अगर भारत गांवों में बसता है तो देश संकट में है !

कहते हैं, भारत देश गांवों में बसता है। अब वहीं भारत संकट में आ गया है। गांवों में बिगड़ रहे माहौल को संभालना शासन/प्रशासन को भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरने वाली है। इन अंचलों में बढ़ती जनसंख्या से एकडों में फैली खेती का बंटवारा अब डिसमिलों में सिमटता जा रहा है। बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई है। यहां का किसान अब रूप बदलने लगा है। जो सही किसान हैं उनका संघर्ष बहुत कठोर हो गया है। ग्रामीण अंचलों में मौजूदा हालातों में सबसे बड़ी चुनौती शराबखोरी और बेरोजगारी बन गई है। आप किसी भी गांव में जाएंगे तो वहां पर कुछ वक्त बिताने पर ही आपको कोई शराबी किसी भी समय लड़खड़ाते, गाली गलौच करते मिल जाएगा। यहां कानूनी शिकंजा न के बराबर है। अपराधों में भी जमकर इजाफा हो रहा है। बेरोजगारी ऐसीं कि प्रायः हर घर मे बेरोजगारों की लाइनें लग गईं हैं। बढ़ती बेरोजगारी और एक दूसरे के प्रति बड़ रही ईर्ष्या ने ग्रामीण अंचलों में अपराधों का ग्राफ बढ़ाया है। पहले के गांवों की खुशहाली में मर्यादाओं का समावेश ही सबसे बड़ी पूंजी हुआ करती थी। 

यहां पहले की मर्यादाओं को तो अब तितर-बितर सा कर दिया गया है। पहले के गांवों में बड़े, बुजुर्गों का ऐसा सम्मान होता था कि उनके सामने खड़े होना तो दूर बात करने से पहले हजार बार सोचना होता था। घर के छोटे अपने से बड़ों को कुछ जरूरी कहने के लिए अपनी माँ, रिस्तेदारों या परिचितों से खबरें पहुंचाया करते थे। ऐसा नही था कि छोटे ही मर्यादा करते थे, बड़े भी अपनी मान-प्रतिष्ठा का विशेष ख्याल रखते थे। पहले के गांवों में छोटे-छोटे झगड़ों पर कोई ध्यान नही दिया करता था। बड़े मसलों को भी पंचायतों की बैठकों में सुलझा लिया जाता था। आज के अधिकतर गांवों में बेरोजगारी है। शराबखोरी है। जुआरियों का हर कहीं जमावड़ा बैठा दिख जाया करता है। जो गांवों में रहकर सुखी जीवन बिताना चाह रहे हैं उन्हें ऐसीं मुसीबतों का सामना करना पड़ता है जिसका लेना-देना उस परिवार से कोषों दूर तक नही रहता है। यहां ईर्ष्या के पांवों ने समर्द्धों का जीना दूभर कर दिया है। समर्द्धों का शहरों में पलायन इसी ईर्ष्या का परिणाम है न कोई अपनी मिट्टी से अलग होना नही चाहता है। 

जो नौकरी, व्यवसाय, अपने बच्चों की शिक्षा या शहरी माहौल के परिवेश की तरक्की के चलते गांवों से शहरों में गए हैं वो अलग विषय है। पर जो अच्छी जिंदगी बिता रहे हों और अपने गांव के बिगडते माहौल से पलायन करने पर मजबूर हुए हैं वो उनकी मजबूरी ही कही जाएगी। यहां एक और गौर करने वाली बात देखी गई है, जिस जगह गांव का माहौल खराब हो गया है, और जो गांव में रहकर उस परिवेश में रहना नही चाह रहा है वो शहर में शहरवासियों के बीच रहकर अपना समय बिताता है। शहरी क्षेत्रों में बन रहीं नयी-नयी कालोनियों को सर्च करने पर पाएंगे कि इनपर अधिकतर उसी क्षेत्र से लगे ग्रामीणों के प्लाट/मकान हैं। 

ये अभी तक मिथ्या ही साबित हुई है कि गांवों के लोग भोले-भाले होते हैं। देश से लेकर प्रदेशों में नाम कमाने वालों में अधिकतर ग्रामीण अंचलों से जुड़े रहे हैं। आज आधुनिकता के दौर में, बदलते परिवेश के लाभार्जन में इंसान अपना विकाश निश्चित कर रहा है। शहरी क्षेत्रों में रह रहे लोगों में अधिकतर का अपने भविष्य को लेकर एक ताना-बाना बना होता है। गांव से जुड़ी जमीन होने पर जो शहर आकर रहने लगे, उन्होंने अपने स्वयं के विकास की इबारत लिखने में कामयाबी पाई है। और जो गांव में रहकर भविष्य बनाने के लिए रुके वो आभाव या किन्हीं कारणों के चलते पिछड़ते चले गए। अगर एक अंदाजा लगाएं तो गांव में रहकर विकाश का प्रतिशत कम ही देखा गया है। सरकार बदले परिवेश का गहन सर्वे कराए और सभी गांव में रोजगार सृजन और विकास का खाका तैयार करे तब ही इन ग्रामीण अंचलों में रह रहे लोगों का उज्जवल भविष्य तय हो पायेगा।

                                                                                                                              - शैलेन्द्र राजपूत