इतना बड़ा रेल नेटवर्क होने के बाद भी…

लॉकडाउन में अजीब सिलसिला चलाया सरकारों ने...


हजारों रेल गाड़ियां यार्ड में खड़ी धुल खा रही हैं लेकिन मज़दूरों और विद्यार्थियों को लाने-लेजाने के लिए लक्ज़री बसों का कर रही है इस्तेमाल इन सरकारों से पूछा जाये की क्या यह पैसे की बर्बादी नहीं है। कोई स्टेट अपने मज़दूरों और विद्यार्थियों को लाने के लिए १५० बस भेज रहा है तो कोई २०० बस भेज रहा है।

लाखों मज़दूर व विद्यार्थी इधर-उधर फंसे हुए हैं तो सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है की कितनी प्राइवेट बसें इसमें लगने वाली हैं और इन बसों पर जो खर्च सरकारों द्वारा किया जा रहा है वह सरकारी खजाने से ही हो रहा है जो की जनता की खून पसीने की कमाई का है और यह पैसा सर्कार को टैक्स के रूप में जनता से मिलता है।

अतः मेरी देश के पीएम से विशेष अपील व अनुरोध है की बसों की वजाय इन विद्यार्थियों व मज़दूरों को लाने ले जाने के लिए आरपीएफ की देख रेख में कुछ विशेष रेलगाड़ियां सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए चलाई जाएं जिससे राज्यसरकारों पर पड़ने वाले अतिरिक्त आर्थिक दबाव को भी रोका जा सकता है।

ये राज्य सरकारें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन मज़दूरों और विद्यार्थियों को लाने के लिए आग्रह कर सकते हैं। और राज्यसरकारों के पास यह जो पैसा बचेगा उसे राज्यसरकारों द्वारा पलायन की मार झेलने वाले मज़दूरों के हिट में खर्च किया जा सकेगा।

रेल व्यवस्था का उपयोग मज़दूरों विद्यार्थियों को गंतव्य स्थान तक पहुंचने के लिए एक बेहतरीन पहल होगी बशर्ते इन गाड़ियों में आरपीएफ और रेल प्रबंधन मज़दूरों और विद्यार्थियों को ही चढ़ने दे।