भ्रष्टाचारी अपने मकसद में हुए कामयाब, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी का रेत माफिया और भ्रष्ट राजनेताओं के गठबंधन ने मिलकर किया ट्रांसफर...!

प्रदेश की शेरनी से अधिक कड़वी है श्रद्धा की कहानी

ग्वालियर। एक माह पहले रिलीज हुई मध्यप्रदेश की शेरनी में यहां अफसर, नेता और माफिया के गठजोड़ का खुलासा होने पर अधिकारियों को बड़ा कष्ट हुआ था। कई लोग यह कहते हुए सुने गए थे कि यह फिल्म प्रदेश की व्यवस्था की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करती है, इस फिल्म की खिलाफत करने वाले लोग अब क्या कहंेगे जब वन विभाग की एसडीओ श्रद्धा पांढरे जिसने मुरैना के रेत माफिया की नाक में नकेल डाल दी थी, उस पर तीन माह में पन्द्रह हमले हुए, उसका किसी ने सहयोग तो किया नहीं बल्कि अब माफिया के दबाव में तबादला कर दिया गया है। 

इस ट्रांसफर के बाद उन नेताओं पर भी सवालिया निशान लग गया है जो माफिया पर कार्रवाई की बात तो करते हैं लेकिन जब कोई इसके लिए सामने आता है और उसके साथ ऐसा हश्र होता है तो उसका साथ देने नहीं आते।अवैध रेत उत्खनन के लिए कुख्यात ग्वालियर और चंबल संभाग में वे ही अधिकारी चल पाते हैं जो इस अवैध उद्योग में सहयोग करते हैं। अगर किसी ने इसके खिलाफ जाने की कोशिश की तो उसका अंजाम उसे भुगतना पड़ता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ गोविंद सिंह इस अवैध उत्खनन को लेकर लगातार मांग करते रहते हैं, लेकिन जब उनके उपर भाजपा हमले करती है तो मामला ठंडा हो जाता है। बरसों से आरोप-प्रत्यारोप के खेल के बीच अवैध कारोबार वैध तरीके से निरंतर जारी है। 

इस माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने पर एसडीओ वन श्रद्धा पांढरे का तबादला उमरिया के मानपुर में उप वनमंडलाधिकारी बांधवगढ टाइगर रिजर्व भेजा गया है। श्रद्धा पांढरे पर हमले की बात केन्द्रीय मंत्री बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया तक भी पहुंची थी। उन्होंने भी आश्वस्त किया था कि इस मामले में कार्रवाई होगी। इसके एक माह बाद पांढरे का तबादला हो गया है। पांढरे को स्थानीय पुलिस का तो सहयोग मिला ही नहीं बल्कि सरकार ने भी इस महिला अधिकारी को स्थानांतरित कर दिया।

शेरनी में भी होता है ईमानदार अधिकारी का तबादला

हाल ही में आई फिल्म शेरनी में वन अधिकारी बनीं विद्या बालन ऐसे ही माफिया से जूझती है लेकिन अधिकारी, नेता और माफिया का गठजोड उसे सफल नहीं होने देता है, वह मध्यप्रदेश की शेरनी को नहीं बचा पाती है, यहीं नहीं जांच पर सवाल उठाने पर उसका तबादला कर दिया जाता है। शेरनी से यह मामला और आगे है क्योंकि शेरनी में कम से कम उस अधिकारी पर हमला नहीं हुआ था, लेकिन ये अधिकारी 15 हमले झेल चुकी है।