ओबीसी मतदाताओं की भूमिका को देखते हुए नहीं रहना चाहते पीछे…

MP में भाजपा और कांग्रेस में मची ओबीसी का हितैषी दिखने की होड़

भोपाल। मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में ओबीसी का हितैषी दिखने की होड़ मची हुई है। वर्ष 2018 के अंत में प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आई। कमल नाथ सरकार ने बड़ा सियासी दांव खेलते हुए सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया लेकिन हाई कोर्ट में मामला चले जाने से यह लागू नहीं हो पाया था। मामला विचाराधीन है। सत्ता परिवर्तन के बाद शिवराज सरकार ने कांग्रेस से इस मुद्दे को छीनने और ओबीसी को उनका हक दिलाने के लिए पूरा जोर लगाया। सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। दरअसल, दोनों दल जानते हैं कि प्रदेश की राजनीति में ओबीसी मतदाताओं की अहम भूमिका है। उनका हितैषी बनने की होड़ इसीलिए है। ओबीसी मुद्दे का लाभ उठाने के लिए आगामी पंचायत चुनाव के लिए कमल नाथ सरकार ने वर्ष 2019 में परिसीमन कराया। 

आरक्षण की प्रक्रिया पूरी हो पाती इस बीच राज्य में सत्ता बदल गई। शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बने। उन्होंने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ सुनिश्चित कराने के लिए हाई कोर्ट में पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं को लगाया। जिन तीन भर्तियों के मामले में हाई कोर्ट ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को स्थगन दिया था, उन्हें छोड़कर बाकी भर्तियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया। वहीं, कमल नाथ सरकार के समय हुए पंचायतों के परिसीमन को निरस्त करके 2014 के परिसीमन और आरक्षण के आधार पर चुनाव कराने का निर्णय लिया। राज्य निर्वाचन आयोग ने कार्यक्रम घोषित कर दिया। निर्वाचन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई लेकिन आरक्षण में रोटेशन का पालन नहीं किए जाने और पुराने परिसीमन के आधार पर चुनाव कराने को लेकर कांग्रेस पक्ष की ओर से हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गईं। 

इन पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के लिए आरक्षित स्थानों को अनारक्षित में पुन: अधिसूचित करते हुए चुनाव कराने के निर्देश दिए। सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी और कांग्रेस भी इसे मुद्दा बना रही थी। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में सर्वसम्मति से संकल्प पारित कराया कि बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव न कराए जाएं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की लेकिन कोई राहत नहीं मिली और अंतत: सरकार को मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज संशोधन अध्यादेश वापस लेना पड़ा। इसके आधार पर ही पुराने परिसीमन और आरक्षण पर चुनाव कराए जा रहे थे। जब यह आधार ही समाप्त हो गया तो राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव निरस्त कर दिए। इसके बाद राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में दी लेकिन कोर्ट ने उसे ठीक नहीं माना और ताजा आदेश दिया।