ये कैसा सिलसिला है चल पड़ा…
पत्रकारों के खिलाफ न जाँच न मौका मुआयना सीधे FIR !

कुछ दिन पूर्व भितरवार के एक पत्रकार मित्र के खिलाफ एफआईआर की गई उसके बाद कल डबरा में तीन पत्रकार साथियों के साथ एक राजनीतिक रसूख वाले व्यापारी की शिकायत पर एफआईआर की गई उसके बाद कुछ ग्रुपों पर डबरा वाले पत्रकारों के विषय में बिना जाने बिना सोचे समझे अपने ही कुछ बड़े खबरिया चैनलों के वरिष्ठ साथी पत्रकारों द्वारा अपमानजनक टिप्पणियाँ की गईं यहाँ तक कि उन्हें बिना सबूत ही दोषी ठहरा दिया गया वहीं जब हमारे एक जागरूक और सत्य की खोज करने वाले पत्रकार साथी ने संबंधित थाना प्रभारी से एफआईआर के विषय में बात की तो उक्त टीआई का कहना था कि पत्रकारों के खिलाफ अभी कोई भी सबूत नहीं है हमने शिकायतकर्ता व्यापारी को सबूत लाने को कहा है यहाँ एक सवाल पुलिस पर भी है कि सबूत होने बावजूद किसीको गिरफ्तार न करने वाली पुलिस ने बिना सबूत तीन पत्रकारों के विरुद्ध एफआईआर कर दी चलिए कोई बात नहीं पुलिस की कार्यवाही समझ में आती है कि वे हमारे अपने नहीं हैं लेकिन हमारी ही कौम यानि पत्रकारिता जगत से जुड़े लोग अपने ही पेशे से जुड़े लोगों को बिना जाने उन्हें गुनहगारों की श्रेणी में डाल दें और छोटे कस्बे और तहसील स्तर के संवाददाताओं को सीधे अपराधी सिद्ध करने में लग जाएँ ये कहाँ तक सही है...? मैं उन समाचार पत्र और चैनलों के पत्रकार मित्रों से कहना चाहता हूँ कि समय सदा एक सा नहीं रहता और कोई भी संस्थान हमेशा आपका साथ नहीं देता कब तक आप अपने से छोटे लोगों का मजाक बनाएँगे हाँ ये हो सकता है कि वो आपकी नजर में पत्रकारिता के लायक न हों लेकिन कहीं न कहीं वे संघर्ष तो कर ही रहे हैं कुछ दिन पूर्व की ही बात लेलें जब हम जैसे छोटे संवाददाता और रोज भरी धूप में फील्ड में काम करने वाले पत्रकार एक बुजुर्ग और वरिष्ठ पत्रकार के लिए रात डेढ़ बजे भी धरना दे रहे थे जबकि हमें किसी ने नहीं कहा था हमें पता चला हम स्वप्रेरणा से उनके लिए खड़े हुए जबकि हममें से कुछ उनसे कभी मिले भी नहीं थे बस नाम सुना था उसके बाद हमारे वरिष्ठ साथी भी उठ खड़े हुए और उन्हैं न्याय मिला लेकिन छोटे कस्बे और तहसील के पत्रकार हमेशा बेईमान नहीं होते ये आपको समझना होगा।