G News 24 : शिवपुरी जिले के नरवर के सरकारी स्कूल में शिक्षा का सौदा !

सरकारी स्कूल की 5 क्विंटल किताबें कबाड़ में बेचने निकले शिक्षक, ग्रामीणों ने किया हंगामा...

 शिवपुरी जिले के नरवर के सरकारी स्कूल में शिक्षा का सौदा ! 



मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के नरवर में सरकारी स्कूल की करीब 5 क्विंटल किताबें कबाड़ में बेचने का मामला सामने आया है. ग्रामीणों ने पुस्तकों से भरी गाड़ी रोककर हंगामा किया और शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाए. शिक्षक ने विभागीय अनुमति का दावा किया, लेकिन दस्तावेज नहीं दिखा सके.

सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन एमपी के शिवपुरी जिले के नरवर विकासखंड से सामने आए एक मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. टोरियाखुर्द के शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय से बड़ी मात्रा में किताबें कबाड़ में ले जाए जाने का मामला सामने आया है. ग्रामीणों ने एक लोडिंग वाहन को रोककर उसमें भरी किताबों की जांच की तो हंगामा खड़ा हो गया. आरोप है कि करीब 5 क्विंटल सरकारी किताबें कबाड़ी को बेचने के लिए ले जाई जा रही थीं.  

ग्रामीणों ने रास्ते में रोक ली किताबों से भरी गाड़ी

जानकारी के अनुसार, टोरियाखुर्द स्थित शासकीय विद्यालय से एक लोडिंग टैक्सी में बोरियों और बंडलों में बड़ी संख्या में किताबें भरी जा रही थीं. इसकी भनक लगते ही गांव के लोग मौके पर पहुंच गए. ग्रामीणों ने वाहन को घेरकर रोक लिया और उसमें रखी सामग्री की जांच की. वाहन में बड़ी मात्रा में स्कूली पाठ्यपुस्तकें मिलने के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा. ग्रामीणों का दावा है कि वाहन में करीब 5 क्विंटल यानी लगभग 500 किलोग्राम किताबें थीं, जो सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों के लिए आई थीं.

किताबें देखकर भड़के ग्रामीण

मौके पर मौजूद लोगों का कहना था कि अक्सर सरकारी स्कूलों में समय पर किताबें नहीं पहुंचने की शिकायतें सामने आती हैं. ऐसे में यदि किताबों को कबाड़ के रूप में बेचा जा रहा है, तो यह बेहद गंभीर मामला है. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शासन के पैसे से छपी किताबों को बिना पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए ठिकाने लगाने की कोशिश की जा रही थी. घटना के दौरान काफी देर तक मौके पर बहस और हंगामे की स्थिति बनी रही.

शिक्षक ने दी अपनी सफाई

ग्रामीणों के सवालों के बीच संबंधित शिक्षक हरनाथ मौर्य ने अपना पक्ष भी रखा. उनका कहना था कि वाहन में रखी गई सभी किताबें पुरानी और अनुपयोगी थीं. उनके मुताबिक, विद्यालय में जमा पुरानी रद्दी सामग्री के निस्तारण के लिए विभागीय अनुमति ली थी और नियमों के अनुसार ही सामग्री को हटाया जा रहा था. हालांकि जब ग्रामीणों ने अनुमति संबंधी दस्तावेज या लिखित आदेश दिखाने की मांग की तो मौके पर कोई आधिकारिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका.

क्या कहते हैं विभागीय नियम?

शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में अनुपयोगी या पुरानी पाठ्यपुस्तकों को कबाड़ घोषित करने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है. इसके तहत शाला प्रबंधन समिति (SMC) का प्रस्ताव पारित किया जाता है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों की अनुमति ली जाती है.यदि सामग्री का निष्कासन किया जाना है, तो अधिकृत समिति की मौजूदगी में पंचनामा तैयार किया जाता है और नियमानुसार नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाती है. नीलामी से प्राप्त राशि शासकीय खाते में जमा कराई जाती है. ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरे मामले में ऐसी किसी प्रक्रिया का पालन होता नजर नहीं आया.

ग्रामीणों ने उठाए कई सवाल

घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है. उनका कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर किताबों को कबाड़ घोषित करने की अनुमति किसने दी थी. साथ ही यह भी जांच का विषय है कि वाहन में केवल पुरानी किताबें थीं या फिर चालू सत्र से संबंधित पुस्तकें भी शामिल थीं. ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि नीलामी की प्रक्रिया अपनाई गई थी, तो वह सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं की गई.

अधिकारी बोले- जांच के बाद होगी कार्रवाई

मामले को लेकर जिला शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने भी गंभीरता दिखाई है. डीपीसी शिक्षा विभाग दफेदार सिंह का कहना है कि किताबों को बेचने संबंधी किसी आदेश की उन्हें जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि यदि ऐसा कोई आदेश जारी हुआ होता तो संबंधित जानकारी विभाग के पास होती. अधिकारियों के अनुसार पूरे मामले की जांच के निर्देश दे दिए गए हैं. जांच प्रतिवेदन के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी. यदि जांच में शिक्षक या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका नियमों के विपरीत पाई जाती है, तो संबंधित के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी.

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