कहो तो कह दूँ…
सचमुच 'मुसाफिर' बन गए हैं प्रदेश के IAS और IPS अफसर  

सत्तर के दशक में एक बड़ी प्यारी फिल्म आई थी 'परिचय' जया भादुड़ी और जीतेन्द्र अभिनीत इस फिल्म के निर्देशक थे 'गुलजार'l फिल्म का एक गीत बड़ा मकबूल हुआ था 'मुसाफिर हूँ यारो, न घर है न ठिकाना, मुझे  चलते जाना है बस चलते जाना' l लगता है ये गाना  प्रदेश के सारे आईएएस और आईपीएस अफसर मिल कर पिछले डेढ़ दो साल से  गाये पड़े हैं, और क्यों न गायें, चाहे सरकार कमलनाथ की रही हो या फिर अब अपने मामाजी  की, दोनों ही सरकारों ने इन तमाम अफसरों को 'मुसाफिर' ही बना कर रखा दिया है l पहले वाले मुख्यमंत्री अपने पूरे पंद्रह महीने के कार्यकाल में अफसरों का तबादला करते रहे, जैसे तैसे उनकी सरकार गयी और मामाजी गद्दी पर बैठे अफसरों को लगा कि अब ये सिलसिला शायद रुक जाए, पर मामाजी उनसे भी बढ़कर निकले, आते ही से जो तबादले शुरू किये तो वे आज तक  लगातार चालू हैंl 

अपने को तो ये मालूम था कि  'कलेक्टर' और 'एसपी' अपने जिले के राजा होते है रात दिन कड़ी मेहनत के बाद पचास हजार में से एक लड़का आईएएस और आईपीएस में सेलेक्ट होता है चौबीस में से  बीस  घंटे पढ़ता है तब कंही जाकर आईएएस और आईपीएस बन पाता है, लेकिन अब समझ में आया कि राजनेताओं के सामने इनकी कोई बखत नहीं है अंगूठा छाप और कम  पढ़े लिखे  इन पर राज कर रहे हैं और ये बेचारे उनको 'सेल्यूट' मारने के लिए मजबूर हैं अपने को तो ये भी मालूम था कि सरकारें मई जून में तबादले  करती थी  ताकि अफसर अपने बाल बच्चो का एडमीशनं नई जगह जाकर  दूसरे  स्कूलों में करवा सकें लेकिन अपने प्रदेश की सरकारों का जो कैलेंडर है उसमें बारह महीने ही मई जून है  अब तो ये लगने लगा हैं  कि सुबह सुबह  जैसे ही 'मुर्गा बांग' देता है मुख्यमंत्री  और मंत्री तबादलों की लिस्ट लेकर बैठ  जाते हैं, शतरंज  की  तर्ज पर  इस प्यादे को उधर  और उस प्यादे  को इधर करते रहते हैं l 

मजे की बात तो ये है कि सुबह एक अफसर का तबादला होता हैं दोपहर  को केंसिल हो जाता है और शाम होते होते फिर एक नया आदेश तीसरी जगह का निकल जाता हैl अफसरों के हाल ये हो गये हैं कि जैसे ही चेंबर का दरवाजा खुलता है और चपरासी अंदर आता है उनके 'दिल की धड़कनें' एक दम से बढ़  जाती है 'बीपी हाई' हो जाता है की कंही ये ट्रांसफर आर्डर लेकर तो नहीं आ गया, शाम को जब घर  पंहुचते हैं तो बच्चे भी पूछते है पापा अभी आप कंहा है सुबह जंहा थे वंही हैं कि ट्रांसफर हो गया, और उनका उत्तर होता है आज शाम तक को उसी सीट पर था कल का पता नहीं  कंहा जाना पड़ जाए l असल में  अब सरकारों को तबादलों का ये खेल पसंद सा आ गया है, मजा आने लगा हैl

कलेक्टर, कमिश्नर,  एसपी, डीआइजी, आईजी के हाल ये हो गए हैं कि  एक सड़ा सा कार्यकर्ता कह देता है की ये 'कलेक्टर' अपने को पसंद नहीं है इसकी 'हेयर स्टाइल' विपक्ष के नेता जैसी  है तो तत्काल से पेश्तर  उसका ट्रांसफर आर्डर आ जाता है, कोई कह देता है की इस एसपी ने अपने कार्यकर्ता को दो मिनिट का इन्तजार करवाने के बाद बाद अपने चेंबर में बुलाया तो उसका तबादला का आदेश आ जाताहैl फ़टियल से फ़टियल नेता जब चाहे कलेक्टर एसपी को डोज दे देता है और वे बेचारे ट्रांसफर के डर से चुपचाप उसकी बातें सुन लेते हैं, अब तो हाल ये हो गया है कि हर आईएएस और आईपीएस  ने अपना बोरिया बिस्तर अपनी कार में  ही लगा लिया है कि पता नहीं कब कंहा का ऑर्डर निकल आये, बाल बच्चो को भी सरकारी बंगले से एक किराये के मकान में शिफ्ट कर दिया है न जाने कब उस बंगले में कोई दूसरा अफसर आ जाए l 

एक कहावत हैं न 'गरीब की लुगाई गांव भर की भौजाई' इनके हाल भी 'गरीब की लुगाई'  जैसे हो गए हैं पूरे प्रदेश में 'चकरघिन्नी' जैसे घूम रहे हैं लेकिन स्थायी ठिकाना नहीं मिल पा रहा हैं l  अपना सोचना तो ये है कि अब जो भी लड़के लडकियां आईएएस और आईपीएस बनने का सपना देख रहे  हों वे अपने इस सपने को देखना छोड़ दें, पढ़ाई  लिखाई छोड़कर गली मोहल्ले में नेता गिरी शुरू कर दे कुछ साल उनकी औकात इतनी तो हो ही जाएगी कि वे किसी एसपी  और कलेक्टर का तबादला करवा सकें l    

                                                                                                             चैतन्य भट्ट

(Note : इस एडिटोरियल के लेखक चैतन्य भट्ट हैं और उपरोक्त लेख उनके निजी विचार हैं )