G News 24 : 'जंतर-मंतर के गुनहगारों के पक्ष में विपक्ष,ये हमदर्दी या मजबूरी !!!

 संसद में हंगामा,सड़क पर फैसला और हिंसा के बलबूते पर क्या हासिल करना चाहते हैं !

'जंतर-मंतर के गुनहगारों के पक्ष में विपक्ष,ये हमदर्दी या मजबूरी !!!

जो सांसद बचाने पहुंचे, उनका सिर फोड़ने वाले अपराधियों के बचाव में भी राजनीति!

लोकतंत्र में आंदोलन करना अधिकार है, अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने आवाज उठाना भी पूरी तरह जायज है। यदि जैन समाज या आंदोलन से जुड़े लोगों की कुछ मांगें और मुद्दे थे, तो उन्हें शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से उठाने का अधिकार था। सरकार द्वारा उनकी कुछ मांगों को स्वीकार करना यह भी दर्शाता है कि बातचीत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि मांगों पर सरकार ने सहमति जताई, तो आंदोलन की आड़ में हिंसा और अराजकता फैलाने की जरूरत क्यों पड़ी?

यदि जांच में यह सामने आता है कि भीड़ के बीच घुसे कुछ असामाजिक तत्वों ने पुलिस वाहनों में आग लगाई, सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे जवानों पर हमला किया, उनके सिर फोड़े, वर्दियां फाड़ीं, उन्हें घेरकर गंभीर हिंसा का प्रयास किया और मीडिया प्रतिनिधियों के साथ दुर्व्यवहार किया, तो क्या ऐसे लोगों को केवल इसलिए कानून से छूट दे दी जानी चाहिए क्योंकि वे किसी आंदोलन या राजनीतिक विरोध का हिस्सा थे?

कानून का सिद्धांत साफ है, न किसी निर्दोष को फंसाया जाना चाहिए और न किसी दोषी को राजनीतिक संरक्षण मिलना चाहिए। निष्पक्ष जांच हो, हर घटना के तथ्य सामने आएं और जो भी व्यक्ति हिंसा, आगजनी, मारपीट या कानून व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया जाए, उसके खिलाफ बिना किसी राजनीतिक दबाव के कार्रवाई हो।

लेकिन देश की चिंता तब बढ़ती है, जब विपक्ष का एक बड़ा वर्ग आंदोलन की जायज मांगों और हिंसा के आरोपों के बीच स्पष्ट अंतर करने के बजाय ऐसे लोगों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, जिन पर सुरक्षा बलों के साथ मारपीट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।

देश पूछ रहा है,आखिर ऐसी क्या मजबूरी है विपक्ष की, जो सुरक्षा बलों के साथ मारपीट करने और कानून व्यवस्था को चुनौती देने के आरोपियों के प्रति इतनी हमदर्दी दिखाई जा रही है?

संसद में बहस नहीं, हंगामा,फिर बाहर धरना यह कैसी राजनीति?

संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। जनता अपने प्रतिनिधियों को वहां इसलिए भेजती है कि वे जनहित के मुद्दों पर चर्चा करें, सरकार से जवाब मांगें, नीतियों की समीक्षा करें और समाधान के लिए ठोस सुझाव रखें।

लेकिन यदि विपक्ष किसी मुद्दे को लेकर संसद के भीतर लगातार हंगामा करता है, कार्यवाही बाधित करता है और फिर सदन से बाहर निकलकर धरना देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर संसद में चर्चा से दूरी क्यों बनाई जा रही है? कभी किसी आंदोलन को लेकर हंगामा, कभी मंदिर में चंदे की कथित चोरी को लेकर नारेबाजी और फिर संसद के बाहर धरना, क्या हर मुद्दे का समाधान सड़क पर ही खोजा जाएगा?

यदि विपक्ष के पास सरकार से पूछने के लिए गंभीर सवाल हैं, तो संसद से बड़ा और प्रभावी मंच कौन-सा हो सकता है? संसद के भीतर तथ्य रखे जा सकते हैं, जवाब मांगे जा सकते हैं, जांच की मांग की जा सकती है और सरकार को जवाबदेह बनाया जा सकता है। लेकिन बहस के बजाय हंगामा और फिर बाहर धरना देना यह संदेश देता है कि कहीं राजनीतिक प्रदर्शन को संसदीय चर्चा से अधिक महत्व तो नहीं दिया जा रहा?

विपक्ष को यह समझना होगा कि सड़क पर विरोध लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है, लेकिन संसद की भूमिका का विकल्प नहीं हो सकता। संसद को ठप कर और फिर सड़क पर फैसला करने की कोशिश लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को कमजोर करती है।

मुद्दों का समर्थन या हिंसा के आरोपियों का बचाव?

राहुल गांधी सहित विपक्ष के तमाम नेताओं से देश का सीधा सवाल है, यदि किसी आंदोलन की मांगें जायज हैं, तो उनका समर्थन कीजिए। यदि किसी मामले में सरकार से जवाब चाहिए, तो संसद में सवाल उठाइए। यदि किसी घटना की निष्पक्ष जांच जरूरी है, तो उसकी मांग कीजिए।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति पर पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों पर हमला करने, उनके सिर फोड़ने, वर्दियां फाड़ने, पुलिस वाहनों में आग लगाने, भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने या मीडिया प्रतिनिधियों के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप हैं, तो क्या उसकी जांच और कानूनी कार्रवाई का विरोध किया जाना चाहिए?

क्या विपक्ष यह स्पष्ट करेगा कि वह शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों के साथ खड़ा है या उन लोगों के साथ, जिन्होंने आंदोलन की आड़ में हिंसा फैलाने का प्रयास किया?

राजनीतिक दलों को यह अधिकार है कि वे सरकार की आलोचना करें, लेकिन किसी भी लोकतंत्र में सरकार का विरोध करने का अर्थ कानून तोड़ने वालों का बचाव करना नहीं हो सकता। विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सत्ता से सवाल पूछना नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाना भी है।

संसद में हंगामा करके कार्यवाही रोकना और फिर बाहर धरना देकर सड़क पर फैसला सुनाने की कोशिश—क्या यही संसदीय लोकतंत्र की जिम्मेदार विपक्षी राजनीति है?

जायज मांगों का समर्थन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा के आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण देना लोकतंत्र नहीं, कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।

पूछता है भारत

  • जो सांसद प्रदर्शनकारियों के बीच निकले, उनके पक्ष में विपक्ष खड़ा है; लेकिन जो सांसद उन्हें बचाने पहुंचे और जिन पर हमला हुआ, उनके साथ हुई हिंसा पर विपक्ष की आवाज उतनी मुखर क्यों नहीं दिखाई देती?
  • आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि सुरक्षा बलों के साथ मारपीट, पुलिस वाहनों में आगजनी, वर्दियां फाड़ने और मीडिया प्रतिनिधियों से दुर्व्यवहार के आरोपों से जुड़े लोगों के प्रति हमदर्दी दिखाई जा रही है? 
  • विपक्ष संसद में बहस और समाधान के बजाय हंगामा करके बाहर धरना देने तथा सड़क पर राजनीतिक फैसला करने पर क्यों आमादा है?
  • क्या संसद केवल हंगामा करने के लिए है और सड़क केवल राजनीतिक प्रदर्शन के लिए?
  • देश को केवल नारे नहीं चाहिए। देश को स्पष्ट जवाब चाहिए !!!
  • मुद्दों के साथ खड़े हैं या हिंसा के आरोपियों के साथ?

जवाब दे विपक्ष!

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