संस्कारों से ही संसार का अंत होता है। संस्कारों से ही हमारा संसार अनंत भी होता है, अर्थात संस्कार से हम संसार से तर सकते हैं। संस्कार से ही डूब भी सकते हैं। हमारे अच्छे संस्कार ही स्वर्ग और मोक्ष हैं तो हमारे बुरे संस्कार ही नर्क, निगोद हैं। यह संस्कार में कुछ तो मां के गर्भ से प्राप्त होते हैं। कुछ पूर्व जन्म के होते हैं और कुछ तो संगति के होते हैं। इन सब संस्कारों में मां के द्वारा दिए गए संस्कार ही श्रेष्ठ होते हैं जो गर्भ से लेकर आते हैं। इसलिए माताओं को चाहिए कि यदि वे अपनी संतान को कंस नहीं कृष्ण, मारीच नहीं महावीर, रावण नहीं राम, बुद्धु नहीं बुद्ध बनाना चाहती है। तो गर्भावस्था में श्रेष्ठ आचरण करे।