खेलकूंद या सामाजिक गतिविधियों में...

मूकबधिर बच्चों को अंकुश संगीत की शिक्षा देकर बना रहे हैं आत्मनिर्भर



ग्वालियर 1 दृष्टिबाधित, मूकबधिर एवं अस्थिबाधित जैसी बीमारियों से ग्रसित लोगों को सामान्य लोग हेयदृष्टि से देखते हैं। उनके साथ शिक्षा, खेलकूंद या सामाजिक गतिविधियों में भेदभाव करने लगते हैं। जिसके कारण इन बीमारियों से पीडित व्यक्ति हीन भावना से ग्रसित हो जाता हैं और स्वयं को समाज पर बोझ समझने लगता है। इन सभी मिथ्याओं को तोडते हुए शहर के एक युवा अंकुश गुप्ता जो कि दिन रात मूकबधिर बच्चों की सेवा में लगे रहते हैं।

दिव्यदृष्टि संस्था के सदस्य सर्वप्रथम दिव्यांग बच्चो को खोजने का कार्य करते हैं। उसके पश्चात संबंधित बच्चे के परिवार की निशुल्क कॉउंसलिंग करने का कार्य करने के बाद उस दिव्यांग बालक को संस्था में लाया जाता है, और बच्चे की दिव्यांगता के आधार पर उसे शिक्षा दी जाती है। जैसे अगर बच्चा मूकबधिर है तो उसको सांकेतिक भाषा में, अगर बालक दृष्टिबाधित है तो उसे ब्रेल लिपि के आधार पर शिक्षा दी जाती है।

बालक की उम्र 5 साल या उससे अधिक हो जाती है तो बालक को उम्र के आधार पर उसे सामान्य स्कूल में पढ़ाया जाता है। जिसका मुख्य उद्देश्य सामान्य बालकों को समावेशी शिक्षा से जोड़ना है। समावेशी शिक्षा से बच्चो को जोड़ना बहुत अवश्यक माना जाता है जिस से दिव्यांग बच्चे खुद अपने आप को बहुत मजबूत बना सके।

दिव्यदृष्टि संस्था द्वारा दिव्यांग बच्चो को शास्त्रीय संगीत के साथ साथ वेस्टर्न म्यूजिक से भी जोड़ा जा रहा है जो कि समय को देखते हुए बहुत आवश्यक है संस्था के बच्चे ड्रम, कैसिओ, गिटार आदि वेस्टर्न म्यूजिक के यंत्रो को बजाने में पूर्ण सक्षम है जो उनके रोजगार का भी मुख्य साधन है।

संस्था के दृष्टिबाधित बच्चे तकनीकी यंत्र जैसे मोबाइल, लेपटोप, टीवी आदि उपकरणों का उपयोग बहुत ही आसानी से कर लेते है। संस्था द्वारा एसे यंत्रो को चलाने के लिए स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। संस्था के द्वारा एक डिजिटल लाइब्रेरी का भी निर्माण किया गया है।

अकुंश गुप्ता ने इंदौर से साइन लैंग्वेज की शिक्षा ग्रहण की है। इसके बाद उन्होने दृष्टिबाधित बच्चों के लिए स्पेशल बीएड पढाई की है। अंकुश ने बताया हाॅस्टल में रह रहे बच्चों का खर्चा डॉक्टर्स और सामाजिक लोगों के साथ ही दृष्टिबाधित एवं मूकबधिर बच्चों द्वारा मंदिरो और सामाजिक आयोजनों में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुती देकर जो आय होती है उससे भी हॉस्टल और बच्चों का खर्चा चलता है। अंकुश का कहना है कि बच्चे आत्मनिर्भर बनकर सम्मान के साथ यहां से जायें और समाज में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवायें।