ग्वालियर में स्मार्ट सिटी के नाम पर...

करोड़ो रुपया यूं अमृत योजना के नाम पर बहाया जा रहा है पानी में !

 

स्मार्ट सिटी नाम जेहन में आते ही एक तस्वीर उभरती है कि यहां आमजन को सभी सुविधाएं स्मार्ट यानी कि आदर्श रूप में प्राप्त होती होगी। चाहे फिर वो ट्रैफिक व्यवस्था हो, सड़कें हो, पानी सप्लाई की बात हो या लाइट व्यवस्था की या फिर ट्रांसपोर्ट की। ये सब कुछ स्मार्ट तरीके से सुचारू रूप से आमजन को मिल रही होंगी। लेकिन सोचने में और वास्तविकता में कितना डिफरेंस होता है कितना अंतर होता है यह ग्वालियर की जनता से बेहतर भला भला और किसे पता होगा। शासन-प्रशासन स्मार्ट सिटी में लोगों को 24 घंटे पानी देने का दावा करता है इस दावे को हकीकत में बदलने के लिए ग्वालियर स्मार्ट सिटी के द्वारा अमृत योजना के नाम पर सीवर लाइन और पीने के पानी की लाइन पूरे शहर में बिछाई गई है। लाइनों को बिछाने के लिए सड़कों को खोदा गया। उन सड़कों की स्थिति देखने लायक है। जो खुदाई के बाद आज तक पुनः बनने की राह ताक रही है। लेकिन वे आज तक नहीं बनी है। हां खुदाई के बाद कहीं कहीं ठेकेदार द्वारा पेच रिपेरिंग वर्क जरूर करवाया गया था। वो लेकिन जब इन लाइनों की टेस्टिंग की जाती है तो हजारों लीटर शुद्ध जल व्यर्थ ही सड़कों पर बह जाता है। बार-बार लाइन का वस्ट होना और यूं बेशकीमती पानी का बर्बाद होना गोर लापरवाही को उजागर करता है। सड़कों पर किस प्रकार पानी फैलने से आवागमन अवरुद्ध होने के साथ-साथ लोगों को परेशानी का सामना भी करना पड़ता है। साथ ही रोड डैमेज होती है सो अलग। जिस प्रकार की घटनाओं चाहिए सोता है कि जो वाटर लाइन डाली गई है वह कहीं ना कहीं लापरवाही की भेंट चढ़ी हुई है। 

कोई सुनने और देखने को तैयार नहीं तो पानी लीकेज के कारण जगह-जगह से पेच रिपेयरिंग के लिए डाला गया मटेरियल उखड़ रहा है।  इसके कारण इसके कारण शहर की सड़कों की स्थिति जर्जर हो चुकी है। इन सड़कों की से उड़ती धूल के कारण एक और तो बाजारों में दुकानदारों का व्यापार चौपट हो रहा है। दूसरी ओर लोग अस्थमा और दमे के मरीज बनते जा रहे हैं। रही बात शासन प्रशासन की इस शहर को 24 घंटे पानी देने की तो, 24 घंटे तो, छोड़िए कई स्थानों पर तो 1 दिन छोड़कर के पानी बमुश्किल 25 से 30 मिनट के लिए दिया जा रहा है ऐसे में 24 घंटे पानी मिलने की बात बेमानी लगती है। तिघरा में पानी सीमित है हर वर्ष तिगरा में लिफ्ट करके पानी काकेटो और अपर ककेटो से लाया जाता है तब कहीं जाकर तिघरा से ग्वालियर शहर को उसकी जरूरत का पानी मिल पाता है ऐसे में 24 घंटे पानी कहां से और कैसे दे सकते हैं यह सवाल यक्ष प्रश्न के रूप में शासन प्रशासन के सामने है। जनता के दिमाग में भी है लेकिन जनता को बरगला कर शासन-प्रशासन चंबल से पानी लाने का दावा बरसों से करता रहा है लेकिन अभी तक वह सिर्फ कागजों में ही है । पानी चंबल से अभी तक ग्वालियर आ नहीं पाया है ऐसे में पानी कहां से 24 घंटे दे पाएंगे ग्वालियर को यह जवाब किसी के पास नहीं है। जो दिन रात बेतरतीब ट्रेफिक,अनकंट्रोल्ड ट्रांसपोर्ट (सवारी वाहन) खासकर ऑटो, विक्रम, टमटम जैसे वाहन अपने रूट पर ना चल कर व्यस्ततम मार्गों पर ही ट्रैफिक जाम करते दिखाई पड़ते हैं। लावा इन वाहन चालकों ने शायद अपने स्टॉपेज पर रुकना तो सीखा ही नहीं है। 

