G News 24 : ‘भारत में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा’: RSS प्रमुख मोहन भागवत

  देश में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिश लेकिन फिर भी ...

 ‘भारत में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा’: RSS प्रमुख मोहन भागवत 

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत में भी बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिश हो रही है। दुनिया में ऐसी शक्तियां हैं, जो भारत को दबाना चाहती हैं। उनका मकसद सत्ता परिवर्तन कर हालात सुधारना नहीं, बल्कि अपने पिट्ठू बैठाना है।

देश में हाल के दिनों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि "भारत को कमजोर करने" की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इन कोशिशों को "कुछ ऐसे तत्वों का समर्थन मिल रहा है, जो अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं।"

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों, लोकतांत्रिक आंदोलनों और भारत के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर अपनी बात रखी। स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में भी बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, दुनिया में ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, जो भारत को दबाना चाहती हैं और देश की व्यवस्था को प्रभावित करने का प्रयास कर रही हैं।

मोहन भागवत ने विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ शक्तियां व्यवस्था में सुधार लाने के बजाय सत्ता परिवर्तन करके अपने समर्थकों को सत्ता में बैठाना चाहती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ महत्वाकांक्षी नेता ऐसी ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य देश को कमजोर करना है। हालांकि, ये आरोप भागवत के अपने राजनीतिक आकलन और विचार हैं।

भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिश का आरोप

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि भारत को कमजोर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने फ्रांस, नेपाल और बांग्लादेश की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया के कुछ हिस्सों में सत्ता परिवर्तन को समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन केवल सरकार बदलने से हालात बेहतर होने की गारंटी नहीं होती।

उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। उनके मुताबिक, कुछ लोग सत्ता परिवर्तन के नाम पर राजनीतिक माहौल को प्रभावित करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि सत्ता में अपने पसंदीदा लोगों को बैठाना है।

संघ प्रमुख के बयान का मुख्य संदेश यह था कि देश की समस्याओं का समाधान केवल राजनीतिक सत्ता बदलने से नहीं निकलेगा। इसके लिए समाज की सक्रियता, मजबूत नेतृत्व और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे ऐसी परिस्थितियों में संयम बनाए रखें और किसी भी तरह की उत्तेजना में आने से बचें।

‘सत्ता परिवर्तन से हालात बदलने की गारंटी नहीं’

भागवत ने अपने संबोधन में सत्ता परिवर्तन की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि दुनिया के कई देशों में सरकार बदलने को बड़े बदलाव के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने फ्रांस, नेपाल और बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के घटनाक्रम से यह समझने की जरूरत है कि सत्ता परिवर्तन अपने आप में किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत में भी कुछ लोग इसी तरह का माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके अनुसार, देश की व्यवस्था को बदलने के नाम पर कुछ शक्तियां राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहती हैं।भागवत ने कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत नेतृत्व और नई पीढ़ी के पुरुषार्थ के कारण अपनी स्थिति मजबूत की है। उनके विचार में, देश को कमजोर करने की कोशिश करने वाली ताकतों को भारत की प्रगति और आत्मविश्वास से चुनौती मिल रही है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि देश के नागरिकों को किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने के बजाय परिस्थितियों को समझना चाहिए। उनके मुताबिक, देश की मजबूती के लिए लगातार प्रयास करना आवश्यक है।

‘आंदोलन समाधान के लिए होने चाहिए, विभाजन के लिए नहीं’

मोहन भागवत ने लोकतांत्रिक आंदोलनों के उद्देश्य पर भी विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्याएं उत्पन्न होने पर आंदोलन होना स्वाभाविक है। नागरिकों और विभिन्न समूहों को अपनी मांगें उठाने तथा असहमति व्यक्त करने का अधिकार है।

हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए। यदि किसी आंदोलन के कारण समाज में विभाजन, द्वेष और आपसी टकराव बढ़ता है, तो उससे मूल समस्या का समाधान कठिन हो सकता है। उन्होंने कहा कि आंदोलन करने वाले किसी भी समूह को व्यापक समाज के हितों को ध्यान में रखना चाहिए। देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

