शिक्षा के आभाव में आपदा की मार झेलता मज़दूर 

ये मजदूर कोई और नहीं बल्कि वे ही लोग हैं जिनके लिए स्वयं बाबा साहेब अंबेडकर की आंखों से आंसू टपक पड़े थे और इसके लिए उन्होंने आगरा की सभा में कहा था कि मुझे मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है। अब सोचने वाली बात यह है कि मजदूरों के मामले में पढ़े लिखे लोगों का क्या रोल है तथा समाज के पढ़े लिखे लोगों ने बाबा साहेब अंबेडकर को धोखा कैसे दिया ? वैसे मजदूर होना कोई गुनाह नहीं है तकरीबन सभी देशों में कम ज्यादा मजदूर पाये जाते हैं क्योंकि सभी लोग सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी नहीं बन सकते हैं लेकिन भारत में मजदूर होना गुनाह जैसा ही है कारण की यहाँ मजदूर योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि जातियों के आधार पर बनते हैं, जो कि ऐसा नहीं होना चाहिए,यदि सर्वे किया जाये कि पटरियों पर चलने वाले लोग किस समाज से हैं तो  99 .99 प्रतिशत मजदूर वाह आरक्षित वर्ग  के मिलेंगे।

बाबा साहेब अंबेडकर के समय भी भारत में मजदूरों की हालत काफी दयनीय स्थिति में थी वे इनकी हालत देखकर बहुत दुखी हो जाते थे और कहने लगते थे कि तुम्हारी ऐसी दशा मेरे से देखी नहीं जाती है तुम लोग इतना जलील भरा जीवन पता नहीं कैसे जी रहे हो। लेकिन जिस मिशन को लेकर बाबा साहेब अंबेडकर काम कर रहे थे उससे उन्हें विश्वास था कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि मेरे समाज के पढ़े लिखे लोग सरकारी कर्मचारी और अधिकारी बनेंगे तब हर महीने तनख्वाह पाएंगे अतः वे अपनी आमदनी का कुछ भाग अपने इन मजदूर भाइयों के विकास पर खर्च करेंगे एवं अपने बच्चों के साथ साथ इन मजदूरों के बच्चों की शिक्षा पर भी जरूर ध्यान देंगे।

26 जनवरी 1950 को बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा लिखित सविंधान भारत में लागू होने के बाद उनकी सोच के अनुसार वह दिन भी आया कि मजदूर वर्ग के हजारों पढ़े लिखे लोग आरक्षण की बदौलत लाखों कर्मचारी और अधिकारी सरकारी पदों पर पहुंचे, लेकिन दुःख की बात यह है कि उन लोगों ने अपने मजदूर भाइयों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसकी कल्पना बाबा साहेब ने की थी । ये सब देखकर ही बाबा साहेब अंबेडकर को दुखी मन से कहना पड़ा था कि मुझे मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगों ने धोखा देने का काम किया है।

अब विचार करने वाली बात यह है कि क्या अब तो पढ़े लिखे लोग बाबा साहेब अंबेडकर को धोखा नहीं दे रहे हैं ?
इस सवाल का जवाब तो पढ़े लिखे लोगों द्वारा स्वयं ही देना चाहिए कि वे वे बाबा साहेब अंबेडकर की सोच के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं,लेकिन मजदूरों की हालत देखकर तो ऐसा लगता है कि उनके लिए अभी तक किसी ने कुछ भी नहीं किया है। पटरियों पर चलना आसान काम  नहीं है बल्कि बहुत टेढ़ा काम है यह वही बता सकता है जो पटरियों पर चला हुआ है, खाली हाथ एक किलोमीटर दूर तक पटरियों पर चलना मुश्किल हो जाता है जबकि वे लोग तो अपना पूरा जरूरी सामान सिर पर लादकर यहां तक की बच्चों को गोद में लेकर सैंकड़ो किलोमीटर चले जा रहे हैं, गर्भवति महिलाओं को कितनी सावधानी बरतने की जरूरत होती है लेकिन वे भी भूखी प्यासी उन्हीं पटरियों पर चली जा रही हैं ये सब मन को दुखी करने वाली  घटना नहीं हैं तो फिर क्या हैं।

एक तो यह लोग भूखे प्यासे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने से परेशान हैं ऊपर से महिलाओं के सामने ही पुलिस द्वारा जगह जगह इन्हें लाठी डंडे से पीटा जा रहा  है जबकि  दूसरी तरफ पैसे वाले लोगों को हवाई जहाज द्वारा विदेशों से लाया जा रहा है और कोटा व अन्य शहरों से भी वीडियो कोच बसों द्वारा सम्मान के साथ उनके घर पहुंचाया जा रहा है यह सब भेदभाव नहीं है तो फिर क्या है। इन मजदूरों की आवाज कोई सुनने को तैयार  नहीं  है बल्कि अब तो श्रमिक कानूनों को खत्म कर इन्हें बंधुआ मजदूर बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है यहां तक की बाबा साहेब ने काम करने का समय 8 घण्टे करने का कानून बनाया था उसे भी बदलकर 12 घण्टे कर दिया गया है।

अब गम्भीरता से सोचने वाली बात यह है कि समस्या का रोना कब तक रोते रहेंगे हमें यह जानना है कि इसका समाधान क्या है ?
इसका समाधान सब जानते हैं जानबूझकर अंजान बनने से कुछ नहीं होगा क्योंकि इसका समाधान स्वयं बाबा साहेब अंबेडकर लिखकर गये हैं कि समाज को शिक्षित करो संगठित करो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो व राजसत्ता की चाबी अपने हाथ मे लो। शिक्षा के बिना कुछ भी नहीं होगा इसलिए सभी लोग सबसे पहले समाज को शिक्षित करने का अभियान शुरू करने के लिए मोहल्लों व गाँवों की ओर निकलें।