कोरोना की वजह से प्रकृति को मिला पुनर्निर्माण का अवसर !


बहुत दिन हो गए वही भागदौड़ , वही दिनचर्या और वही समस्याएं, आओ चलो कुछ दिन परिवार के साथ किसी हिल स्टेशन पर छुट्टियां बिता कर आते हैं। मन भी बहल जाएगा और तबियत भी ठीक लगने लगेगी। ऐसा हम अक्सर लोगों को कहते और करते देखते हैं, और देखते हैं अक्सर लोग ऐसी जगह जाना पसंद करते हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य भरपूर हो। जहां हम ताज़गी महसूस कर सकें और अपने आपको तरो ताज़ा कर सकें। और हम अपनी सारी मानसिक और शारीरिक थकान वहां छोड़ के वापस आ जाते हैं। पर प्रकृति अपनी थकान उतारने कहाँ जाए? सोचा है कभी?

जी नहीं मानवजाती  कभी नहीं सोचती की हम जहां सुकून महसूस करते है वहां गंदगी न फैलाये, ज़रूरत से ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट न करें, वृक्ष न काटे, ज़रूरत से ज्यादा वाहन का उपयोग न करें ताकि प्रदूषण न बढ़े , जल और हवा के प्रदूषण को न बढनें दें और सबसे बड़ी बात अन्न बर्बाद न करें। पर जब मनुष्य को सब आसानी से मिलता रहता है, तो अक्सर उसे उसकी अहमियत का अंदाज़ा नही रहता। पर असल कद्र तब होती है, जब यही सुख सुविधाएं मिलना कम या बंद हो जाती हैं।

यही हुआ है इस महामारी के दौर में। बहुत कुछ बुरा तो हुआ है पर बहुत कुछ अच्छा भी हुआ है इस दौर में।
जैसे, जो लोग होटल में खाना खाने के आदि थे अब वो लोग घर का बना खाना खा कर अपने पाचन तंत्र की परेशानियों में आराम महसूस कर रहे हैं। मेडिकल के अनावश्यक खर्च में गिरावट आई है, जहां हस्पतालों में हर प्रकार के विशेषज्ञों के पास कतारें लगी होती थीं, आज लोग घर पर आराम से हैं। युवा पीढी में बढती हुई नशे की लत को छोड़ने की मजबूरियां देखने को मिली हैं। मृत्युभोज पर हुआ अनावश्यक खर्च बन्द ।

लाखों रुपयों की आडंबरों ओर दिखावों के साथ कि जाने वाली शादियां हुई सिर्फ हजारों में, इससे पैसे और अन्न की बर्बादी रुक गई। इंसानों की असलियत, शिक्षा, सम्वेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण अलग अलग रूपों में देखने को मिला।

पारिवारिक मूल्यों में देखने को मिली वृद्धि, घरवालों के साथ अच्छा और उत्कृष्ट समय बिताने का पूरा समय मिला जो पहले व्यस्तताओं के कारण सम्भव नहीं था। और परिवार में एक दूसरे के कार्य क्षेत्र को देख और समझ कर बढ़ा आपसी सम्मान। अब लोग पत्नियों से नहीं कहेंगे तुम घर में सारा दिन करती क्या हो और पतियों से कोई नही कहेगा दिन भर दफ्तर में आराम से बैठ कर आते हो।

बड़े बुजुर्गों के साथ बच्चों में पड़े संस्कार जो माता पिता के समयाभाव के कारण कहीं न कहीं नज़रअंदाज़ हो रहे थे। बच्चे ज़िम्मेदार हुए घर के कामों में भागीदार बने। बड़े बड़े पैसे वाले लोगों को पता चल गया है कि इंसानों को अतिआवश्यक व रोजमर्रा के लिए क्या क्या सामग्री जरूरी होती है। फालतू के खर्चो पर अंकुश लगाने में कारगर सिद्ध हुआ ये लोकडाउन। धैर्य, आपसी तालमेल,संतोषपूर्वक जिंदगी जीने के लिये प्रेरणा देने वाला सिद्ध हुआ ये दौर, लोगों को समझ आया कि जिंदगी में पैसों के पीछे भागने के अलावा भी बहुत कुछ है। सीमित संसाधनों में जीवन यापन सीख रही है आज की युवा पीढ़ी। यह सारे फायदे तो मानव जाति को मिले। इसके साथ ही प्रकृति भी एक बड़े अंतराल के बाद चैन की सांस ले रही है।

प्रकृति का वातावरण और शुद्धता के लिये कारगार सिद्ध हुआ यह लोकडाउन। जहां सेटेलाइट से खींची तस्वीरों में पृथ्वी पर हर जगह सिर्फ प्रदूषण और डस्ट की परत दिखाई पड़ती थी, वही आज साफ तस्वीरें आ रही हैं, नदियों का पानी प्रदूषित था, आज गंगा पिछले कई दशकों में पहली बार साफ और स्वच्छ नज़र आ रही है, पहाड़ी इलाकों में कुछ ऐसे फूल खिलते दिख रहे हैं जो विलुप्त होने की कगार पर थे। अप्रैल की समाप्ति तक चिलचिलाती धूप हो जाया करती थी, सुबह और शाम गर्म होती थीं, वही इस बार तापमान इतना नही बढ़ पाया और सुबह और शामें गर्म ना होकर खुशनुमा हैं। 

यूं लग रहा है जैसे प्रकृति को भी छुट्टियां मिल गयी हो खुद को तरो ताज़ा करने की।अनायास ही सही उसे खुद का पुनर्निमाण करने का मौका मिला हो जैसे। पर क्या यह महसूस नहीं होता कि अगर मानव जाति नहीं संभली और इसी तरह प्रकृति का बिना सोचे नाश करती रहेगी, तो प्रकृति भी कुछ अलग अलग बहानों  से स्वयं के पुनरुत्थान के लिये ऐसे अवकाश लेने लगेगी। पूरे विश्व की ऐसी भयावह दुर्दशा देखकर भी अगर हमने सीख नहीं ली और प्रकृति के नियमों का पालन नहीं किया तो मानव जाति को और भी बुरे परिणामों के लिए सज्ज रहना पड़ेगा।

आइये आप और हम मिलकर ये प्रण करें कि हमारे पूर्वज जो आचार, विचार, आहार और  व्यवहार इस प्रकृति के लिए अपनाएं हुए थे उन पर खुद अमल करके न सिर्फ कोरोना महामारी से लड़ें अपितु पूरे विश्व स्वास्थ्य संदर्भ में विश्व गुरु बनें। आज पूरे विश्व में जनमानस, भारतीय रीतियों  और परम्पराओं को सुखद जीवन के लिए महत्वपूर्ण जानकर अपने जीवनचर्या में शामिल कर रहे हैं, और हम भारतीय होकर भी इन्हें नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। यह संकट ईश्वर और प्रकृति का एक स्पष्ट संकेत है, संभल जाने के लिए। क्योंकि स्वास्थ और संतोष सबसे बड़ा सुख है, और जब जब हम आसक्ति की ओर बढ़ेंगे, मानवजाति के विनाश को आमंत्रण देंगे।

                                                                                                   - Monika Jain