कोरोना का नया चेहरा


जैसे-जैसे कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी कोविड-19 को लेकर हमारी जानकारी बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसका और ज्यादा वीभत्स चेहरा सामने आ रहा है। कोरोना संक्रमण का पहला घोषित मामला दर्ज हुए आठ महीने होने को हैं। तब से अब तक लगभग दो करोड़ 40 लाख लोग इससे संक्रमित हुए हैं और 820,000 के आसपास लोगों की इससे मौत हुई है। इन्हीं आंकड़ों के मुताबिक 1 करोड़ 53 लाख लोग ऐसे हैं जो कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक हो चुके हैं। मगर चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि जिन डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों को हम कोरोना से उबर चुका मान रहे हैं, उनमें एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है जो वास्तव में ठीक नहीं हुए हैं। 

कोरोना नेगेटिव पाए जाने के बाद उन्हें स्वस्थ करार देकर घर भेजा जा चुका है, लेकिन कोविड-19 से ही पैदा हुई कुछ भयानक परेशानियां आज भी उनकी जान का जोखिम बनी हुई हैं। इन लोगों की संख्या नजरअंदाज करने लायक नहीं है और इनकी बीमारियों का कोई आसान और पक्का इलाज भी नहीं है। उनके बारे में व्यवस्थित अध्ययन अभी होना बाकी है, लेकिन छिटपुट हुई स्टडीज के मुताबिक कोरोना नेगेटिव हो चुके इन लोगों में आधे से लेकर तीन चौथाई तक को सांस लेने में गंभीर दिक्कत, किसी तरह की हार्ट प्रॉब्लम, अत्यधिक थकान व कमजोरी और इम्यून सिस्टम की गड़बड़ियों में से किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। 

इम्यून सिस्टम की गड़बड़ियां लिवर, किडनी या किसी और बुनियादी महत्व के अंग में सूजन, जलन या इन्फेक्शन के रूप में भी जाहिर होती हैं। कोरोना मुक्त घोषित होने के तीन-चार महीने बाद तक ये शिकायतें पाई गई हैं। जाहिर है, कोरोना को लेकर हमारी समझ और उसके इलाज के तरीके में बड़े बदलाव की जरूरत है। इस बात को लेकर कोविड संक्रमण के बाद स्वस्थ करार दिए गए ऐसे लोगों का एक प्रतिनिधिममंडल पिछले दिनों डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल डॉ. एडनॉम जी टेड्रॉस से मिला। उनका कहना था कि उनकी समस्याओं को खारिज करने के बजाय उन्हें स्वीकार किया जाए, उन्हें सामान्य जिंदगी में वापस लौटाने में मदद की जाए और इन समस्याओं के समाधान के लिए शोध किया जाए। 

डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने न केवल तीनों बिंदुओं पर उनसे सहमति जताई बल्कि सारे देशों के साथ मिलकर इस दिशा में काम करने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की। दिक्कत यह है कि डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों को राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर ग्रहण करने में फासले रह जाते हैं और जब-तब इनका खुला विरोध भी देखने को मिलता है। आर्थिक बदहाली को देखते हुए सरकारें कोरोना के मामले में अपनी स्थिति जल्द से जल्द बेहतर दिखाने को लेकर बेकरार हैं। लेकिन इस दिशा में सही अर्थों में आगे बढ़ना हमारे लिए तभी संभव होगा, जब हम बीमारी को लगातार खुली आंखों देखें और उसके किसी भी पहलू को नजरअंदाज न करें।