ग्वालियर-बानमोर के बीच 20 किमी ट्रैक हटाने की तैयारी...
नैरोगेज का मिटने जा रहा है,'नामो-निशान,उखड़ेगी पटरी,अब हेरिटेज ट्रेन की उम्मीद भी टूटी !
ग्वालियर। ग्वालियर की पहचान और हजारों यात्रियों की कभी लाइफलाइन रही करीब 120 साल पुरानी नैरोगेज रेल सिंधिया परिवार के सक्रिय राजनीति में होने के बाद भी वो नेरोगेज रेल जिसे सिंधिया परिवार की ही देन कहा जाता रहा है अब इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है। छह साल से बंद पड़ी दो फीट चौड़ी पटरी को हटाने की तैयारी शुरू हो गई है। हेरिटेज ट्रेन के रूप में इसे बचाए रखने की उम्मीद भी फिलहाल खत्म हो गई है।
ग्वालियर से बानमोर के बीच करीब 20 किलोमीटर नैरोगेज ट्रैक हटाने के लिए रेलवे जल्द टेंडर प्रक्रिया शुरू कर सकता है। यह ट्रैक ग्वालियर-श्योपुर ब्रॉडगेज परियोजना का हिस्सा है। बानमोर से सबलगढ़ तक करीब 65 किलोमीटर ट्रैक हटाने का ठेका पहले ही दिया जा चुका है।
हेरिटेज ट्रेन की योजना भी नहीं बनी
नैरोगेज की ऐतिहासिक विरासत को देखते हुए घोसीपुरा से बानमोर के बीच दो कोच की हेरिटेज ट्रेन चलाने की योजना पर विचार किया गया था। रेलवे बोर्ड के हेरिटेज विभाग के अधिकारियों ने मौके का सर्वे भी किया, लेकिन योजना को व्यावहारिक नहीं मानते हुए आगे नहीं बढ़ाया गया।
अब जमीन के उपयोग की तैयारी
ट्रैक हटने के बाद रेलवे की जमीन के उपयोग को लेकर भी प्रक्रिया शुरू हो गई है। रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) द्वारा पूरे रूट का सर्वे किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि कुछ हिस्सों में ग्रीन बेल्ट विकसित करने और शहर के प्रमुख हिस्सों में व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
1895 में बिछी थी नैरोगेज लाइन
ग्वालियर की नैरोगेज रेल का इतिहास 1895 से जुड़ा है। तत्कालीन महाराजा माधवराव सिंधिया के समय ग्वालियर से श्योपुर तक करीब 199 किलोमीटर लंबा नैरोगेज नेटवर्क तैयार किया गया था। यह रेल व्यवस्था ग्वालियर के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई थी।
अब तस्वीरों में रह जाएगी 'छुक-छुक'
सुमावली के पेड़े, छोटे स्टेशनों की चहल-पहल और छत पर बैठकर किए गए सफर की यादें ग्वालियरवासियों के जेहन में लंबे समय तक रहेंगी। कभी शहर की धड़कन रही 'छुक-छुक' अब पटरी पर नहीं दौड़ेगी। ट्रैक हटने के साथ ग्वालियर की एक जीवंत विरासत भी धीरे-धीरे तस्वीरों और यादों में सिमट जाएगी।



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