ये तो ठीक किसी चौराहे, तिराहे या भीड़ भाड़ वाली जगह पर ही रुकेंगे जिससे कि इन्हें सवारी आसानी से मिल सके। फिर भले ही इनके कारण ट्रैफिक जाम हो रास्ता रुके, इन्हें उसकी परवाह कतई नहीं है। अब बात करें ट्रैफिक की तो ट्रैफिक हमारे शहर का ऐसा है कि कुछ एक सड़कों जैसे (रेस कोर्स रोड गांधी रोड आदि)को छोड़ कर अन्य सड़कों पर जो ट्रैफिक दौड़ता है उसमें चलना भगवान भरोसे ही है क्योंकि कोई भी कहीं से भी अपने वाहन को एंट्रेंस करा सकता है मोड़ सकता है कोई रोक-टोक नहीं है। ट्रैफिक सिग्नल यदा-कदा ही ठीक से काम करते हैं। जबकि तीन बार इन ट्रेफिक सिगनल्स को बदला जा चुका है। और जब यह ट्रैफिक सिग्नल ठीक से काम करते हैं तब इनके चारों ओर भिखारियों का जमावड़ा रहता है जिसे स्मार्ट सिटी ग्वालियर, शहर की पुलिस और नगर निगम के कर्मचारी बिल्कुल भी इन्हे यहां से हटाने की जहमत नहीं उठाते हैं। ये भिखारी इतने शातिर है कि ये स्वयं तो भीख मांगते ही हैं साथ में छोटे छोटे बच्चों से भी भीख मंगवाने का कार्य करते हैं साथ ही शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को खराब करने के साथ-साथ लोगों को भी परेशानी में डाल देते हैं। रेड लाइट होते ही यह यहां रुकने वाले वाहन चालकों को घेर लेते हैं और तब तक नहीं हटते हैं जब तक कि ग्रीन लाइट नहीं हो जाती है ऐसे में एक्सीडेंट होने के चांस भी बड़ जाते हैं लेकिन इन्हें यहां से हटाने वाला कोई नहीं है। ऊपर से सड़कों की जर्जर हालत इसे और भी खतरनाक बना देती है। 

आप सुबह निकलते तो घर से अच्छे वाले साफ-सुथरे हो अपने गंतव्य की ओर लेकिन शाम को आप अपने घर सही सलामत लौटेंगे यह आपकी किस्मत और आपकी समझदारी पर निर्भर करता है। केवल शहर की सड़कों पर बने डिवाइडरो की रंगाई पुताई करके उन पर पेड़-पौधे लगाने, किसी स्थान विशेष पर मौजूद पुरानी हिस्टोरिकल इमारतों का कायाकल्प करवाना या किसी सड़क विशेष को उखाड़ कर फिर से बनवाना। जबकि ये इमारतें पहले से ही बहुत अच्छी कंडीशन में है। फिर भी चलो ठीक है ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण समझ में आता है लेकिन जो सड़क अभी हाल में उखाड़ कर बनाई गई है वह पहले से ही बहुत अच्छी स्थिति में थी  फिर भी उसे उखाड़कर दुबारा बनाया गया। जबकि वह सड़क बहुत अच्छी स्थिति में थी। फिर भी उसे दुबारा बनाना। जबकि जो सड़कें खराब हैं उन्हें पहले बनाना चाहिए था। इसी प्रकार से तमाम कार्य पिछले दिनों शहर में कराए गए हैं  जिनसे शहर तो स्मार्ट नहीं हुआ लेकिन पैसे की बर्बादी जरूरी हुई। शहर तभी स्मार्ट होगा जब लोगों को बिजली पानी सुलभ सुगम यातायात साफ-सुथरी सड़कें सुचारू ट्रैफिक, ट्रांसपोर्ट, स्मार्ट स्कूल,स्वास्थ्य आदि की सेवाएं स्मार्ट तरीके से से मिले और धरातल पर वास्तविक रूप से मिले तभी शहर स्मार्ट होगा केवल कागजों में स्मार्ट होने से शहर स्मार्ट नहीं होते हैं।

- रवि यादव