जिस देश का पानी अमृत के समान हैं उस देश मैं कोरोना क्या बिगाड़ सकता है...
गंगा जल खराब कभी खराब नहीं होता है !

हमारे देश में गोमुख से लाए गए गंगाजल कि मैं तोता अमृत से भी बढ़कर मानी गई है। यह एक मिथक नहीं है हमारे यहां मरते हुए व्यक्ति के मुंह में भी गंगाजल यह सोच कर डाला जाता है कि ऐसा करने से मरने वाले को मोक्ष प्राप्त होगा। भारत में तो तमाम ऐसी मान्यताएं वाक्य दंतिया है कि कई रोगों का भी इलाज भी गंगाजल से संभव है। हम इसे गंगाजल का चमत्कार नहीं मानते, बल्कि उस में पाए जाने वाले उसके औषधीय गुणों का प्रमाण मानते हैं। 

कुछ इतिहासकारों ने भी लिखा कि सम्राट अकबर स्वयं तो गंगा जल का सेवन करते ही थे, मेहमानों को भी गंगा जल पिलाते थे। इतिहासकार तो यह भी लिखते हैं कि अंग्रेज जब कलकत्ता से वापस इंग्लैंड जाते थे, तो पीने के लिए जहाज में गंगा का पानी ले जाते थे, क्योंकि गंगाजल में कीड़े नहीं पड़ते वह खराब नहीं होता हथा। अंग्रेज जो पानी अपने देश से लाते थे वह रास्ते में ही खराब होकर उस में कीड़े पड़ जाते थे। गंगाजल की इस विशेषता के बारे में तमाम सारी शोध किए जाते रहे हैं। और अभी भी किए जा रहे हैं एवं वैज्ञानिकों द्वारा यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि आखिरकार इसके पानी की ऐसी क्या विशेषता है जिससे कि इसमें कीड़े नहीं पड़ते हैं यह कभी खराब क्यों नहीं होता है।

दिलचस्प ये है इसमें वैज्ञानिक पाते हैं कि गंगाजल में बैक्टीरिया को मारने की क्षमता है। लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट एनबीआरआई के निदेशक डॉक्टर चंद्र शेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है। डॉ नौटियाल का इस विषय में कहना है कि गंगा जल में यह शक्ति गंगोत्री और हिमालय से आती है। गंगा जब हिमालय से आती है तो कई तरह की मिट्टी, कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियों से मिलती मिलाती है। कुल मिलाकर कुछ ऐसा मिश्रण बनता जिसे हम अभी नहीं समझ पाए हैं।

डॉक्टर नौटियाल ने परीक्षण के लिए तीन तरह का गंगा जल लिया था। उन्होंने तीनों तरह के गंगा जल में ई-कोलाई बैक्टीरिया डाला। नौटियाल ने पाया कि ताजे गंगा पानी में बैक्टीरिया तीन दिन जीवित रहा, आठ दिन पुराने पानी में एक एक हफ्ते और सोलह साल पुराने पानी में 15 दिन। यानी तीनों तरह के गंगा जल में ई कोलाई बैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाया।वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफाज वायरस होते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया की तादाद बढ़ते ही सक्रिय होते हैं और बैक्टीरिया को मारने के बाद फिर अदृश्य हो जाते हैं।

मगर सबसे महत्वपूर्ण सवाल इस बात की पहचान करना है कि गंगा के पानी में रोगाणुओं को मारने की यह अद्भुत क्षमता कहाँ से आती है? दूसरी ओर एक लंबे अरसे से गंगा पर शोध करने वाले आईआईटी रुड़की में पर्यावरण विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफेसर देवेंद्र स्वरुप भार्गव का कहना है कि गंगा को साफ रखने वाला यह तत्व गंगा की तलहटी में ही सब जगह मौजूद है। डाक्टर भार्गव कहते हैं कि गंगा के पानी में वातावरण से आक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। भार्गव का कहना है कि दूसरी नदियों के मुकाबले गंगा में सड़ने वाली गंदगी को हजम करने की क्षमता 15 से 20 गुना ज्यादा है।

जागरूक व विवेकशील भारत के लोगों का  मानना है कि गंगाजल अमृत के समान है इसलिए उसमें मुर्दे, या शव की राख और अस्थियां विसर्जित नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मोक्ष कर्मो के आधार पर मिलता है। भगवान इतना अन्यायकारी नहीं हो सकता कि किसी लालच या कर्मकांड से कोई गुनाह माफ कर देगा। अतः मेरा मानना है कि जिस देश का साधारण सा पानी जिसमें आमर्त्य औषधिय गुण हो जिस देश की आबोहवा में देश की सौंधी मिट्टी की महक आती है। उस देश के वासियों का चीन से आया कोरोना जैसा वायरस क्या बिगाड़ सकता है। लेकिन थोड़ी सी सावधानी और सोशल डिस्टेंस के साथ जीवन जीने की कला जिसे आती है उसका कोरोना भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

                                                                                                          Divya Singh Yadav