लघुकथा

मां का आंचल...

आज मीरा शादी के बाद पहली बार अपने घर बिहार आई हुई थी, उसकी मां उसका इंतजार कर रही थी कि कब बेटी ससुराल से घर वापस आए और उसके गले से लग कर उसके ह्रदय को ठंडक पहुंचाएं। स्टेशन पर मीरा का भाई और बाबू जी लेने आए हुए थे, परंतु वह मां से मिलने को बहुत ही बेताब थी। आज शादी को पूरे एक महीना हो रहा था पर उसे लग रहा था जैसे अपनी मां से ना जाने कितनी सालों से दूर है। 

जैसे ही मीरा अपने घर पहुंची उसने सब कुछ छोड़ कर अपनी मां को सीधे गले से लगा लिया और आंखों से टप टप करके अश्रु वह रहे थे। मीरा को इस प्रकार रोते हुए देख , उसकी मां ने उसे थपथपा कर शांत किया और कहा,  बिटिया तुम शादी करके दूर जरूर गई हो पर तेरी नादान सी अटखेलिया स्मृति बनकर मुझे याद आती है ! अभी भी तुम मेरे लिए मेरी वही छोटी सी मीरा हो जो मेरे आंचल में छुप जाया करती थी! सच मैंने भी तुमको बहुत याद किया परंतु यह तो एक रिवाज है। 

 बिटिया को शादी करके पराए घर जाना ही पड़ता है। मीरा को इस प्रकार पहले कभी भी ना लगा था की एक दिन उसका ही घर उसे मेहमान की तरह लगेगा कि कुछ दिनों का आना फिर वापस लौट जाना। फिर भी मीरा ने कहां मां मेरा संसार तो तुम ही हो , मैं तुमसे कैसे अलग रह सकती हूं। तब मां ने उसको समझाया कि जीवन में हम सभी अपनी भूमिका निभाते हैं। अपने कर्तव्य का निर्वहन करना ही श्रेष्ठ है। "तुम स्त्री हो, सृजन का दायित्व तुम्हारा है।

आखिरकार तुम भी तो एक मां बनोगी और फिर तुम भी किसी के सर पर अपने प्यार भरे आंचल से अपनी ममता लुटाओगी"। यह कह कर मीरा के लिए उसकी मां ने अपने हाथ से बनाई हुई चुनरी उसे भेंट स्वरूप देते हुए कहा मीरा यह चुनरी मैंने अपने हाथों से तुम्हारे लिए तैयार की है और यह मां की आंचल की तरह सदैव तुम्हारे साथ रहेगी। मेरी दी हुई हर सीख तुम्हारे, संस्कारों मैं जीवित रहेगी और यह चुनरी तुम जब भी अपने सर पर से ओडूगी तो तुम्हें मेरे प्यार भरे स्पर्श से  "मां के आंचल" की अनुभूति होगी।

प्रतिभा दुबे 

(स्वतंत्र लेखिका)