यूं तो ग्वालियर स्मार्ट सिटी में शामिल लेकिन...

एक विभाग चला कुछ अच्छा करने, तो दूसरा लगा रोड़े अटकाने !

ग्वालियर की गलियों और सड़कों को कचरे से मुक्ति दिलाने के लिए ग्वालियर नगर निगम द्वारा तमाम प्रयास किए गए।शहर के कचरे को डिस्पोज करने के लिए वैसे तो केदारपुर स्थित लैंडफिल साइट पर पूरा प्लांट लगा है लेकिन मैन पावर व संसाधन कम होने के कारण नगर निगम और निगम के साथ कचरा निपटान प्रबंधन से जुड़ी चाइना की इको ग्रीन कंपनी ने शहर में खाली पड़ी खदानों मैं शहर का कचरा भरकर उन्हें पार्क का रूप देने का प्रयास किया गया। निगम का या प्रयास रंग भी लाया और लक्ष्मण तलैया होकर जॉन जो कि बरसों से एक खदान के रूप में मलबे और गंदगी से भरी पड़ी हुई थी उसे सुंदर पार्क के रूप में तैयार किया गया है। निगम ने अपने इस कार्य से उत्साहित होकर शंकरपुर के बरा स्थित डंपिंग ग्राउंड को भी पार्क के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया और इसे विकसित करने का ठेकेदार को दे दिया। ठेकेदार के द्वारा पूरी मेहनत और लगन के साथ इस डंपिंग जोन को एक सुंदर पार्क का रूप देना शुरू कर दिया उसने स्वयं  और कुछ सामाजिक संस्थाओं साथ मिलकर यहां लगभग 500 से अधिक 5 से 7 फीट हाइट तक के पेड़ पौधे और मैदान में ग्रीन घास का रोपण करवाया गया एक सुंदर गेट बनवाया जा रहा है इसके साथ ही और भी तमाम विकास का ग्राउंड पर किए जा रहे हैं । 

लेकिन अब इस पार्क के निर्माण में अब एक नया ट्विस्ट वन विभाग ने पैदा कर दिया है। जब इन खदानों को डंपिंग जोन में बदला जा रहा था तथा यहां के आसपास के क्षेत्र की जमीन पर अवैध कब्जे किए जा रहे थे, तब वन विभाग में इन खदानों की कोई सुध नहीं ली लेकिन जब इन खदानों को निगम के द्वारा सुंदर पार्क के रूप में परिवर्तित किए जाने लगा तो वन विभाग ने अपनी निगाहें इन खदानों पर गड़ा दी हैं । इतना ही नहीं यहां जो विकास कार्य निगम के द्वारा कराए जा रहे हैं उन में अड़ंगा डालते हुए यह कहते हुए कि यह वन विभाग की जमीन है और इस पर किसी भी प्रकार का कोई कार्य नहीं कराया जा सकता है। क्षेत्र के बीट अधिकारी श्री गोंड व उनके साथियों द्वारा कार्य रुकवाने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। इतना ही नहीं यहां कार्य करने वाले ठेकेदार के साथ-साथ स्वच्छ भारत मिशन के नोडल अधिकारी पवन सिंघल पर बाकायदा मुकदमा भी कायम करा दिया है। इस मामले में यहां कार्य करने वाले ठेकेदार का कहना है कि वह तो वर्क आर्डर के आधार पर काम कर रहा है। और यदि वन विभाग को केस करना था तो नगर निगम के खिलाफ करना था मेरे खिलाफ केस किस आधार पर किया गया यह समझ से परे है। 

ऐसे तो कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी काम को करने से इंकार कर देगा क्योंकि यदि ठेकेदारों पर केस होने लगे तो फिर कोई सरकारी काम अपने हाथ में ही नहीं लेगा। इसी प्रकार स्वच्छ भारत मिशन के नोडल अधिकारी श्री सिंघल का कहना है की मेरा तो इस मामले से कोई लेना देना नहीं है फिर भी वन विभाग ने पता नहीं मेरे खिलाफ क्यों केस दायर कर दिया है। वही क्षेत्र के बीट निरीक्षक एसपी गोंड का कहना है कि यह वन विभाग की जमीन है। इस जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य या अन्य कार्य नहीं किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा की कुछ जमीन यहां वन विभाग की है और कुछ राजस्व की लेकिन वह भी इतना स्पष्ट नहीं कर पाए कि जिस जमीन पर पार्क बनाया जा रहा है वह राजस्व की या अथवा वन विभाग की। साथ ही एक प्रश्न और खड़ा होता है कि यदि यह जमीन वन विभाग की है तो वन विभाग ने इस क्षेत्र में माइनिंग की परमिशन व माइनिंग कैसे करने दी गई। और जमीन यदी राजस्व की है और उसने माइनिंग की परमिशन दी है तो राजस्व विभाग ने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि माइनिंग के बाद इन गड्ढों को ठेकेदार से भरवाया जाय। जमीन को बाउंड्री वाल बनाकर सुरक्षित कराया जाए। वही यहां रहने वाले क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि इस पार्क के बन जाने से उन्हें धूल धूल और गंदगी से बदबू से मुक्ति मिली है। 

इस मामले में क्षेत्र के पर्यावरण पर नजर रखने वाले अधिकारी का कहना है की क्षेत्र में कहीं भी कचरा जलाना अलाउड नहीं है यदि कोई ऐसा करता है तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही निगम या किसी अन्य संस्था को शहर के बीचो-बीच इस प्रकार कचरा एकत्रित करने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि सार्वजनिक हित के लिए खदान रूपी इन गड्ढों को भरकर यदि इन्हें पार्क का रूप दिया जा रहा है । चारों ओर बाउंड्री वॉल बनाकर जमीन को भी संरक्षित किया जा रहा है। तो वन विभाग को इसमें आपत्ति क्या है? वैसे भी वन विभाग का काम भी तो पेड़ पौधे व वनों को संरक्षित करना ही है और निगम भी तो वही काम करने का प्रयास कर रहा है। बरसों से यूं ही गंदगी उसके अंबार से पटे पड़े इन गड्ढों में कई लोग व जानवर पार्क इन गड्ढों में डूब कर अपनी जान गवा चुके थे।तब यह विभाग अपनी आंखें बंद किए क्यों बैठे रहे? कचरे से भरे इन गड्ढों में जब आग लगती है तो यहां आसपास रहने वाले लोगों को सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है इन गड्ढों से उठता हुआ जहरीला धुआं उनकी जिंदगी पर भारी पड़ रहा है ऐसे में अगर निगम यह कार्य कर रहा है तो वन विभाग को लोकहित में इस कार्य में आपत्ति हो ना ठीक नहीं है।