भागवत के मुताबिक, आंदोलन तभी सार्थक माना जा सकता है, जब वह समाज को बेहतर दिशा देने और समस्याओं के समाधान में योगदान करे। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलनों के माध्यम से समस्याओं का स्थायी समाधान निकलने के उदाहरण सीमित दिखाई देते हैं। उनके इस बयान को लोकतांत्रिक आंदोलनों और राजनीतिक विरोध की भूमिका पर संघ प्रमुख की राय के रूप में देखा जा सकता है। लोकतंत्र में आंदोलन जहां नागरिकों की आवाज उठाने का माध्यम होते हैं, वहीं उनके प्रभाव और परिणाम को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर अलग-अलग विचार भी सामने आते रहे हैं।

विपक्ष पर आंदोलनों को राजनीतिक साधन बनाने का आरोप

संघ प्रमुख ने विपक्षी दलों पर आंदोलनों को गुमराह करने और उनका इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब कोई आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से हटकर किसी दूसरे लक्ष्य को हासिल करने का माध्यम बन जाता है, तो वह समाधान के बजाय विरोध और टकराव को बढ़ावा दे सकता है। भागवत ने कहा कि समाज को अलग-अलग वर्गों में बांटने, लोगों के बीच असंतोष पैदा करने और व्यवस्था के प्रति विरोध बढ़ाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं और आज भी जारी हैं।

उन्होंने कहा कि देश को केवल नेता नहीं चलाते, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समाज में जागरूकता, सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी के माध्यम से कई समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। उनके अनुसार, राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ आम नागरिकों की भूमिका भी देश की दिशा तय करने में अहम होती है। यदि समाज संगठित और जागरूक रहता है, तो बाहरी दबावों और आंतरिक चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

‘विश्व में भारत को दबाने वाली शक्तियां मौजूद’

मोहन भागवत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, जो भारत की स्वतंत्र पहचान और बढ़ते प्रभाव को सीमित करना चाहती हैं। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि देश को ऐसी परिस्थितियों में सतर्क रहने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि भारत को किसी भी प्रकार की उत्तेजना में आने के बजाय धैर्य और निरंतर प्रयास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके मुताबिक, देश के सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज में जागरूकता और मजबूत राष्ट्रीय भावना जरूरी है।

भागवत ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता उसकी महत्वपूर्ण ताकत हैं। उनके विचार में, यदि समाज अपनी एकजुटता बनाए रखता है और देश के विकास में योगदान देता है, तो देश को कमजोर करने के प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने स्वयंसेवकों से भी अपेक्षा जताई कि वे समाज में सक्रिय भूमिका निभाएं और देशहित से जुड़े विषयों पर जिम्मेदारी के साथ काम करें।

नई पीढ़ी और मजबूत नेतृत्व को बताया भारत की ताकत

अपने संबोधन में भागवत ने भारत की प्रगति का उल्लेख करते हुए मजबूत नेतृत्व और नई पीढ़ी के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में देश ने जिस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया है, उसमें नेतृत्व की भूमिका अहम रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की युवा पीढ़ी के प्रयासों और देश के सामूहिक पुरुषार्थ से ऐसी परिस्थितियां बनी हैं, जिनसे भारत को कमजोर करने की कोशिशों को चुनौती मिली है।

भागवत के अनुसार, भारत की प्रगति से कुछ शक्तियां असहज हो सकती हैं, लेकिन देश को अपनी विकास यात्रा जारी रखनी चाहिए। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।

विजयादशमी कार्यक्रम में एकता और सतत प्रयास का संदेश

नागपुर में विजयादशमी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मोहन भागवत का संबोधन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहा। उन्होंने सत्ता परिवर्तन की मांगों, लोकतांत्रिक आंदोलनों, अंतरराष्ट्रीय दबावों और सामाजिक एकता जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

उनके संबोधन में बार-बार यह बात सामने आई कि देश की समस्याओं का समाधान केवल राजनीतिक बदलाव में नहीं, बल्कि समाज की सक्रियता, आपसी सहयोग और निरंतर प्रयासों में भी निहित है। उन्होंने कहा कि आंदोलन किसी समस्या को हल करने के उद्देश्य से किए जाने चाहिए, न कि समाज में विभाजन और द्वेष बढ़ाने के लिए।भागवत ने भारत को कमजोर करने वाली शक्तियों के प्रति सतर्क रहने की बात कही और नागरिकों से संयम बनाए रखने का संदेश दिया।

कुल मिलाकर, संघ प्रमुख के इस संबोधन में राष्ट्रीय एकता, मजबूत नेतृत्व, सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक आंदोलनों के उद्देश्य पर जोर दिया गया। उनके बयान ने सत्ता परिवर्तन, विपक्ष की राजनीति और देश के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस को प्रमुखता दी है।

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